संस्करण: 11  जून-2012

शिक्षा व्यवस्था में काफी चिंतन की जरूरत

? डॉ. सुनील शर्मा

               स्कूल कालेजों में नया शिक्षण सत्र की शुरूआत होने वाली है। बच्चों में उत्साह है,चिंताएॅ भी है और भय भी? छोटा बच्चा अपनी नई पुस्तकों के साथ प्रसन्न है और नए स्कूल में लगे झूले उसे रोमांचित कर रहे हैं,शायद यह सोचते हूए कि इस स्कूल में उसे पढ़ाई का ज्यादा झंझट नहीं रहेगा जब मन हो तो झूले पर बैठने मिलेगा?एक माध्यमिक स्तर की कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चे के मन में चिंताएॅ हैं कि वो कौन सा विषय पढ़े?उसे मनचाहा विषय मिलेगा या नहीं?उसके द्वारा चाहे गए स्कूल में प्रवेश मिल पाएगा?और कालेज में जाने वाला बच्चा एक अलग ही भय का सामना कर रहा है शायद उसे डर है कि उसे किसी अच्छे कालेज में एडमीशन मिला तो वो अपने नए साथियों के साथ अच्छे से अग्रेंजी में बात नहीं कर पाएगा। और किसी अच्छे कालेज में एडमीशन नहीं मिला तो उसका भविष्य बर्बाद हो जाएगा। बच्चों के साथ उनके पालक भी चिंताग्रस्त है कल ही मुझे एक सज्जन मिले थे वो अपनी आठ साल की बच्ची की पढ़ाई को लेकर चिंतित हैं वो बता रहे थे कि उनकी बिटिया काफी प्रतिभाशाली है और वो उसे अग्रेंजी माध्यम के स्कूल में पढ़ा रहे हैं। लेकिन वो देखते है कि उनकी बिटिया अंग्रेजी को लेकर अत्याधिक तनाव महसूस करती है और अग्रेंजी को लेकर गणित जैसे महत्तवपूर्ण विषय में भी पीछे हो रही हैं। उनकी चिंता इस बात की भी है कि उस अग्रेंजी माध्यम के स्कूल में शिक्षक भी स्तरीय समझ में नहीं आते है। उन्हें लगता है कि इस अग्रेंजी माध्यम की पढ़ाई के चक्कर में उनकी बच्ची का मानसिक विकास न रूक जाए? अब वो सोच रहें हैं कि उसे किसी अच्छे हिन्दी माध्यम के स्कूल में पढ़ने भेजें है। कुछ दिन पहले मुझे कस्बे के कालेज के एक लेक्चरर महोदय मिल गए थे वो अपनी छह साल की बच्ची को अच्छे से अच्छे स्कूल में एडमीशन कराना चाहते थे वो बता रहे थे कि उन्होंने कस्बे के सारे अच्छे और नामी माने जाने वाले स्कूलों में जाकर देखा लेकिन वहॉ पढ़ाने वाले अधिकांश शिक्षक उनके वो विद्यार्थी निकले जो बमुश्किल से ग्रेजुएट हो पाए थे कुछ तो ऐसे शिक्षक  मिले जिन्होनें कालेज की प्रथम वर्ष की पढ़ाई ही अधूरी छोड़ दी थी,शिक्षण में प्रशिक्षित शिक्षक तो मिले ही नहीं। उनका कहना है ऐसे कमजोर शिक्षक बच्चों को कैसे अच्छी  शिक्षा दे पाएॅगें?अंतत: चितिंत लेक्चरर महोदय ने अपनी बच्ची का एडमीशन उस स्कूल में कराया जिसमें बच्ची ने कहा कि पापा इस स्कूल मे अच्छे अच्छे झूले हैं? चलो अच्छे शिक्षक न सही अच्छे झूले तो हैं,बच्ची प्रसन्न रहेगी?

               अभी मुझे कस्बे के एक स्पोकन अंग्रेजी की कोचिंग संस्थान में जाने का सुअवसर मिला, काफी भीड़ थी स्कूली बच्चों से लेकर नौकरी पेशा आदमी और गृहणियॉ भी उसमें अग्रेजी बोलना सीखने आते है, कोचिंग संचालक ने बताया कि वो अग्रेंजी बोलना सिखाने  के साथ साथ व्यक्तित्व विकास के गुर भी सिखाते हैं जो कि अग्रेंजी बोलने के बाद ही आते हैं कुल मिलाकर उनका कहना है कि अंग्रेजी के बगैर व्यक्तितव विकास नहीं हो सकता है?और कस्बे के बगैर व्यक्तितव विकास  के नौकरी नहीं मिलती? कस्बे के इस अग्रेंजी शिक्षक की कमाई कम से कम एक लाख रूपया प्रतिमाह है। पिछले दिनों मुझे एक शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला यह कार्यक्रम प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों को क्रियात्मक आधार पर पढ़ाई तरीके सिखाने के लिए आयोजित था। जिससे शिक्षक बच्चों को पढ़ाई प्रति आर्कषण पैदा कर सके,लेकिन प्रशिक्षु शिक्षक नई विधियॉ सीखने की बजाए इधर उधर चर्चाओं के साथ प्रशिक्षण के दौरान मिलने वाले भत्ते आदि की चर्चाओं में ज्यादा मशगूल नजर आ रहें थे? प्रशिक्षण देने वाले शिक्षक ने बताया कि नए और युवा शिक्षक तो इस कार्यक्रम में कुछ रूचि ले रहें हैं मगर अधेड़ उम्रदराज़ विशेषकर पचास के उपर के शिक्षक इसमें रूचि नहीं ले पाते हैं मगर ट्रेनिंग सबको अनिवार्य है सो बैठे है।

                 कुल मिलाकर भारतीय शिक्षा व्यव्स्था  चिंता का कारण बन चुकी। पहला चिंतन तो शिक्षा के माध्यम को लेकर है। पालकों को अपने बच्चों को अग्रेंजी के मोह को छोड़ उस माध्यम के स्कूल में प्रवेश दिलाना चाहिए जहॉ उनकी स्थानीय भाषा में शिक्षण कराया जाता है क्योंकि बच्चा स्कूल के बाहर और घर में अपनी मातृ भाषा का ही प्रयोग करता है उसी में चिंतन करता है फिर अग्रेंजी का बोझ उसकी तर्कशक्ति और गणित सीखने की क्षमता पर बुरा असर डाल सकता है जो कि उसके भविष्य में सर्वाधिक उपयोगी होते है। पालकों को बच्चों को स्कूल में प्रवेश दिलाने के पूर्व शिक्षकों बायोडाटा पर प्रबंधन से चर्चा करना जरूरी है ताकि प्रबंधन ये जाने कि पालक हमारे शिक्षक पर नजर रखते है और सस्ते और अयोग्य शिक्षकों से काम चलने वाला नहीं है। जहॉ विषय चयन की बात है तो पालकों को समझना होगा कि तमाम विषयो में बराबर संभावनाएॅ हैं ऐसे में बच्चे की रूचि किस विषय में है? उस पर ही जोर दिया जाए। अग्रेंजी या कोई अन्य भाषा को निखारने में सहायक जरूर हो सकती है लेकिन व्यकितत्व की निर्माण करने वाली नहीं। अच्छे व्यक्तित्व का निर्माण विषय के ज्ञान  और कार्यक्षमता के विकास से होता है।सरकारी स्कूलों के बदतर होते हालात सुधारने के लिए जरूरी है उनमें योग्य और युवा शिक्षकों की नियुक्ति की जाए। अक्सर सुनने में आता है कि सरकार शिक्षकों की रिटार्यड होने की आयु बढ़ाना चाहती है वास्तव में यह शिक्षा के सुधार में घातक कदम साबित हो गया क्योंकि बढ़ती उम्र में सीखने की क्षमता समाप्त हो जाती है जबकि अच्छा शिक्षक वो है जो सतत सीखे और पढ़ता रहे।वास्तव में व्यापार बनती भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर काफी चिंतन की जरूरत है।

? डॉ. सुनील शर्मा