संस्करण: 11  जून-2012

संदर्भ : आडवाणी की गडकरी को नैतिक शिक्षा

भाजपा आरएसएस हमेशा से रहे हैं भ्रष्ट और अवसरवादी

 

? एल.एस.हरदेनिया

               अभी हाल में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवानी ने पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी की कार्यप्रणाली की चर्चा करते हुए उनके द्वारा अभी हाल में लिये गये निर्णयों की आलोचना की थी। इस संदर्भ में उन्होंने उत्तरप्रदेश की तत्कालीन मायावती सरकार के भ्रष्ट मंत्री कुशवाह को भाजपा में प्रवेश देने, कर्नाटक के मामले में लीपापोती का रवैया अपनाने आदि बातो का उल्लेख किया था। इसके अतिरिक्त गडकरी द्वारा एक धनवान व्यक्ति को झारखण्ड से राज्यसभा में लाने का प्रयास करने और इसके लिए भ्रष्ट तरीके अपनाने की चर्चा सारे देश में हुई। अनेक लोगों के अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने भी गडकरी के निर्णय की सार्वजनिक रूप से निंदा की थी। आरोप साफ था कि राज्यसभा की टिकट बेची गई है। उसके बाद न सिर्फ उसकी टिकट रद्द करना पड़ी बल्कि चुनाव आयोग को राज्यसभा का चुनाव स्थगित भी करना पड़ा। खरीद फरोख्त के आरोप के चलते देश के इतिहास में पहली बार राज्यसभा का चुनाव रद्द किया गया है। कुल मिलाकर आडवानी ने भाजपा नेतृत्व के नैतिक अधा:पतन पर चिंता प्रगट की है जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हुई है। इनके अतिरिक्त देश के अनेक हिस्सों में भाजपा कार्यकर्ताओं के नैतिक अध:पतन के किस्से सामने आ रहे हैं। इस तरह के किस्से उन राज्यों से ज्यादा आ रहे हैं जहां भाजपा का शासन है। अभी दिनांक 3 जून के समाचार पत्रों में दो चौकाने वाले समाचार छपे है। इनमें एक खबर कर्नाटक की है, कर्नाटक से यह समाचार आया है कि वहां भाजपा के एक घूसखोर विधायक अदालत ने जेल और जुर्माने की सजा दी है। इस समाचार से भ्रष्टाचार के खिलाफ केंद्र सरकार पर हल्ला बोल रही भाजपा को तगड़ा झटका लगा है। इस विधायक ने एक व्यापारी के संपत्ति विवाद को सुलझाने के लिए 4.95 लाख रूपए रिश्वत ली थी। बंगलौर की एक विशेष अदालत ने सत्तारूढ़ भाजपा विधायक वाई.संपंगी को साढ़े तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने विधायक पर एक लाख रूपए का जुर्माना भी लगाया है।

                करीब साढे तीन साल तक चली सुनवाई के बाद लोकायुक्त विशेष अदालत के जज एन.के.सुधींद्र राव ने संपंगी को भ्रष्टाचार नियंत्रण कानून की धारा 13 (1डी) के तहत दोषी करार दिया, जबकि एक अन्य आरोपी मुस्ताक पाशा को अदालत ने बरी कर दिया। संपंगी को सजा सुनाने के बाद अदालत ने लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक को गिरफ्तारी वांरट जारी करने और संपंगी को हिरासत में लेने का आदेश दिया। अदालत के आदेश पर लोकायुक्त पुलिस ने संपंगी को हिरासत में लेकर केंद्रीय जेल भेज दिया।

               कर्नाटक के संसदीय इतिहास में यह पहला मौका है, जब विधायिका के किसी सदस्य को भ्रष्टाचार के आरोप में सजा सुनाई गई है। लोकायुक्त पुलिस ने पहली बार किसी विधायक को रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया था। मामले की जांच के लिए गठित विधानमंडल की समिति ने दो साल पहले संपंगी को क्लीनचिट देते हुए शिकायतकर्ता के खिलाफ ही झूठी शिकायत दर्ज कराने के लिए कार्रवाई करने की सिफारिश की थी।

               तत्कालीन लोकायुक्त जस्टिस एन. संतोष हेगड़े के कार्यकाल में एक व्यापारी की शिकायत पर लोकायुक्त पुलिस ने संपंगी को 29जनवरी 2009को पांच लाख रूपए रिश्वत लेते गिरतार किया था। संपंगी को लेजेस्टिव होम स्थित कमरे से गिरतार किया गया था।

                  उसी दिन के समाचार पत्रों में एक और सनसनी खेज समाचार छपा है। इस समाचार का शीर्षक है ''भाजपा नेता रोड़मल के वेयर हाऊस पर छापा। 900 क्विंटल अवैध गेहूँ समेत दो ट्रक जब्त'' समाचार के अनुसार खाद्य विभाग ने रात करीब 11.30 बजे पचोर से दो किमी दूर नेशनल हाईवे तीन पर स्थित आनंद वेयर हाउस पर छापा मारा। यह वेयर हाउस भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष और वर्तमान प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य रोडमल नागर का है। यहां अवैध रूप से समर्थन मूल्य पर राजस्थान व राशन का गेहूं एकत्रित कर बेचा जा रहा था। खुलेआम कई मजदूर शासन की योजनाओं के गेहूं को पुराने बारदानों से निकालकर नए बारदानों में भरने का काम कर रहे थे। नए बारदानों में उदनखेड़ी संस्था की सील व छापे लगाए जा रहे थे, जो समर्थन मूल्य पर हो रही खरीदी में संस्था द्वारा लगाए जाते हैं। मौके से पकड़ाए मजदूरों ने बताया कि वे यह काम ढाई माह से लगातार कर रहे हैं। कभी राजस्थान का गेहूं तो कभी राशन का गेहूं वेयर हाउस आता था,जिसे खाली करते हुए समर्थन मूल्य के बारदानों में पैक करते थे। छापे में लगभग 900क्विंटल गेंहू वेयर हाउस में पाया गया। दो ट्रकों को भी जब्त किया गया है। खाद्य विभाग की टीम के पहुंचते ही दर्जनों मजदूर मौके से भाग गए। मौके पर रोडमल नागर के सहयोगी माने जाने वाले नागर इंडस्ट्री के संचालक ओमप्रकाश नागर को पकड़ा गया है। बारदाना बदलकर जिन ट्रकों पर गेहूं भरा जा रहा था, उनका टीआर पहले ही कट चुका था। इसके बाद भी इन ट्रकों का वेयर हाउस तक पहुंचना बड़े षडयंत्र की ओर इशारा कर रहा है। कॉर्पोरेशन से अनुबंधित ट्रक निजी वेयर हाउस पर टीआर कटने के बाद कैसे पहुंच गए? इससे स्पष्ट होता है कि यह सब गोलमाल सोसाइटी, वेयर हाउस कॉर्पोरेशन, मंडी प्रबंधन और सभी विभागों की मौन स्वीकृति से चल रहा था। पचोर कृषि उपज मंडी में करोड़ों रूपए का गेहूं बोनस लेकर अवैध रूप से बेच दिया गया। प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई में सिर्फ 13 किसानों के नाम पर लगभग चार करोड़ रूपए का गेहूं बेचा गया, जबकि उनके नाम पर छोटी-छोटी जमीनें थी। इसके अतिरिक्त मध्यप्रदेश में अनेक भाजपा नेता अवैध खनन के मामलों में लिप्त पाये गये हैं। एक मामले में तो प्रदेश के एक मंत्री का सगा भतीजा खदान माफिया का सरगना पाया गया। बैतूल के भाजपा के एक नेता पर अवैध खनन के मामले को लेकर लाखों रूपयों का जुर्माना लगाया गया है।  कर्नाटक में पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा तो भ्रष्टाचार में लिप्त पाये ही गये हैं उनकी मंत्रिपरिषद के दो सदस्यों पर, जिन्हें रेवी ब्रदर्स के नाम से जाना जाता है, करोड़ों रूपये के लौह अयस्क अवैध निर्यात का आरोप है। दोनों को मंत्रिपरिषद से निष्कासित किया गया। इस तरह भाजपा के ऐसे नेताओं की सूची काफी लंबी है जो आर्थिक अपराधों में लिप्त रहे हैं। इसलिए अकेले नितिन गडकरी पर भ्रष्ट लोगों को संरक्षण देने का आरोप लगाना उचित नहीं है। सच पूछा जाए तो भाजपा को भ्रष्ट नेताओं से कभी परहेज नहीं रहा है। वर्षों पहले हिमाचल प्रदेश के सुखराम पर भ्रष्ट आचरण के गंभीर आरोप लगे थे। इन आरोपों के चलते भाजपा ने लगभग सात दिन तक लोकसभा की कार्यवाही तक चलने नहीं दी थी। बाद में उन्हीं सुखराम को भाजपा में ले लिया गया था। अभी हाल में अदालत ने सुखराम को उन्हीं अपराधों को लेकर सजा सुनाई है। जब सुखराम को भाजपा में लिया गया था उस समय नितिन गडकरी भाजपा के अध्यक्ष नहीं थे।  

                 इसके पूर्व का इतिहास देखें तो देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार की नींव डालने में भी भाजपा की भूमिका रही है। वैसे तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने जिसका पहला राजनीतिक अवतार था भारतीय जनसंघ और बाद का भारतीय जनता पार्टी, प्रारंभ में चुनाव की प्रक्रिया सफलता पर शंका प्रगट की थी। जब संविधान सभा ने और विशेषकर जवाहर लाल नेहरू ने देश के प्रत्येक वयस्क नागरिक को वोट देने का अधिकार दिया, उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उस फैसले के औचित्य पर प्रश्न चिन्ह लगाया था। संघ के मुख पत्र ''आर्गनाईजर''ने इस निर्णय पर टिप्पणी करते हुये लिखा था कि शायद नेहरू स्वयं इस व्यवस्था की असफलता को देखने के लिए जीवित रहेंगे। न सिर्फ मताधिकार के प्रश्न पर बल्कि संविधान के अन्य पहलुओं पर भी संघ की आस्था नहीं थी। संविधान के मुख्य पहलू धर्मनिरपेक्षता का तो संघ ने स्वयं सतत मखौल उड़ाया है। संघ के दो सर संघचालक सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि संविधान की सबसे उपयुक्त जगह  कचरे का डिब्बा है। अपनी इस विचारधारा के चलते जनसंघ ने अनेक बार ऐसे कदम उठाये है जो संवैधानिक प्रक्रिया के विपरीत है। हमारे संविधान के अनुसार हमारे देश में उसी दल को शासन करने का अधिकार है जिसे जनता चुने। परंतु इस संवैधानिक प्रावधान को उस समय करारा धक्का लगा जब सन् 1967 में अनेक राज्यों की चुनी हुई सरकारों से यह अधिकार छीन लिया गया। बड़े पैमाने पर दल बदल के द्वारा चुनी हुई सरकारों को अपदस्थ कर दिया गया। जनसंघ ने न सिर्फ दल बदल कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी बल्कि यह पार्टी दलबदल के बाद बनी नई मंत्रिपरिषद में शामिल भी हुई। दल बदल जिन विधायकों ने किया उन्हें हर प्रकार से संतुष्ट किया गया था। मध्यप्रदेश में 36कांग्रेस विधायकों ने पार्टी छोड़कर चुनी सरकार को अपदस्थ किया था। उसके बाद मध्यप्रदेश के अलावा उत्तरप्रदेश और बिहार में संविद सरकार बनी जिनने भ्रष्टाचार के नये आयाम छुये। राजनीति में अवसरवादिता और भष्टाचार का ऐसा अध्याय प्रारंभ हुआ जिसका अंत आज तक नहीं हो पाया। ये सब घटनायें उस समय हुई जब जनंसघ पर अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी का एक छत्र राज था। इस तरह अनैतिक राजनैतिक कृत्यों का संघ परिवार का पुराना इतिहास है।

               मधयप्रदेश की संविद सरकार में एक ऐसे मंत्री थे जो चेक से रिश्वत लेते थे। इन मंत्री को बाद में केन्द्रीय मंत्री का ताज भी पहिनाया गया था। राजनीतिक अवसरवादिता के उदाहरणों में भाजपा का शिवसेना और अकाली दल से गठजोड़ भी शामिल करना चाहूँगा। शिवसेना को मैं घोर हिन्दू विरोधी पार्टी मानता हॅँ। यह जग जाहिर है कि शिवसेना गैर मराठी भाषी हिन्दुओं को मुंबई में नहीं रहने देना चाहती। उन्हें मुंबई से भगाने के लिए उन पर हिंसक हमले करती है। राज ठाकरे ने इस रवैये में और इजाफा किया है। भारतीय जनता पार्टी हिन्दू हितों की बात करती है। उसके बावजूद वह घनघोर हिन्दू विरोधी पार्टी से मिलकर सत्ता का उपभोग करती है। अकाली दल के साथ भी भाजपा का गठजोड़ राजनीति अवसरवादिता की पराकाष्टा है। अकाली दल आज भी आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के प्रति प्रतिबध्द है। अभी हाल में आपरेशन ब्लू स्टार की वर्षगांठ पर पंजाब की अकाली सरकार ने भिंडरावाले सहित इस आपरेशन में मारे गए कई आतंकवादियों का मरणोपरांत सम्मान किया। अपने आप को देशभक्ति का एकमात्र ठेकेदार मानने वाले संघी अपने सहयोगी दल के इस देशद्रोहपूर्ण  कृत्य को किसी तरह औचित्यपूर्ण सिध्द करेंगे?

? एल.एस.हरदेनिया