संस्करण: 11 जुलाई- 2011

कश्मीर चाहिए, कश्मीरी नहीं   

? एल.एस.हरदेनिया

               भारतीय जनता पार्टी हर हाल में कश्मीर को भारत का भाग बनाए रखना चाहती है परंतु कश्मीरियों के एक बड़े हिस्से को संदेह की निगाह से देखती है। यह विडंबना अभी हाल में मध्यप्रदेश में उछले एक विवाद के संदर्भ में सामने आई। जब आप किसी पर  संदेह करेंगे तो वह आपका कैसे हो सकता है। 

               कश्मीर के अनेक छात्र-छात्रायें मधयप्रदेश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ने आते हैं। पिछली दो जुलाई को जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने यह आरोप लगाया कि मधयप्रदेश में जम्मू कश्मीर के छात्र-छात्राओं के साथ भेदभाव हो रहा है। मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि हिन्दुत्व से जुड़े संगठन, कश्मीर के छात्र-छात्राओं के विरूध्द वातावरण बना रहे हैं और उनके अधययन में कठिनाई पैदा कर रहे हैं। कश्मीर के मुख्यमंत्री ने अपनी टिप्पणी इंडियन एक्सप्रेस के 28 जून के संस्करण में छपे संपादकीय के संदर्भ में की थी। संपादकीय में इस बात पर चिंता प्रगट की गई थी कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के दबाव में मधयप्रदेश के शिक्षण,संस्थान कश्मीर के छात्र-छात्राओं को प्रवेश नहीं दे रहे हैं।

               कश्मीर के मुख्यमंत्री की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया प्रगट करते हुए प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने उसे अनावश्यक बताया। उनका कहना था कि कश्मीर के मुख्यमंत्री, कॉलेजों में प्रवेश के मुद्दे को सांप्रदायिक रंग दे रहे हैं।

               संघ परिवार से जुड़े संगठन, कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते हैं, वे श्रीनगर में तिरंगा फहराना चाहते हैं, कश्मीर का अलगाव समाप्त करने के लिए धारा 370 हटाना चाहते हैं परंतु कश्मीरियों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। संघ परिवार को यह समझना चाहिए कि कश्मीर की जनता के साथ भेदभाव कर, कश्मीर को भारत के साथ नहीं रखा जा सकता।  संघ परिवार को यह भी समझना चाहिए कि पिछले कुछ महीनों में कश्मीर में अनेक सुखद परिवर्तन हुए हैं। वहां अभी हाल में पंचायत चुनाव हुए थे। वहां के कुछ राष्ट्रविरोधी तत्वों ने पंचायत चुनावों केबहिष्कार का आव्हान किया था परंतु जनता ने इसे नकार दिया और चुनाव में भारी मतदान हुआ। अनेक स्थानों पर 95प्रतिशत तक मतदान हुआ। कई ऐसी पंचायतों में, जहां 90 प्रतिशत से ज्यादा मतदाता मुसलमान हैं,  हिन्दुओं या सिक्खों को सरपंच चुने गए हैं। पिछले कुछ महीनों में कश्मीर आने वालेपर्यटकों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई हैं। इसका अर्थ यह है कि कश्मीर का आम आदमी आतंकवादी हिंसा से परेशान है,वह भी शाँति का वातावरण चाहता है व सामान्य जीवन जीना चाहता है। यदि कश्मीर के छात्र-छात्रायें मध्यप्रदेश और दूसरे राज्यों में पढ़ने जाना चाहते हैं तो उसका कारण यह है कि कश्मीर में अध्ययन-अध्यापन के लिए उचित वातावरण नहीं है।इसलिए बड़ीसंख्या में कश्मीरी दूसरे राज्यों में अध्ययन के लिए जाते हैं।

               विद्यार्थी परिषद ने यह आरोप लगाया कि कश्मीर के छात्र-छात्रायें जिन छात्रावासों में रहते हैं वहां रहने वाले स्थानीय छात्र-छात्राओं को वे भ्रमित करते हैं। 

               शिक्षामंत्री और भोपाल विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर निशा दुबे ने भले ही कश्मीर के मुख्यमंत्री के आरोपों को बेबुनियाद बताया हो परंतु यह वास्तविकता है कि मध्यप्रदेश में प्रवेश के ऐसे नियम बनाये गए हैं जिनसे कश्मीर के बच्चों को यहां के कालेजों में प्रवेश पाना कठिन हो गया है। नए नियमों के अनुसार 80प्रतिशत सीटें मध्यप्रदेश के छात्र-छात्राओं के लिए आरक्षित हैं। उसके बाद जो सीटें बचती हैं वे दूसरे राज्यों के छात्र-छात्राओं को दी जाती हैं। इस तरह,दूसरे राज्यों के लिए आरक्षित सीटों में कश्मीर के छात्र-छात्राओं के लिए एक भी सीट नहीं बच पाती है। यह दु:ख की बात है कि मध्यप्रदेश सरकार ने विद्यार्थी परिषद के दबाव में प्रवेश संबंधी नीति में परिवर्तन किए हैं। अभी तक सरकारी नियमों में ''कश्मीर के विस्थापित विद्यार्थियों'' की चर्चा थी। अब नियमों में से विद्यार्थी शब्द को हटा दिया गया है और सिर्फ ''विस्थापित कश्मीरियों''को प्रवेश देने की बात कही गई है। इस परिवर्तन के बाद, मध्यप्रदेश की शिक्षण संस्थाओं में कश्मीर से विस्थापित पंडित छात्र-छात्राओं को ही प्रवेश दिया जा सकता है।

               कुल मिलाकर, कश्मीर के छात्र-छात्राओं को प्रवेश नहीं देने की बात इसलिए हो रही है क्योंकि प्रवेश पाने के इच्छुक छात्र-छात्रायें मुसलमान हैं। दु:ख की बात है कि विद्यार्थी परिषद के इस सांप्रदायिक रवैये को राज्य सरकार ने स्वीकार कर लिया है। सिर्फ इसलिए कि कश्मीरी छात्र मुसलमान हैं,उन्हें प्रवेश न देना या उनके विरूध्द विषैला वातावरण बनाना राष्ट्रहित में नहीं है। यदि संघ परिवार उन्हें भारत का नागरिक मानता है तो उन्हें देश के किसी भी हिस्से में पढ़ने का अधिकार होना चाहिए।

               भाजपा समेत संघ परिवार के इस  संकुचित रवैये की निंदा सर्वत्र हो रही है। अभी हाल में वरिष्ठ कांग्रेस नेता हनुमंत राव भोपाल आये हुए थे। उन्होंने भी प्रदेश की भाजपा सरकार के रवैये की संख्त निंदा की। उन्होंने कहा कि इस निर्णय से एक बार फिर यह सिध्द हो गया है कि भाजपा का अल्पसंख्यकों के प्रति  पक्षपातपूर्ण रवैया है और उसे अल्पसंख्यकों के कल्याण की रंच मात्र भी चिंता नहीं है।

               अभी कुछ दिन पूर्व मध्यप्रदेश भाजपा ने प्रदेश के मुसलमानों का सम्मेलन आयोजन किया था। आयोजन में भाषण देते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि हिन्दू व मुसलमान भारत माता के दो हाथ हैं। स्पष्टत: भाजपा की कथनी और करनी में कोई साम्य नहीं है। 

               मीडिया ने भी राज्य सरकार की भेदभाव की नीति की निंदा की हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाकर समाज का ध्यान प्रदेश सरकार की इस नीति के प्रति खींचा हैं। दैनिक हिन्दू ने इस समाचार को ''मध्यप्रदेश सरकार का कश्मीरी छात्र-छात्राओं के साथ भेदभाव'' के शीर्षक से छापा हैं।

               इंडियन एक्सप्रेस ने इस मुद्दे पर संपादकीय लिखा है। अपने संपादकीय में एक्सप्रेस कहता है कि एक ओर संघ परिवार कश्मीर को मुख्यधारा में शामिल करने की बात करता है और मांग करता है कि कश्मीर का  देश में पूरी तरह से विलय हो। परंतु वहीं उन सब कदमों में रोड़े अटकाता है जिनसे भारत में कश्मीर के भावनात्मक विलय में मदद मिलेगी।यदि हम कश्मीर के इन बच्चों को जो आतंक के साये में पैदा हुए और पले बढ़े हैं, देश की अन्य शिक्षण संस्थाओं में अधययन करने का अवसर देंगे तो उन्हें यह महसूस  होगाकि भारत का प्रत्येक हिस्सा उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार है। इससे उनके दिमागों में भारत के प्रति जो शंकाएं हैं उनका निवारण होगा। उनके मनों में भारत के प्रति जो आक्रोश है, उसमें कमी आएगी। वे भारत की विविधता के संपर्क में आयेंगे। कॉलेज में आने के पूर्व तक छात्र-छात्रायें एक तरह की कोरी स्लेट रहते हैं। इस स्लेट पर हम जो भी लिखना चाहते हैं,लिख सकते हैं। हमें तो ऐसे अवसरों की तलाश में रहना चाहिए और ऐसे अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। ऐसा करके हम कश्मीरी छात्र-छात्राओं को भारत की महानता,उसकी सांस्कृतिक विविधता व उदारता से परिचित करवा सकेंगे। यदि संघ परिवार सच में कश्मीर समस्या का निवारण चाहते है तो उसे जोड़ने वाली नीति पर चलना चाहिए न कि तोड़ने वाली नीति पर।

 

? एल.एस.हरदेनिया