संस्करण: 11  जून-2012

जीवन भक्षक बनते

मेडिकल स्टोर्स

? डॉ. महेश परिमल

                देश के मेडिकल स्टोर्स में जीवन रक्षक दवाएँ मिलती हैं। पर आजकल यहाँ से मौत बिक रही है। यहाँ जीवन रक्षक नहीं, बल्कि जीवन भक्षक दवाएँ मिल रही हैं। इसमें राज्य सरकार का पूरा सहयोग है।

               पूरे देश में करीब एक हजार ऐलोपैथी दवाएँ बेची जा रही हैं, जो मानव के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। देश के ड्रग कंट्रोलर जनरल ने हाल ही में यह बताया है कि देश में जितनी ऐलोपैथी दवाएँ बेची जाती हैं,उसमें से करीब एक हजार दवाएँ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। इन दवाओं को राज्य सरकार ने बेचने की अनुमति दी है। केरल के न्यूरो सर्जन जेकब जॉन ने सूचना के अधिकार के तहत केंद्र सरकार के ड्रग कंट्रोलर जनरल से यह पूछा था कि भारत के बाजार में कितनी दवाएँ फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन के रूप में सरकार से अनुमति लिए बिना ही बेची जा रही है। इसके जवाब मेंड्रग कंट्रोलर जनरल ने बताया कि भारत के बाजार में ऐसी 294संयोजित दवाएँ बेची जा रही हैं। इन दवाओं का असर शरीर में क्या होता है, इसकी जाँच भी नहीं हो पाई है।

               ड्रग कंट्रोलर जनरल की तरफ से कुछ ही ऐलापैथी दवाओं को बेचने की अनुमति दी गई है। किंतु दवा कंपनियाँ ऐसी ही दो दवाओं को मिलाकर एक अलग ही दवा अलग ब्रांडनेम से बनाकर बेचती हैं। किसी भी दो दवाओं के संयोजन से एक दवा बनाई जाती है,तो इसके लिए भी ड्रग कंट्रोलर से अनुमति लेना आवश्यक है। यही नहीं, उसका स्वास्थ्य परीक्षण भी करना आवश्यक है। किंतु दवा कंपनियां ऐसी करीब एक हजार दवाओं को बनाकर बिना अनुमति और बिना परीक्षण के बेच रहीं हैं। इससे कभी भी हजारों लोगों की जान आफत में आ सकती है। केंद्र सरकार के ड्रग कंट्रोलर ने जिन 293 दवाओं को हानिकारक बताया है, उसमें अनेक प्रख्यात दवाओं के ब्रांडों का भी समावेश होता है। इसके लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त है। भारत में एनिमिया के इलाज के लिए इस्तेमाल में लाई जा रही दवा डेक्सोरेंज देवनार के कत्लखाने के मृत प्राणियों के खून से बनाई जाती है। विदेशों में भी हीमोग्लोबिन कम करने के लिए दवा इस तरह से बनाने पर प्रतिबंध है। भारत में यह दवा पर 12 साल पहले ही प्रतिबंध लगा दिया गया है। लेकिन उसके पहले यह करोड़ों शाकाहारी भारतीयों के पेट में पहुंच गई। अभ उन 293दवाओं पर रोक लगाई गई है। यदि ये दवाएं बाजार में हैं, तो उसे वापस लेनी का आदेश भी दिया गया है। भारतीय बाजार  में जो हानिकारक दवाएँ बिक रहीं हैं, उसमें से एक अल्प्राजोलम और पेरासिटामोल का संयोजन है। अल्प्राजोलम दवा चिंता कम करने के काम आती है और पेरासिटामोल बुखार कम करने के लिए इस्तेमाल में लाई जाती है। अब दन दोनों दवाओं को मिलाने का क्या तुक है, यह समझ से परे है। जिसे चिंता है, तो यह आवश्यक नहीं कि उसे बुखार भी हो। जिसे चिंता है, उसे बुखार की दवा देने का क्या तुक? फिर अल्प्राजोलम दिन में तीन बार ली जाती है और पेरासिटामोल दिन में आठ बार। अब इन दोनों के संयोग से बनने वाली दवा को दिन में कितनी बार लिया जाए, यह स्पष्ट नहीं है। इन दोनों दवाओं को मिलाने का एक प्रयोजन हो सकता है। केंद्र सरकार ने पेरासिटामोल को आवश्यक दवाओं की सूची में रखा है। उसकी कीमत तय है। यदि कंपनी केवल पेरासिटामोल ही बेचती है,तो उसे नियंत्रित कीमत पर ही बेचना पड़ता है। किंतु यदि इसे संयोजन करके बेचा जाता है, तो कंपनी मनमानी कीमत बसूल सकती है। इस तरह से मूल्य नियंत्रण से बचने के लिए अनेक दवाओं का संयोजन किया जाता है। हानिकारक दवाओं का संयोजन बेचने का दूसरा कारण यह है कि भारतीय बाजारों में अमूमन 300 दवाएँ ही बेची जाती हैं।  दवा कंपनियों में नई लाभकारी दवाओं के आविष्कार की क्षमता नहीं है,इसलिए वे पुरानी दवाओं का संयोजन कर उसे नए नाम से बेचती हैं। इससे मरीजों के स्वास्थ्य के साथ खुला खिलवाड़ किया जा रहा है। भारत की सिप्ला, रेनबक्सी, सन फार्मा और केडिला जैसी कंपनियाँ करीब 8 हजार करोड़ रुपए की हानिकारक दवाएँ बाजार में बेच रही हैं।

              डॉक्टर और दवा कंपनियों के बीच एक ऐसा अलिखित समझौता होता है, जिससे वह अधिक कमीशन मिलने पर हानिकारक दवा भी लिख देता है। देश में चल रहे भ्रष्टाचार के तहत दवा कंपनियां रिश्वत देकर दवाएं बेचने की अनुमति ले लेती हैं। मरीज पर इन दवाओं का क्या असर हो रहा है,यह जानने की जहमत कोई नहीं उठाना चाहता। बैक्टिरिया संक्रमण के लिए जो दवा इस्तेमाल में लाई जाती है, उसका नाम है सिफिकजाइम। इस दवा के साथ अमीबा के संक्रमण के इलाज के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली ओर्नीडिजोल है। मरीज को इन दोनों में से किसी भी प्रकार का संक्रमण हो, तो डॉक्टर यह दवा लिख देते हैं। इससे हानि यह है कि जिसे संक्रमण नहीं है, उसे संक्रमण तो हो जाएगा। हमारे देश में दवाओं के नाम पर जो अंधेरगर्दी चल रही है, उसका ज्वलंत उदाहरण है, एनिमिया के इलाज के लिए एक नहीं, दो नहीं, कुल 338 दवाएँ हैं। कर्नाटक के ड्रग एक्शन फोरम के एक शोध में यह जानने को मिला कि इन 338 में से एक ही दवा को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने  मान्यता दी है। यानी संगठन की मार्गदर्शिका के अनुसार 338 में से केवल एक ही दवा कारगर है। इस दवा का नाम है फेरस यूमेरेट। इसकी एक टेबलेट की कीमत मात्र 13 पैसे है। आश्चर्य की बात यह है कि यह दवा किसी भी मेडिकल स्टोर्स में नहीं मिलती, क्योंकि इसे बेचने में विक्रेता को मुनाफा नहीं के बराबर होता है। इसके बदले में मेडिकल स्टोर्स वाले संयोजन से तैयार दवा बेचते हैं। जो अमानक तो होती ही हैं,इसके अलावा महंगी भी होती हैं। डॉक्टर भी उस 13पैसे वाली दवा के बदले संयोजन से तैयार दवा बेचते हैं। क्योंकि इसमें उनका कमीशन भी जुड़ जाता है। दवा कंपनियों, डॉक्टर और मेडिकल स्टोर्स वालों की मिलीभगत से मरीजों के स्वास्थ्य से इस तरह का खिलवाड़ हो रहा है। सरकार चुपचाप तमाशा देख रही है। मूल और सस्ती दवा बाजार से गायब और महंगी और मिश्रित अमानक दवा बाजार में उपलब्ध, शायद यही है हमारे देश का असली चेहरा।

                    यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि डॉक्टरों को नई दवाओं के मामले में सच्ची और प्रामाणिक जानकारी की आवश्यकता हो, तो उसके लिए कोई स्रोत ही नही है। नई दवाओं की जानकारी डॉक्टरों को दवा कंपनियों के एजेंट से प्राप्त होती है। कंपनियाँ अपनी दवाओं के हानिकारक असर को छिपाती हैं। यदि डॉक्टर को इसका पता चल भी जाता है, तो भी वह मरीज को यह दवा लिखने में संकोच नहीं करता। उदाहरण के लिए हाइपर टेंशन के लिए इस्तेमाल में लाई जा रही कार्वेदिलोल से डायबिटिज होता है। इसकी जानकारी कई चिकित्सकों को होगी। केंद्र सरकार के ड्रग कंट्रोलर जनरल के पास इस दवा के इस असर की जानकारी मिलती भी है,तो वह डॉक्टरों तक यह जानकारी नहीं पहुँचाता। यदि गलती से पहुँचा भी दिया,जो डॉक्टर इतने ईमानदार नहीं हैं कि वे यह जानकारी मरीजों तक भी पहुंचाएँ। वास्तव में इन दवाओं पर तुरंत ही रोक लगा देनी चाहिए। किंतु दवा कंपनियों के ऊँची पहुंच को देखते हुए ऐसा नहीं हो पाता। इससे लोगों के स्वास्थ्य पर क्या असर होता है,यह जानने की फुरसत किसी के पास नहीं है। सभी देश अमेरिका की तरह सजग और सचेत नहीं होते। वहाँ मर्क नामक एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने वायोक्स नामक दवा बाजार से वापस बुला ली। इसके बदले में दवा कंपनी को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ। जोड़ों में दर्द के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली इस वायोक्स दवा लेने से अमेरिका समेत कई देशों के हजारों लोगों को हार्ट अटेक हुए थे। इस दवा के इस्तेमाल से कई लोगों की मौत भी हुई थी। तब परिजनों ने दवा कंपनी पर मुकदमा ठोक दिया, इससे उन्हें करोड़ों डॉलर का हर्जाना भी मिला।

                 यूरोप और अमेरिका में जो दवाएँ प्रतिबंधित हैं, वे सभी हमारे देश में खुले आम मिल रही हैं। उदाहरण के लिए फिनिलप्रोपेनोलेमाइन नामक सर्दी की दवा लेने से हृदयाघात हो सकता है,इसकी बिक्री पर अमेरिका-यूरोप में रोक लगा दी गई है। लेकिन यह दवा हमारे देश में आसानी से मिल जाती है। इसी तरह एनाल्जिन से खून के श्वेत कणों की कमी होती है, किंतु यह दवा भारत में खुले आम बिक रही हैं। डाइजिन और फोरेक्स जैसी दवाओं पर अनेक देशों ने प्रतिबंध लगा रखा है, पर हमारे यहाँ उपलब्ध है। ड्रग कंट्रोलर जनरल के 294 दवाओं पर प्रतिबंध लगाने के आदेश को राज्य सरकारों ने अनदेखा कर दिया। इसीलिए मरीजों से यह कहा जाता है कि जब तक बहुत ही आवश्यक न हो, तब तक कोई दवा लें ही नहीं, आवश्यक हो, तो ही विश्वसनीय चिकित्सक के पास जाकर उससे दवा लें, तभी हमारा और हमारे परिवार का स्वास्थ्य ठीक रह सकता है। वरना सरकार तो पूरी तरह से हमारे स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर ही रही है।

? डॉ. महेश परिमल