संस्करण: 11 जुलाई- 2011

एक और कबीर का कफन

? प्रकाश दुबे

               यह जानने में किसको दिलचस्पी है, कि शरीर को लकवा मारता है तब पीड़ा का एहसास चुकना कितना पीड़ादायक होता है ? किसी शहर को कर्फ्यू में झोंकना उस शहर पर पक्षाघात के प्रहार से कम नहीं है। शहर के किसी छोटे हिस्से में कर्फ्यू लगना उस हिस्से का बाकी इलाको से कुछ घंटों या दिनों के लिए कट जाना है। सुन्न हो जाना है। तकलीफ बढ़ जाती है, जब वह ऐसा इलाका हो जहां आधी रात के बाद भी कोई भूखा पेट भर सकता है। जहां का रतजगा इलाके और शहर की शान के रूप में दूर-दूर तक शोहरत की खुशबू फैलाने वाला हो। पांच दिन तक शहर का एक हिस्सा अपने होने का एहसास खो देता है। कट जाता है। बेसुध हो जाता है। उस व्यक्ति की याद में जिसने करीब 25 बरस पहले बोलना बंद कर दिया था। शवयात्रा में शामिल हजारों लोग यह जतलाने आए थे कि मुस्तफा बाबा के मौन से उन्हें प्रेरणा मिली। बाबा के चहेते मानते थे कि बाबा कुदरती कमाल से औरों का भला करते थे। उनके श्रध्दालुओं को यह आस्था रखने का हक है कि अखबार की कतरन काट कर बाबा लोगों की दुश्वारियां दूर करने की ताकत रखते थे। इस्लाम में टोने-टोटके के लिए स्थान नहीं है। लोग यह मानने के लिए स्वतंत्र हैं कि परमेश्वर अपनी शक्तियों को समर्थकों के माध्यम से प्रकट कर सकते हैं।

               यह एक धार्मिक विषय है, जिस पर हर धार्मिक व्यक्ति को अपने विचार रखने का अधिकार है। अफसोस इस बात का है कि मुस्तफा बाबा के अंतिम संस्कार को लेकर बखेड़ा खड़ा हुआ। बाबा को नागपुर के ताजाबाग क्षेत्र में सुपुर्दे खाक करने का फैसला हो चुका था। औलिया बाबा ताजुद्दीन की समाधि से कुछ ही दूरी पर। नमाजे जनाजा भी वहीं की मस्जिद में पढ़ी गई। इसके बाद बाबा की शवयात्रा का रुख अचानक मोमिनपुरा की तरफ हुआ। बाबा बरसों से मोहम्मद अली सराय के पास निर्विकार भाव से बैठे रहते थे। उसी सराय के एक हिस्से में कब्र खोदने का काम शुरु हुआ। मध्यरात्रि के बाद करीब तीन बजे सन्नाटे के कफन में बाबा के नश्वर शरीर को सुपुर्दे खाक किया गया। विरोध करने वालों का कहना है कि न तो कानूनी और न धार्मिक दृष्टि से बाबा का अंतिम संस्कार वर्तमान स्थल पर किया जाना जायज ठहराया जा सकता है। बाबा के नए-पुराने श्रध्दालुओं का तर्क है कि जीवन के चमकीले साल जिस जगह बिताए उसके आसपास ही उनकी समाधि रहे। आप इसे कब्र कहें। मजार कह लें। दोनों ही पक्ष भली-भांति जानते हैं कि बाबा तो परमेश्वर या अल्लाह ताला में लीन हुए। उनके स्मृति-स्थल पर श्रध्दालुओं का समागम जारी रहेगा। सराय से जुड़े लोगों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। अंतिम संस्कार के वक्त ऊंघ रही पुलिस चौकन्नी हुई। लाठियां थामीं। शहर में कर्फ्यू जारी हुआ। एक बारगी फिर साबित हुआ कि दुनिया के इतिहास से कोई समुदाय सबक सीखने के लिए राजी नहीं है। भारत ने 1947 में आज़ादी पाई। कुछ बरस बाद ही अयोध्या में एक ढांचे का विवाद खड़ा हुआ। हमारी आजादी और इस विवाद की उम्र में बहुत अधिक अंतर नहीं है। एक खुशी और एक नासूर को हम साथ-साथ झेलने के लिए आज भी अभिशप्त हैं। शायद ही कोई न्यायालय सर्वसम्मत हल दे सके। कलह की कब्र पर प्यार के फूल उगाने वाले अनेक शहरों में छोटे-मोटे अयोध्या की आशंका बनती-पनपती रहती है। देश के मध्य में बसे नागपुर शहर में एक ईश्वर पर आस्था रखने वाले एक ही धार्मिक समुदाय का टकराव किसी नादानी में छोटा-मोटा अयोध्या उगाने का कारण तो नहीं बनेगी  ? यह सवाल उठ खड़ा हुआ है।

               मामला भावनाओं से जुड़ा है। इसलिए पेचीदा है। अदालत पर हर मसला छोड़ने से वक्त तो जाया होता ही है। यह भी साबित होता है कि धार्मिक-सामाजिक मुखिया अपनी ताकत खो रहे हैं। ताकत न सहीं, आत्मविश्वास तो खोया ही है। किसी को दफन करने का मामला भी अदालत पर छोड़ने की नौबत आई। आनी नहीं चाहिए थी। दलील दी जाती है कि कब्र जहां बनी। वहीं रही। इतिहास इस दलील से सहमत नहीं है। मुमताज महज को वर्तमान मध्यप्रदेश के बुरहानपुर शहर में दफन किया गया था। शाहजहां ने ताजमहल बनाया। मुमताज महल का पार्थिव शरीर यमुना तट पर ताजमहल में दफन किया गया। शाहजहां के धर्मपरस्त बेटे औरंगजेब ने आजीवन इसे माना। फिरंगियों से देश को आजाद करने के लिए 1857में बेटों और ताज को खोने वाले बहादुर शाह जफर को अंगरेजों ने देश निकाला देकर वर्तमान म्यांमार के मंडाले जेल में रखा। हर देशभक्त भारतवासी चाहता है कि बहादुर शाह को भारत लाकर दफन किया जाए। देश उन्हें हर वक्त श्रध्दांजलि दे सके। वैसे भी इस्लाम ने किसी को कहीं भी दफन करने की अनुमति नहीं दी है। अपनी मर्जी से ऐसा कर हम मृतक के प्रति अन्याय तो नहीं कर रहे हैं ? इस मसले पर नागपुर के एक मुफ्ती मौलाना अयूब इमाम ने हाल में फताव ए मुस्तफिया का उल्लेख किया। बरेली के मुफ्ती अहमद रजा खां के साहबजादे मुस्तफा रजा खां ने इस किताब में फतवां का जिक्र किया है। दूसरे की जमीन पर कब्र खोदकर दफन करने की स्थिति में उन्होंने तीन विकल्प सुझाए हैं-1. तो यह कि कब्र खोदकर शव निकालकर बाहर रख दें। 2. कब्र को समतल कर निशानदेही मिटा दें। 3.उस स्थान पर खेती करें। इन विकल्पों से विवाद ठंडा करने में मदद मिलेगी या नया बखेड़ा खड़ा होगा ?

               उत्तर प्रदेश में एक जिले का नाम संत कबीर नगर है। संत कबीर ने अंतिम सांस मगहर में ली। श्रुतियों के मुताबिक हिन्दू-मुसलमान अंतिम संस्कार पर झगड़ गए। इस बीच किसी ने कफन खोला। नश्वर देह गायब थी। कफन के दो टुकड़े कर अपनी अपनी विधि से अंतिम संस्कार हुआ। संत कबीर नगर में कबीर मंदिर से लगकर कबीर की मजार है। आजीवन पाखंड से दूर रहने वाले कबीर की ऐसी दुर्गति सिर्फ हम भारतीय ही कर सकते हैं। पाकिस्तान के शायर ज़हूर नज़र ने शायद इस हादसे पर कलप कर लिखा होगा-मेरी गर्दन न झुकी तन से जुदा भी न हुई। खुश खुदा भी न हुआ, खल्के-खुदा (जनता) भी न हुई।

               अनेक सवाल हैं जिनका उत्तर मुस्तफा बाबा और इस्लाम को मानने वालों के साथ ही सामाजिक सद्भाव की इच्छा रखने वालों को तलाश करने होंगे। इस्लाम में पक्की मज़ार बनाने की मनाही है। विश्व के एक प्रमुख धार्म इस्लाम के पैगम्बर की मदीना में पवित्र कर कब्र जैसी सादगी की दूसरी मिसाल और कहां होगी ? मुस्तफा बाबा की तिजारत रोकने का दायित्व उनके समर्थकों के साथ समूचे समुदाय पर हैं। वे सोचें कि बाबा के नाम पर कोई मदरसा या ऐसी ही सर्वजनहिताय संस्था आरंभ करना पसंद करेंगे या एक और धार्मिक विवाद अदालत के सिपुर्द करना पसंद करेंगे ? मुंशी प्रेमचंद ने पंच-परमेश्वर कहानी में गांव की अदालत का मान किसी कानून से बढ़कर है। समाज में अभी भी अनेक अलगू साव और जुम्मन चौधरी हैं। वे मुंह खोलें। समाधान मिलेगा।


? प्रकाश दुबे