संस्करण: 11 जुलाई- 2011

जनमानस में पवित्र नदियों पर है

गहरी आस्था

? राजेन्द्र जोशी

               मूलत: भारतीय जनमानस भावना प्रधान और आस्थावान तो है ही, साथ ही सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक परंपराओं का संवाहक भी है। सदियों की हमारी सांस्कृतिक धरोहरों से भारत वर्ष भरा पड़ा है।

               वनों, पर्वतों, और पवित्र नदियों की बह रही अविरल धाराओं की संपदा से समृध्द जनआस्थाओं और देवी देवताओं की पूजा-अर्चनाओं में संलग्न हमारा देश पौराणिक गाथाओं का पोषक रहता चला आ रहा है जिसे समाज पीढ़ी-दर-पीढ़ी सौंपता चला आ रहा है। हम पत्थरों को तराशकर उसमें भी ईश्वर का अंश देखते है और जल,अग्नि, वृक्ष, अन्न, पवन और यहां तक कि कण-कण में ईश्वर का वास मानकर उनको पूजते चले आ रहे हैं। हमारे सांस्कृतिक और धार्मिक संदर्भों में इस बात की पुष्टि मिलती आई है कि 'ईश्वर अंश जीव अविनाशी'। इसीलिए रामचरित मानस में महाकवि तुलसी ने अपनी वंदना करते हुए यह चौपाई रची है-''सियाराम-मय सब जग जानी-कर ओम प्रणाम जोगिर जुग पाणि॥''  नदी घाटियों की सम्पदाओं की ऐतिहासिक गाथाऐं मानव जीवन के संरक्षण का आधार है। भारत वर्ष की प्राचीन नदियों के प्रति जनमानस में श्रध्दा-आस्था और विश्वास इसी बात से परखा जा सकता है कि पावन नदियों के तट पर श्रध्दालुजन जिस तादाद में एकत्रित होते हैं वह हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रतीक है। पर्वतराज हिमालय के गर्भ से जन्म लेकर पापों का नाश करने के लिए उत्तुंग तरंगों के साथ पतित पावनी गंगा कल-कल निनाद के साथ कूदती-फांदती सिंधु की अपार जलराशि में घुल मिल जाती है। सिंधु भी गंगा को जिस आदर के साथ अपने हृदय में बसा लेता है,उसकी गाथाऐं सुनकर सहज ही जनमानस अपना शीश झुकाये बिना नहीं रहता। तमाम जलचर और थलचरों का पालन करने वाली इस पवित्र गंगा ने इसीलिए 'पालनहार'मां का सम्मान पाया है। इसी तरह नर्मदा, सरस्वती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, यमुना जैसी नदियों ने अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं में अपना स्थान बनाया है। इन नदियों को श्रध्दालु 'मां'की तरह पूजते है और इनके तटों के वासी इन नदियों में नियमित डुबकी लगाकर 'मां' का आशीष पाकर अपनी प्रतिदिन की दिनचर्या का शुभारंभ करते हैं। यात्राओं के दौरान चाहे वह रेल यात्रा हो, सड़क यात्रा हो या पैदल यात्रा ही क्यों न हो जहां भी मार्ग में पावन नदियों के दर्शन हो जाते हैं, वहां आस्थावान लोग, शीश झुकाकर हाथ जोड़कर और आंख मूंदकर नदी माताओं के प्रति अपनी भावनाओं का इज़हार करने में चूकते नहीं हैं। साथ ही इन नदियों में सिक्का डालकर पुण्य कमाने में भी पीछे नहीं रहते।

               जो भी व्यक्ति अंतर्रात्मा के साथ इन पावन नदियों के नाम का उल्लेख भी करता हैं तो हम उसको प्रभावित हो जाते हैं और एक तरह से हम उसके समर्थन में अपने आपको ले आते हैं। भारतीय जनमानस इसी तरह की आस्थाओं,श्रध्दा और भक्ति भावना की प्रवृत्ति के कारण कभी कभी अपने निहित स्वार्थ की पूर्ति की मंशा रखने वाले कतिपय तथाकथित चतुर-चालाक व्यक्तियों के द्वारा लोगों को धोखा खाते भी देखा गया है। वर्तमान दौर में हमारा देश एक राजनीतिक प्रधान देश बन गया है, जहां विभिन्न दल, संगठन और वर्ग प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सत्ता तक पहुंचने के ही उपक्रम में दिन रात व्यस्त हो गये हैं। साम, दाम, दंड, भेद किसी भी माध्यम से वे अपने लिए जनाधार तैयार करने का खेल खेलते रहते हैं। जनाधार मजबूत बनाने के लिए जनसमर्थन जरूरी है,अत:कतिपय दल और उसके आत्म-घोषित चतुर-चालाक, जिन्हें शातिर भी कह सकते हैं, जन भावना के साथ खिलवाड़ कर अपने पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए 'फाउल गेम'भी खेलने लग गये हैं। धर्म,संप्रदाय और वर्ग के नाम पर राजनीति खेलकर अपने राजनैतिक दलों के लिए ऐसे लोग धार्मिक और साम्प्रदायिक उन्माद फैलाकर जनता की भावनाओं को अपने हितार्थ भुनाने में लगे हुए देखे जा सकते हैं। ऐसे लोग देश की धर्मिक एवं सांस्कृतिक विविधताओं के बीच परस्पर वैमनस्य फैलाने का कुचक्र चलाते रहते हैं। धर्म और धार्मिक स्थलों की राजनीति में सफलता मिलते न देख साम्प्रदायिकता फैलाने वाले कतिपय दलों ने हमारी आस्थाओं का आधार बनी पवित्र नदियों को अपनी राजनीति चमकाने का मुद्दा कहीं चतुराई के साथ तो नहीं बनाया गया है। गंगा,नर्मदा, कृष्णा, गोदावरी, कावेरी,,यमुना नदियों के नाम को कतिपय राजनैतिक दलों ने अपने एजेंडों में शायद इसी दृष्टि से शामिल कर लिया है, ताकि देश की आस्थावान जनता उस तरह के बगुलों के चंगुल में फंस जाय जिस तरह नदी तट पर एक बगुला भक्तों की वेषभूसा में बैठकर हाथ में माला लिए, मस्तक पर तिलक लगाये अपने प्रतिविश्वास कायम कराने के बाद निरीह मछलियों का शिकार करने में सफलता अर्जित करता है। इस वक्त कतिपय चतुर-सुजानों ने छद्म वेष धारण कर जनभावना को कुरेदना शुरू कर दिया है। ऐसे चतुर सुजानों द्वारा आस्थाओं और जनभावनाओं को उकसाने और नदियों के तटों और तीर्थस्थलों पर उमड़ रहे जनसमूह को बगुले की तरह तट पर बैठ कर जनभक्ति प्रदर्शित करने का ढोंग तो नहीं किया जा रहा है। हमारी पावन नदियों का इतिहास रहा है कि उन्होंने आदिकाल से जनजीवन को बचाया है। खुशहाली और समृध्दि दी है एकता के सूत्र में समाज के विविध वर्गों को बांधने का काम किया है। वर्तमान में भी इन नदियों का जल जीवन संदेश दे रहा है। इन पवित्र नदियों को बचाने के नारों के पीछे कुछेक राजनीति करने वालों की किसी निहित स्वार्थ की पूर्ति की नियत भी छुपाये छुप नहीं सकती। जब तक नदियों के नाम पर राजनीति के खेल खत्म नहीं होंगे तक तक रामजी की गंगा पापियों के पाप से मैली होती रहेगी। हां इन पावन नदियों के प्रति नि:स्वार्थ भाव से और श्रध्दापूर्वक चलाये गये आंदोलन का तो स्वागत हैं ही,यदि कहीं अचानक श्रध्दा उमड़ने के पीछे नीयत साफ नहीं है तो ऐसे आंदोलन केवल दिखावा मात्र बनकर रह जाया करते हैं।


? राजेन्द्र जोशी