संस्करण: 11  जून-2012

मोदी राजनीतिक अहंकार के प्रतीक

? विवेकानंद

                क ऐसा व्यक्ति जो अपने ही लोगों से सद्भावना नहीं रखता और सद्भावना उपवास के दौरान मुस्लिम की टोपी ठुकरा देता है तो अचरज नहीं होता। लेकिन ऐसे व्यक्ति को जब विविधता रे और बहुधर्मी लोगों का प्रधानमंत्री बनाए जाने की पैरवी होती है तो जरूर थोड़ा अजीब लगता है,और सवाल भी उठते हैं कि क्या ऐसा व्यक्ति देश की विविधता को स्वीकार कर पाएगा? क्या लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सजग जनता की आलोचनाएं सहन कर पाएगा? और सबसे बड़ी बात क्या समूचा देश ऐसे व्यक्ति को स्वीकार कर सकेगा? निश्चित तौर पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर आरएसएस इन दिनों इसी चिंतन में खोया होगा। बावजूद इसके विकल्पहीनता की स्थिति में संघ यदि मोदी को आगे बढ़ाना भी चाहता है और उन पर लगाम लगाए रखना भी चाहता है। दूसरी ओर भाजपा के नेता विचित्र दुविधा में फंसे हैं। एक ओर लालकृष्ण आडवाणी हैं जिनका वरिष्ठता और भाजपा के लिए जिनके योगदान को कभी अनदेखा नहीं किया जा सकता,दूसरी ओर नरेंद्र मोदी हैं जिन्होंने कट्टरता और हिन्दुत्व का झंडा उठाकर गुजरात में पार्टी को मजबूत जरूर किया है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को मजबूत करने में उनका कोई योगदान नहीं है। लेकिन ऐसा करने वालों में नरेंद्र मोदी अकेले व्यक्ति नहीं है,मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह ने भी अपने नेतृत्व में दो-दो बार सरकार बनाई है। ऐसे में उन नेताओं के लिए मोदी को स्वीकार कर पाना कठिन हो रहा है जो प्रचार और परिश्रम की हकीकत को जानते हैं। मोदी की खासितय सिर्फ इतनी है कि वे बेलगाम बोलते हैं इसलिए सुर्खियों में आ जाते हैं। उनकी इसी शैली के चलते विध्वंस की राख में चिंगारी ढूंढने के आदी लोगों को अभी मोदी में उम्मीदें का सागर नजर आ रहा है, उनमें पटेल जैसा मजबूत कलेजा दिखता है, लेकिन वास्तव में नरेंद्र मोदी उस अहंकारी और धूर्त राजा के समान हैं जो वक्त निकल जाने पर या चापलूसी न करने वाले लोगों को विरोधियों या यूं कहें दुश्मनों की तरह खत्म करने पर उतारू हो जाते हैं, जैसा कि उन्होंने संजय जोशी के साथ पहले भी किया और मुंबई कार्यकारिणी की बैठक से पहले भी। मोदी की इस अहंकारी आदत का शिकार केवल जोशी ही नहीं हैं इससे पहले शंकरसिंह बाघेला और केशूभाई पटेल को भी मोदी ने इसी तरह किनारे लगाया। वह वक्त अभी भी लोगों को याद होगा जब केशूभाई को विधायक दल का नेता चुने जाने के दौरान शंकरसिंह बाघेला रो रहे थे। तब मोदी केशूभाई के साथ थे, लेकिन वे केशूभाई के साथ तभी तक रहे जब तक केशू उनकी कही पर चलते रहे। जैसे ही केशू ने मोदी की अहंकारी प्रवृत्ति का विरोध किया मोदी ने उनके खिलाफ राजनीतिक जाल ऐसा बुना जिसे केशू आज तक नहीं तोड़ पाए। इनमें एक और सबसे चर्चित और भाजपा के लिए समर्पित रहने वाला नाम है हरेन पंडया। हरेन पंडया की हत्या हुई थी।

               उनके परिवार वाले इसमें मोदी का हाथ बताते हैं। बहरहाल सच क्या है यह कानूनी जांच के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि दंगों के बाद हरेन और मोदी के बीच में बनती नहीं थी, जिसके चलते अटलबिहारी वाजपेयी की इच्छा के विपरीत मोदी ने हरेन पंडया को विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं मिलने दिया था। यह है मोदी की असली मिजाज। इस मिजाजा को कट्टरता से लबरेज हो चुके और मोदी के भय में जीते गुजरात ने भले ही स्वीकार कर लिया हो लेकिन सारा देश स्वीकार करेगा इसमें घोर संदेह है।

               दूसरी बात भाजपा आज तक इस स्थिति में स्वयं नहीं आ पाई कि उसे पूरे देश में स्वीकार किया गया हो, फिर वह मोदी को किस बूते देश में खपा पाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक देश में 225 ऐसी लोकसभा सीटें हैं जिनमें भाजपा कभी सफल नहीं रहे। करीब 10 ऐसे राय हैं जहां भाजपा का कभी कोई नुमाइंदा नहीं रहा। पार्टी की यह स्थिति उसकी राष्ट्रीय स्वीकार्यकता कितनी है खुद प्रदर्शित करती है। यानि साफ है कि इस ईमानदार पार्टी में काम करने वालों का सर्वथा अभाव है। जबकि तथाकथित घोटालेबाजों पार्टी में काम करने वाले नेताओं की कमी नहीं है, इसलिए राष्ट्र में ऐसा कोई राय नहीं है जहां उसका कोई नुमाइंदा न हो। इससे साबित होता है कि प्रधानमंत्री पद की लालच से भरे नेताओं की भरी इस पार्टी में काम करने वालों का नितांत अभाव है। पार्टी के जितने भी नुमाइंदे हैं कुछ को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश बोलते बहुत अच्छा हैं करते कुछ भी अच्छा नहीं। और पार्टी की हालत ऐसी है कि मोदी से लेकर वसुंधरा और येदियुरप्पा तक के आगे घुटने टेकती रहती है। मोदी को विकास पुरुष बनाने के लिए पार्टी ने हकीकत से दूर प्रचार-प्रसार का सहारा लिया। गलत आंकड़ों को जोर-जोर से चिल्लाकर सच साबित करने की कोशिश की। निश्चित रूप से एक बड़ा वर्ग इससे प्रभावित हुआ है, इसमें कुछ श्रेय मोदी की कार्यशैली को भी जाता है, जिन्हें सांप्रदायिक धुर्वीकरण में महारथ हासिल है। मोदी आडवाणी की तरह कट्टरवाद और हिंदुत्व के रास्ते पर चलकर बड़ा नेता बनना चाहते हैं। इस बात को नजरअंदाज करके कि आडवाणी कट्टरवाद के चलते बड़े नेता तो बने पर जब सामूहिक स्वीकार्यता का वक्त आया तो अटलबिहारी वाजपेयी को चुना गया। आडवाणी आज भी अपनी हथेली में उस रेखा को तलाश रहे हैं जो राजयोग को दर्शाती है। जब सामूहिक स्वीकार्यकता का समय आएगा तो मोदी को भी इस हकीकत से दो-चार होना पड़ेगा। जदयू से लेकर कई एनडीए के घटक दल मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में उतना भी स्वीकार नहीं कर पाएंगे जितना आडवाणी को संकोच सहित करते थे।

               मोदी के नाम को पीएम के लिए हवा देने में उद्योगपतियों का भी बड़ा रोल है।  लेकिन हकीकत यह है कि गुजरात में उद्योगपतियों को जिस तरह से नरेंद्र मोदी लाभ पहुंचा रहे हैं इसके बदले में उद्योगपति उनका गुणगान कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर टाटा का नैनो प्रोजेक्ट 2200 करोड़ का है। जिसके लिए टाटा मोटर्स को बिना नीलामी के 1100 एकड़ जमीन केवल 900 रुपए वर्ग मीटर की दर पर दे दी गई जबकि भूमि का बाजार मूल्य करीब 10 हजार रुपए वर्ग मीटर है। इसका मूल्य चुकाने के लिए टाटा मोटर्स को 6-6 माह में 50-50 करोड़ रुपए की किश्तें बनाई गईं। मजेदार बात यह है कि यह जमीन एक यूनिर्वसिटी के लिए आरक्षित थी, लेकिन मोदी को युवाओं को शिक्षा देने से अधिक नैनो में अधिक रुचि थी। इसके आलवा 2200 करोड़ के कुल प्रोजेक्ट के लिए मोदी सरकार ने टाटा मोटर्स को 9570 करोड़ का कर्ज दिया वह भी 0.50 पैसा प्रतिशत की दर से। इसी तरह अदानी समूह को गुजरात में हजारों वर्ग मीटर जमीन केवल 1 से 32 रुपए वर्ग मीटर के हिसाब से दे दी गई थी। जिसे अदानी समूह ने केवल 800 से 10 हजार रुपए वर्ग मीटर में सरकारी कंपनियों को बेचा। गुजरात पर 10-11 की स्थिति में 112462 करोड़ रुपए है, और राजय का हर तीसरा आदमी गरीब है। अतुल्यभारत सम्मेलन में 03 से 09 तक कुल 18.77 लाख करोड़ के करार हुए थे जिसमें से केवल 2.88 लाख करोड़ यानि केवल 15 प्रतिशत का काम जमीन पर शुरू हो पाया। यह है गुजरात की विकास गाथा और विकास पुरुष का सच। आंकड़ों के आधार पर भी मोदी ने जितना विकास किया है वह पांचवें नंबर पर आता है, लेकिन उसे देश में मॉडल की तरह पेश किया गया। वर्ष 04-05 से 09-10 तक जीएसडीपी में हुई वृध्दि के आंकड़ों को देखें तो उत्तराखंड जैसे राज्य ने जिसके पास केवल पर्यटन ही एक मात्रा मुख्य कमाई का जरिया है 250.65 प्रतिशत विकास किया जबकि छत्तीसगढ़ जैसे छोटे और नक्सल प्रभावित राय ने 229.65 प्रतिशत वृध्दि दर्ज की। इसके अलावा हरियाणा ने 226.46 प्रतिशत, बिहार ने 255.31 प्रतिशत, महाराष्ट्र ने 217.80 प्रतिशत, दिल्ली ने 217.15 प्रतिशत, ओडिशा ने 211.97 प्रतिशत , तमिलनाडु ने 211.65 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश ने 211.50 प्रतिशत विकास किया। इसके बाद आता है गुजरात का नंबर जिसके जीएसडीपी में 211.12 प्रतिशत वृध्दि दर्ज की गई। यानि विकास के मामले में गुजरात का नंबर 10वां है। झूठ का झुनझुना बजाकर कुछ लोगों को तो भ्रमित किया जा सकता है, पूरे देश को नहीं। मोदी की महानता सिर्फ इतनी है कि वे कटाक्ष अच्छा करते हैं, फिर चाहे वह झूठ का पुलिंदा ही क्यो न हो। उन्होंने एक बयान दिया है कि इंदिरा गांधी बाइबिल के हिसाब से सरकार चलाना चाहती थीं, उनके इस बयान को कांग्रेस की ओर से प्रतिक्रिया आने से पहले ही कई लोगों ने खारिज कर दिया। मोदी के मुताबिक यह कांग्रेस के मेनोफेस्टो में भी है। मोदी का यह झूठ वैसा ही है जैसे लालकृष्ण आडवाणी जी ने कहा था कि कंधार कांड में आतंकियों को छोड़ने के फैसले की जानकारी उन्हें नहीं थी। बहरहाल झूठ के आंकड़ों और झूठे आरोपों से भाजपा  के ये महात्वाकांक्षी नेता पार्टी को कहां ले जाएंगे भगवान ही मालिक है।

? विवेकानंद