संस्करण: 11  जून-2012

12 जून : बाल मजदूरी के खिलाफ विश्व दिवस पर विशेष

कैसे खत्म होगी बाल-मजदूरी ?

? डॉ. गीता गुप्त

                  ज भी बाल-श्रम भारत की एक गंभीर समस्या है। यद्यपि हाल के वर्षों में सरकार का ध्यान बच्चों की समस्याओं पर केन्द्रित हुआ है। इसीलिए अब अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून का रूप ले चुका है और बाल यौन शोषण पर विराम लगाने हेतु भी कानून अस्तित्व में आ गया है। परन्तु बाल श्रम रोकने में सरकार सफल नहीं हो पायी हैं। यह चिंताजनक है। समूची दुनिया में बाल श्रमिकों की संख्या 24 करोड़ से भी अधिक है। इनमें से एक तिहाई से भी अधिक बच्चे खदानों, खतरनाक मशीनों, खेतों, घरेलू कार्यों और दूसरे प्रतिबंधित कार्यों में लगे हुए हैं। यूनीसेफ की एक रपट के अनुसार,विश्व में शोषण एवं भेदभाव के शिकार करोड़ों बच्चे दुनिया से गायब हो चुके हैं। इस तरह बुनियादी सुविधाओं से वंचित बच्चों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।

                 बच्चों की खराब स्थिति के मद्देनजर विश्व में भारत छठे स्थान पर है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, यहां लगभग बारह करोड़ बाल मजदूर है और ये सभी 14वर्ष से कम उम्र के हैं। हालांकि संसद में सरकार के कथनानुसार 15वर्ष से कम आयु के सवा करोड़ से कुछ अधिक बच्चे स्कूल जाने की बजाय पेट की भूख मिटाने के लिए कठोर श्रम करने विवश हैं। देश के विभिन्न राज्यों में स्थितियां अलग-अलग हैं परन्तु शोषित, उत्पीड़ित, घर से भागे हुए, यौन उत्पीड़न के शिकार और निषिध्द क्षेत्रों में मजदूरी कर रहे बच्चे तो हर राज्य में है और इनकी संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी इसलिए हो रही है क्योंकि समाज में कानून का कोई डर नहीं है।

                भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने 16 खतरनाक व्यवसायों एवं 65 खतरनाक प्रक्रियाओं की बाकायदा सूची जारी कर उनमें 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को रोजगार देना निषिध्द घोषित किया है। फिर भी हर शहर, हर गली-मुहल्ले में बच्चे प्रतिबंधित कार्यों में लगे हुए देखे जा सकते हैं। चाय के ठेलों, ढाबों, मोटर-गैरेज और घरों में कामगार के रूप में बच्चे ही पहली पसंद होते हैं, क्योंकि कम मेहनताने पर अधिक काम लिया जा सकता है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाला मीडिया भी बच्चों का शोषक है। हर शहर, रेल्वे स्टेशन, बस स्टैण्ड और सड़कों पर अखबार बेचते बच्चे बाल श्रम का प्रमाण हैं। मगर कोई पत्रकार,ग्राहक या अखबार मालिक इस बाल श्रम के विरुध्द आवाज नहीं उठाता। कैसी विडंबना है।

               सरकार ने 'स्कूल चले' अभियान चलाया है, मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था की है, शिक्षा को बच्चों का अधिकार घोषित किया है। लेकिन बच्चों का बचपन सुरक्षित नहीं हो पा रहा है। वे शोषित और कुपोषित ही हैं। कोई शासकीय योजना उनके उज्ज्वल भविष्य की गारंटी नहीं बन पा रही है तो दोष किसका है ? राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर महिला बाल विकास विभाग तथा बाल अधिाकार संरक्षण आयोग के होते हुए भी बच्चे अपने अधिकारों से वंचित हैं। उन्हें श्रम से मुक्ति नहीं मिल पा रही है, आखिर क्यों ? बाल मजदूरों के पुनर्वास हेतु सरकार ने कार्यक्रम बनाये हैं। राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना के तहत बाल श्रमिकों के लिए विशेष स्कूल, पुनर्वास केन्द्र, औपचारिक/अनौपचारिक शिक्षा, मध्यान्ह भोजन, छात्रवृत्ति, व्यावसायिक प्रशिक्षण और स्वास्थ्य-सुविधाओं का प्रावधान किया गया है। बाल श्रम रोकने के लिए कानून भी बनाये गए हैं। बाल मजदूर (प्रतिबंधित एवं विनियमन) अधिनियम के अंतर्गत दोषी व्यक्ति को दस हज़ार से बीच हज़ार रुपये के अर्थदंड सहित एक वर्ष की सजा का भी प्रावधान है। लेकिन यह तयशुदा बात है कि कोई कानून तभी कारगर हो सकता है जब उसका पालन सुनिश्चित किया जाए।

               जिन खतरनाक व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं में बाल मजदूरी निषिध्द है, उनपर सरकार को निगरानी रखनी चाहिए। हमारे आसपास ही बाल-श्रम के अनेक उदाहरण दिखाई देते हैं परंतु किसी नियोक्ता की कभी कोई शिकायत नहीं करता, न ही उसे दंडित किया जाता है तो बाल श्रम कैसे रुकेगा ? देखा गया है कि निर्धन माता-पिता भी स्वयं बच्चों को मजदूरी के लिए भेजते हैं। वे उनकी शिक्षा में रुचि नहीं लेते क्योंकि पेट पालने में बच्चे उनके सहायक होते हैं। ऐसे में बच्चे कभी कभी बंधुआ मजदूर बनकर रह जाते हैं। ऐसे परिवारों के आर्थिक स्वावलंबन का उपाय भी सरकार को करना होगा। बाल श्रमिकों की समस्या यदि सचमुच हल करनी है तो बाल श्रमिक अधिनियम को प्रभावी ढंग से क्रियान्वित करना होगा और बाल श्रमिक विरोधी कानून तथा राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना को शिक्षा के अधिकार कानून के अनुरूप बनाना होगा। ताकि बेसहारा,बेघर बच्चों और बाल श्रमिकों को पुनर्वास के माधयम से शिक्षा के अधिकार का सीधा लाभ मिल सके, क्योंकि शिक्षा से ही बच्चों का जीवन प्रकाशमय हो सकेगा।

               मेरा मानना है कि जनता के सहयोग के बिना कोई भी कानून बाल श्रम के कलंक से इस देश को मुक्ति नहीं दिला सकता। बच्चों के हित में जितने भी कानून बने हैं,उनका लाभ जब तक बच्चों को नहीं मिलेगा वे देश की उन्नति में भागीदार नहीं बन सकेंगे। और जब तक बच्चों का बचपन नहीं संवरेगा तब तक देश के उज्ज्वल भविष्य की कल्पना निरर्थक है, क्योंकि बच्चों पर ही देश का भविष्य अवलंबित है। ऐसे में, राष्ट्र के हर नागरिक का कर्तव्य है कि अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझे और बच्चों को जहां भी मजदूरी करते देखे, उन्हें शिक्षा की रोशनी में ले जाने और उनके अधिकार दिलवाने का प्रयास करें। तभी सरकार की बाल श्रम परियोजना स्कीम सफल होगी और हमारा देश बाल मजदूरी के कलंक से छुटपारा पा सकेगा।

               
? डॉ. गीता गुप्त