संस्करण: 11 जुलाई- 2011

फर्जी फायनेंस कम्पनियों की लूट में बैंकों का रवैया सहायक?

? डॉ. सुनील शर्मा

               फर्जी फायनेंस कम्पनियों द्वारा म.प्र. में किया गया ठगी का कारनामा चर्चा में हैं। अभी तक लूट का ऑकड़ा लगभग पॉच सौ करोड़ से भी उपर निकल गया है। कम्पनी संचालकों में प्रदेश में सत्ताधारी बीजेपी के मंत्रियों के रिश्तेदारों के नाम आए हैं। अत:इन पर आसानी से कोई कार्यवाही होगी ऐसा सोचना ही कठिन है। लुटने वालों में अधिकांश गरीब और मध्यम वर्ग के उपभोक्ता है जो अपनी रोज की कमाई का कुछ हिस्सा इन कम्पनियों के एजेण्टों के हाथ हर दिन रख देते थे अब ये अपने खून पसीने की कमाई गाढ़ी कमाई लुट जाने से स्तब्धा है। अधिकांश ने तो इस सोच के साथ इनमें पैसा जमा किया होगा कि बड़े बड़े नेता और मंत्रियों के रिश्तेदार इनसे से जुड़े हैं अत: धोखा थोड़े होगा लेकिन लुट ही गए। हालॉकि फर्जी कम्पनियों द्वारा की गई ये लूट कोई अनोखी या एकमात्र घटनाएॅ नहीं है, हम आए दिन आम आदमी के इनसे लुटने के समाचार सुनते रहते हैं। पिछले माह गुजरात में अभय गॉधी नाम के एक ठग ने एक गैर बैंकिग फायनेंस कम्पनी बनाकर नौ महीने में रकम दोगुनी करने का झॉसा देकर एक लाख उपभेक्ताओं खासकर गरीबों और मध्यमवर्गीय गुजरातियों के करीब हजार करोड़ रूपये ठग लिए। इसके बाद वह अपने परिवार के साथ नौ दो ग्यारह हो गया,उसके ग्राहक सदमे में है। पिछले वर्ष पूर्वी उ.प्र. के गोरखपुर क्षेत्र में भी ऐसे ही फर्जीवाड़े में हजारों नागरिक लुटे थे।इस तरह फर्जी कम्पनियों  द्वारा देश भर में लगातार ठगी की जा रही है। इस संदर्भ में रिजर्व बैंक का आंकलन है कि पिछले पॉच वर्षो के दौरान तेजी से पैसा बढ़ाने का झॉसा देकर नागरिकों के कई हजार करोड़ रूपये फर्जी वित्त कंपनियों ने हड़प लिए हैं। ये कंपनियॉ लुभावने नाम और वायदों के साथ बाजार में आती है,झकाझक आफिस खोलती हैं स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार का आश्वासन देकर वसूली के काम पर लगाती है और अल्प समय में स्थानीय लोगों के बीच विश्वास पैदाकर लम्बी रकम इक्ट्ट्ठा होने पर आफिस बंद कर अपना बोरिया बिस्तर समेट गायब हो जाती है। आम आदमी को जब कम्पनी का आफिस बंद मिलता है और कंपनी द्वारा दिए गए चैक बाउंस हो जाते है तब अपने लुटने का अहसास होता है। कुछेक कम्पनियॉ नियामक ऐजेन्सियों से नान बैंकिग फायनेंस कम्पनी की अनुमति भी हासिल कर लेती है लेकिन अनुमति जिस काम की होती है वह काम बिल्कुल नहीं करती हैं। बल्कि अपने ऐजेण्टों और कर्मचारियों को निवेश के नाम पर रूपया इकट्ट्ठा करने के काम में लगा देती है। इनके ऐजेण्ट पूॅजी पर बैंक से अधिक ब्याज का लालच देकर नागरिकों का पैसा जमा कराते हैं। पहले इन कम्पनियॉ ने प्लांटेशन, बकरी या सुअर पालन के व्यवसाय में पैसा लगाने के नाम पर ठगा तो अब रियल इस्टेट में पैसा लगाने का लालच दिया जा रहा है।

       आश्चर्य की बात है कि हमारे देश में मजबूत बैंकिंग व्यवस्था है,रिजर्व बैंक जैसा नियामक तंत्र है और सख्त कानून व्यवस्था है इसके बाद भी आम आदमी के साथ खुलेआम लूट जारी है।अब यह विचारणीय है कि इसमें कमी किस स्तर पर है जिसका फायदा ये लुटेरे लेते हैं। सबसे पहली कमी है- बैंकिंग व्यवस्था अब भी आम आदमी से दूर है। बैंकों के राष्ट्रीय करण के बाद ये सोच बन गई थी कि अब बैंक तक आम आदमी की पहुॅच आसान होगी। लेकिन देश के लाखों गॉवों में बैंकिंग सुविधा अभी भी उपलब्ध नहीहैं। शहरों और कस्बों की बैंकों में आम आदमी को दुत्कारा जाता है क्योंकि यहॉ उनकी प्राथमिकता में सरकारी कर्मचारी और व्यापारी होते हैं इनके जरिये अपना कोटा पूरा कर लेते है।अगर आम आदमी इनमें अपना बचत खोल पाए तो सौभाग्य की बात है। ये बैंक बचत खोलने पहुॅचे ग्राहक को इतनी औपचारिकताओं में लाद देते हैं कि वो इनसे दूर रहना ही बेहतर समझता हैं। स्टेट बैंक जैसा बैंक भी आम आदमी और विद्यार्थियों तक से किनारा करना चाहते हैं। म.प्र.के एक कालेज के छात्र मुझे बता रहे थे कि उनकी छात्रवृत्ति सीधे बैंक खाते में जमा करने का प्रावधान है इसके लिए वो अपने कस्बे की स्टेट बैंक शाखा के चक्कर लगा रहें है मगर बैंक में कहा गया है कि खाता खोलने के लिए एक हजार रूपये जमा करना ही होगें तब खाता खुल पाएगा। इसी बैंक ने स्कूली बच्चों के खाते भी एक हजार की राशि से खोलकर उन्हें चैक बुक और एटीएम कार्ड पकड़ा दिया गया है। एक और प्रकरण में एक बैक प्रबंधक ने खाता खोलने गए एनजीओ संचालकों को यह कहकर खाता खोलने से मना कर दिया कि तुम लोग सरकारी पैसा खाओगे। वास्तव में आम आदमी बैंको की प्राथमिकता में है ही नहीं अत: इन्हें दूर रखने के इनके पास हजार वहाने है। अब चूॅकि बचत आम आदमी की एक स्वाभाविक आदत और जरूरत है एवं हर कोई अपनी बचत को सुरक्षित रखना चाहता है ऐसे में जब बैंक उसे दुत्कारते है तब ये फर्जी संस्थानॅ उसे दुलारते है, बचत पर आकर्षक ब्याज का प्रलोभन देते हैं।रोजाना शाम को इनका ऐजेंण्ट इनके दरवाजे पर जाकर किश्त ले आता है और फिर कभी कभी लकी ड्रा के जरिए उपहार भी मिलता है। सरकारी बैंको जो कि खाता खोलने भी तैयार नहीे होती है उसकी जगह से बैंके इतना सब कुछ करने तैयार तो आम आदमी इनके झॉसें में आएगा ही। वास्तव में फर्जी वित्तीय कम्पनियों की लूट में सरकारी बैंकों की यह रवैया सहायक सिद्व हो रहा है। अगर सरकारी बैंके आसानी से बचत खाता खोलने तैयार हो जाएॅ तो आम आदमी इनसे जुड़ना ही पसंद करेगा। इसके लिए सरकारी बैंको को आम आदमी के प्रति अपनी सोच में परिवर्तन के साथ साथ गॉव गॉव तक अपनी सेवाओं की पहुॅच  बनानी चाहिए। बैंकिग कारस्पोंडेंस और बिजेनिश फैसिलेटर व्यवस्था को कार्यरूप में परिणित कर ये अपनी पहुॅच व्यापक कर सकते है मगर इसमें झिझक और धीमी गति सोचनीय है जबकि वसूली का काम निजी  ऐजेण्टों से करवाने कोई झिझक नहीं है?

               वास्तव में रिजर्व बैंक को बैकों की कार्यप्रणाली में दुरस्ती करण के निर्देश देना चाहिए। इन नान बैंकिग फायनेंस कम्पनी और चिटफण्ड संस्थाओं के मानीटरिंग का का कार्य भी रिजर्व बैंक को तहसील स्तर के बड़े बैंक को सौंपना चाहिए क्योंकि बैंकिंग की बारीकियॉ पुलिस और प्रशासन की बजाए इनके अधिकारी आसानी से समझ सकते हैं। आम आदमी को निवेश और बैंकिंग से ठगी से बचाने के लिए उन्हें शिक्षित करने की भी जरूरत है । इसके लिए निवेशक जागरूकता अभियान भी चलाया जाना चाहिए। स्कूल और कालेज स्तर पर इस विषय पर विशेषज्ञों के व्याख्यान आयोजित होना चाहिए। क्योंकि आज का विद्यार्थी कल का नागरिक है।


? डॉ. सुनील शर्मा