संस्करण: 11 जुलाई- 2011

संकट में वन्य एवं जलीय जीव-जंतु

? शब्बीर कादरी

               हाल ही में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने दिल्ली में हाथी संरक्षण कार्यक्रम के दौरान कहा कि देश को लौह अयस्क और कोयला खनन गतिविधियों के बारे में अत्यधिक संवेदनशील नजरिया अपनाने की जरूरत है क्योंकि लौह अयस्क और कोयला खनन गतिविधियाँ वर्तमन परिप्रेक्ष्य में सबसे बड़ा खतरा हैं। हमें लौह अयस्क और कोयले की जरूरत है लेकिन इसके लिए यह जरूरी नहीं कि हम हाथी जैसे वन्यप्राणियों के पर्यावास को पूरी तरह नष्ट कर दें। कुछ माह पूर्व इसी तरह के सवाल मध्यप्रदेश के पूर्व सहकारिता मंत्री, मध्यप्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष और वर्तमान विधायक डॉ.गोविन्द सिंह ने एक पत्रकार वार्ता उठाते हुए कहा था कि प्रदेश में रेत एवं अन्य खनिजों के अवैध उत्खनन एवं फर्जी रसीद कट्टों से करोड़ों रूपये की क्षति शासन को पहुंचाई जा रही है। उन्होने कहा था कि चम्बल संभाग में विश्व की सबसे बड़ी घड़ियाल सेन्चुरी में घड़ियाल, क छुआ, मगरमच्छ तथा डाल्फिन सहित अन्य जलीय जीवों की जीवन संकट में आ गया है। परिणामस्वरूप घड़ियालों की संख्या लगातारण कम होती जा रही है। वर्ष 1998में चम्बल सेन्चुरी में करीब 1290 घड़ियाल थे। जिनकी संख्या अब घटकर 870 रह गई है। सिन्धु नदी में रेत का इतना अधिक उत्खनन हुआ है कि जहां पूर्व में 15-20 मीटर तक रेत की गहराई रहती थी वह अब कुछ स्थानों तक ही सिमट कर रह गई है। बाकी स्थानों पर रेत के स्थान पर मिट्टी दिखाई देने लगी है। यह भी स्मरणीय है कि उच्च न्यायालय ग्वालियर ने चंबल नदी में अवैध उत्खनन पर रोक लगाई थी जिसके चलते घड़ियाल सुरक्षित थे किन्तु न्यायालय के उक्त आदेश के बाद भी खनिज, वन, पुलिस विभाग के अधिकारियों एवं भाजपा नेताओं की मिलीभगत से चम्बल नदी मे घड़ियाल अभयारण्य क्षेत्र से सर्वाधिक रेत का उत्खनन किया जा रहा है। जिससे घड़ियाल, मगरमच्छ एवं कछुए के अंडे नष्ट हो जाते हैं।

 

               इसी प्रकार के समाचार वन्यप्राणियों के संबंध में भी हैं। वन्य प्राणियों के रक्षा के लिये सरकार के पास एक महत्वपूर्ण विभाग सहित भारी भरकम अमला भी है फिर भी प्रदेश के वन्यप्रणियों का अवैध शिकार धडल्ले से जारी है। यहां तक कि शिकारी बाघों तक को अपना निशाना बना रहे हैं। आंकड़े गवाह हैं कि वर्ष 2007 से 2010 के बीच मात्र 4 वर्ष में ही 1017 वन्यप्राणी मारे गये। ये जानवर बीमारी या प्राकृतिक आपदा से नहीं बल्कि शिकारियों द्वारा मारे गये हैं इन प्राणियों में 28तेंदुए तथा 7 बाघ भी शामिल हैं। यह अत्यधिक सुखद है कि प्रदेश में वन और वन्यप्राणियों की प्रचुरता है और गर्व का विषय है कि राय को टाइगर स्टेट भी कहा जाता है इसी कारण यहां वन विभाग का अमला भी अधिक मिला हुआ है, इन्हें हथियारों से लैस कर इन वन्यप्राणियों की रक्षा में तैनात किया गया है फिर भी बड़े पैमाने जंगली जानवरों के शिकार के मामलों में बढ़ोतरी निराश करती है।

 

               गौरतलब है कि वन्यप्राणियों के नाखून, खाल, दांत एवं हड्डी ऊँचे दामों पर बेंचे जाते हैं यही कारण है कि इनका अवैध शिकार किया जाता है। राय के मुख्य वनसंरक्षक -वन्यप्राणी के आंकड़ों पर दृष्टिपात की जाए तो सहज ही समझा जा सकता है कि पिछले चार वर्षों में 1017 प्राणियों को शिकारियों ने अपना शिकार बनाया। वर्ष 2007 में 1 बाघ, 5 तेंदुए सहित 223 भालू, नीलगाय, सांभर, चीतल, मोर एवं अन्य वन्यप्राणी मारे गये जबकि शिकार के केवल 121 प्रकरण पंजीबध्द किए गये। इसी प्रकार वर्ष 2008मे 234, वर्ष 2009 में 366तथा 2010 में 194 जंगली जानवरों को शिकारियों ने अपना निशाना बनाया जबकि वर्ष 2010 में 165 प्रकरण शिकार के दर्ज किए गये हैं।

 

               आंकड़े बताते हैं कि राय में वन्यप्राणी संरक्षित क्षेत्र वन लगभग 7 प्रतिशत हैं जिसमें 09 राष्ट्रीय उद्यान एवं 25 वन्यप्राणी अभयाराण्य हैं इनमें से 06बाघ परियोजना क्षेत्र कान्हा, बांधवगढ़, पन्ना, सतपुड़ा, संजय राष्ट्रीय उद्यान एवं पेंच राष्ट्रीय उद्यान और 2 अभराण्य सैलाना एवं सरदारपुर सहित एक अन्य लुप्त प्राय: दुर्लभ पक्षी खरमौर के संरक्षण के लिये एवं 03 अभयाराण्य चम्बल, केन एवं सोन जलीय प्राणियों क ी सुरक्षा के लिए गठित किए गए हैं। प्रदेश में वर्तमान में वर्ष 2004 और 2005 में हुई वन्यप्राणियों की गणना के अनुसार बाघों की संख्या 690, तेंदुआ 1108, चीतल 101993, सांभर 38175, चौसिंघा 4891, काला हिरण 10225 सहित अन्य प्राणी विद्यमान हैं।

 

               यह अत्यधिक सुखद है कि राय में मौजूद अनेक अभयारण्यों क ी मौजूदगी से न केवल इन वन्यप्रणियों की प्रजातियों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है बल्कि इनक ी आकर्षक उपस्थिति से पर्यटकों की संख्या में भी साल-दर-साल भारी वृध्दि भी दर्ज की गई है जिससे प्रदेश के राजस्व पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। प्रश है कि क्या कांग्रेस के उपाध्यक्ष डॉ.गोविन्द सिंह द्वारा उठाए गए रेत के अवैध उत्खनन जिससे की कुछओं और घड़ियालों की संख्या पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है राजनीतिक शोशेबाजी समझ कर छोड़ दी जाना चाहिये, क्या अपनी ही सरकार द्वारा पेश वन्यप्राणियों के अवैध शिकार के मामलों में हुई वृध्दि को दरकिनार कर दिया जाना चाहिये। ऐसे अनेक प्रश हैं जिनका जवाब मिले या न मिले किसी भी लोकतांत्रिक और जवाबदेह सरकार के लिये आवश्यक होता है कि वह इस प्रकार के मामलों की गंभीरता से पड़ताल कर गुपचुप ऐसी कवायद करे जिससे किसी ऐसी विषम परिस्थिति से बचा जा सके जो भविष्य में इस तथ्य को इंगित करे कि प्रदेश में कभी दुर्लभ वन्यीवों की बहुतायत थी जो अब नहीं है। आशा की जाना चाहिये कि भविष्य में मध्यप्रदेश की वन्यजीव और जलीय जीव जन्तुओं की संख्या में गुणात्मक वृध्दि तो होगी ही संबंधित शासकीय अमला भी अपनी सजगता और कर्तव्यपरायणता के लिये राष्ट्रीय स्तर पर इनाम का हकदार भी बनेगा।


? शब्बीर कादरी

लेखक 'नेचरटुडे' पत्रिका के संपादक हैं