संस्करण: 11 फरवरी-2013

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हिन्दुत्व आतंकवाद पर शिंदे का बयान : एक शाब्दिक भ्रम

       गृ हमंत्री सुशील कुमार शिंदे के हिन्दू आतंकवाद तथा उसके भाजपा और आरएसएस क़े साथ संबनों के बारे में बयान का विरोध करने के लिये प्रदर्शन किये जा रहे है एवं लोकसभा के आगामी सत्र में सदन की कार्यवाही नही चलने देने की धमकियाँ दी जा रही है। (23जनवरी 2013)इस बयान के दो बड़े घटक है। पहला, आतंकवाद के पहले हिन्दू शब्द का प्रयोग और दूसरा आतंकी प्रशिक्षण केन्द्रों के साथ आरएसएस भाजपा के संबन। जिसे शिन्दे ने हिन्दू आतंकवाद कहा है वह पहले भगवा आतंकवाद या हिन्दुत्व आतंकवाद भी कहा जा चुका है।

?   राम पुरियानी


आरएसएस और महात्मा गाँधी की हत्या :

क्या कहते है समकालीन दस्तावेज?

       यपुर में हाल ही में संपन्न हुये कांग्रेस के चिन्तन शिविर में केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिन्दे की भगवा आतंकवाद पर टिप्पणी ने भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस ख़ेमों में वैसा ही कोलाहल मचा दिया जैसा कि उम्मीद की जा रही थी। हिन्दुत्व आतंक देश के लिये चिन्ता का कारण जरूर होना चाहिये किन्तु हिन्दू आतंक नही। साफ तौर पर, किसी भी ार्मिक समुदाय को उस समुदाय के कुछ लोगों की व्यक्तिगत आतंकी गतिविाियों के कारण समग्र रूप से आतंकवाद के लिये जिम्मेदार नही ठहराया जा सकता।

? शमसुल इस्लाम


तोगड़ियां ने उगला सच

भाजपा और विहिप कराते हैं दंगे ?

       पिछले दिनों दो ऐसी खबरें आईं जिनसे लोकतांत्रिक और भाई चारे का दम भरने वाली भारतीय जनता पार्टी और उसके आनुषांगिक संगठनों की हिंसक और सामंती मानसिकता सामने आ गई है। पहली खबर में भाजपा ने केंद्र सरकार के उस दूरदर्शी फैसले का विरोध किया हैए जो कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है। और दूसरी खबर आई कि विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया मजलिस.ए.एत्तेहादुल के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी की अभद्रता का जवाब अभद्रता से ही देते वक्त अपनी हिसंक गतिविधियों यानि दंगों की असलियत बता गए।

? विवेकानंद


चुनावों के लिए भोजशाला को

अयोध्या बनाने की तैयारियां

         प्रतिदिन मिल रही सूचनाओं के कारण मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथ पाँव फूल रहे हैं और वे सरकारी धन के सहारे न केवल ताबड़तोड़ पंचायतें, किसान सम्मेलन आदि ही कर रहे हैं अपितु अपने कार्यकर्ता सम्मेलनों में साफ साफ कह भी रहे हैं कि विपक्षी चुनौती के आगे हैट्रिक आसान नहीं है। पिछले दिनों गडकरी को दुबारा अधयक्ष न बनने देने की योजनाओं में अडवाणीजी भी 'अनैकिताओं के प्रति शून्य सहनशीलता'का नारा उछाल बैठे जबकि गुजरात को छोड़ कर भाजपा की कोई सरकार ऐसी नहीं है जिसके मंत्रिमण्डल का बहुमत सुस्पष्ट बड़े भ्रष्टाचार में लिप्त होने की चर्चाओं में न हो।  

? वीरेन्द्र जैन


शिक्षा का अधिकार,

शिवराज का प्रचार

       केन्द्र सरकार के बजट से संचालित हो रही कल्याणकारी योजनाएं मध्यप्रदेश में सत्तारूढ भाजपा सरकार के लिए प्रचार का माध्यम बन रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जिन योजनाओं का बेहतर संचालन करने के लिए प्रतिवर्ष बडी रकम मध्यप्रदेश को दे रहे हैं , वे योजनाएं लक्ष्यपूर्ति की बजाय भ्रष्टाचार के आरोप से घिर गई है। केन्द्रीय बजट के जरिये जो कार्यक्रम मध्यप्रदेश में चलाये जा रहे हैं उनका भी श्रेय मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ले लेना चाहती है।  शिक्षा का अधिकार कानून का हाल मध्यप्रदेश में कुछ ऐसा ही है। देश प्रदेश के सभी बच्चों को शिक्षा से जोडने के लिए बनाये गये इस कानून का उपयोग मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार का प्रचार करने के लिए हो रहा है। 

 ?   अमिताभ पाण्डेय


यदि मोदी सेक्युलर हैं तो

कम्युनल कौन हैं?

                  राजनाथ सिंह के भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बनने के बाद पुन: यह मांग सामने आनी लगी है कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया जाये। एक प्रसिध्द कहावत है कि सूत ना कपास जुलाओं में लटा लटी। प्रधानमंत्री कौन हो? इस सवाल के संदर्भ में यह कहावत सौ प्रतिशत सही नजर आती है। 

? एल.एस.हरदेनिया


क्या यही है शिवराज का सुराज ?

      ध्यप्रदेश के 'यशस्वी' मुख्यमंत्री शिवराज सिंह आए दिन ऐसी घोषणाएं करते रहते हैं और ऐसे शिगूफे छोड़ते रहते हैं, जिनसे आम जनता में यह संदेश जाने की उम्मीद की जाती है कि प्रदेश सरकार जनकल्याण के लिए पूर्णत: प्रतिबध्द है। किंतु यथार्थ के आईने में सरकार की ये तमाम कोशिशें कागजी नजर आती हैं। मामला महिला एवं बाल विकास हो, किसानों की समस्याओं का हो, कुपोषण का हो, प्रदेश में बढ़ते अपराधों के ग्राफ का हो, माफियाओं आतंक का हो अथवा जनप्रतिनिधियों के संरक्षण में हो रहे अत्याचार-अनाचार का हो, हर मामले में यह सरकार और इसके कारिंदे कठघरे में दिखाई देते हैं।

? महेश बाग़ी


बाडी-लेंग्वेज़ से

बयां हो जाती है हकीकत !

      देह भाषा जिसे 'बॉडी लेग्वेज' कहा जाता है क्या इतनी अधिक पावरफुल भाषा है जो बिना शब्द और धवनि के किसी के हृदय के भावों और उसकी मनोदशा का आसानी से अनुवाद कर देती है ! इस प्रश्न का उत्तर कुछ राजनेताओं के हाव भाव और उनकी देहभाषा के जरिए समय-बे-समय मिल ही जाता है। कोई भी नेता राजनीति के नाम पर अपने बयानों, भाषणों या पोस्टरों में शब्दों और लिपियों के माधयम से जो कुछ कह देता है, उससे अक्सर किसी के दबाव में या उसका विपरीत असर देखते हुए अपने ही कहे हुए शब्दों से पलट सकता है।

? राजेन्द्र जोशी


आगे बढ़ता लोकपाल विधेयक

        लोकपाल विधेयक गति पकड़ता लेकर दो कदम आगे बड़ी है। बजट सत्र से पूर्व केंद्रीय मंत्रीमण्डल ने लोकपाल के संशोधित मसौदे को मंजूरी देकर इस बात की तसदीक कर दी है। हालांकि अन्ना और अरविंद ने इस नए प्रारुप पर भी अपनी असहमति जताई है,किंतु इस असहमति को अब लोकपाल को कानूनी जामा पहनाने के परिप्रेक्ष्य में बाधा नहीं माना जाना चाहिए। दरअसल लोकतंत्र में कानून बनाने की संसदीय कार्रवाई अधिकतम संभव के सिध्दांत पर आधारित होती है और किसी भी कानून के अमल में आने के बाद उसमें संशोधान की प्रक्रिया भी जारी रह सकती है।

? प्रमोद भार्गव


मनरेगा : सात साल का सफर

       हात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून को देश में अमल में आए, देखते-देखते सात साल हो गए। इन सात सालों में इस कानून ने ग्रामीण और शहरी भारत में कई बड़े बदलाव किए। मसलन-गांव से शहर की ओर बड़े पैमाने पर होने वाला मजदूरों का पलायन रूका, गांवों में ही नए-नए रोजगार सृजित हुए और इससे गांवों के अंदर बुनियादी ढांचा मजबूत हुआ। इस योजना में जहां ग्रामीण भारत को बार-बार आने वाली परेशानियों और प्राकृतिक आपदाओं से मुकाबला करने में मदद मिली, तो वहीं विस्तारित कृषि उत्पादन और निर्माण श्रमिकों की मांग से श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी में भी वृध्दि हुई।    

? जाहिद खान


अस्ताचल की ओर अन्ना का युग

        न्ना नहीं यह आंधी है, अन्ना दूसरे गांधी हैं, अन्ना एक क्रांति है, ठीक ऐसे ही नारे दो वर्ष पहले लगते थे। लोगों का सैलाब उमड़ पड़ता था। लोगों का उन पर विश्वास जागा, ये शायद देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कर देंगे। युवा तो पागल हो गए थे। देश ही नहीं विदेश में भी अन्ना की गांधीगिरी की चर्चा हो रही थी। भ्रष्टाचार के दुश्मन के रूप में अन्ना का नाम सबसे आगे था। पर आज अन्ना की वाणी खामोश हो रही है। लोग उनकी बातों पर धयान नहीं दे रहे हैं। उनके सभी साथी उनका साथ छोड़ कर जाने लगे हैं।

? डॉ. महेश परिमल


शिक्षा-संस्थान भी असुरक्षित,

तो बेटियां कहां पढ़े ?

       ह बहुत चिंताजनक है कि भारत की बेटियां न घर-परिवार में सुरक्षित हैं, न सड़क पर, न शिक्षा-संस्थानों में। पूरे देश में आधी आबादी यानी स्त्रियों की सुरक्षा का मामला गंभीर हो चला है। यद्यपि सरकार प्रत्येक प्रकार के उत्पीड़न से महिलाओं की मुक्ति और उनकी सुरक्षा हेतु प्रयत्नशील है परन्तु चाहे महिलाओं के उत्पीड़न का मामला हो अथवा उनके स्वावलंबन और सशक्तिकरण का-प्रत्येक स्थिति में शिक्षा अनिवार्य है। वस्तुत: शिक्षा ही स्त्री को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बना सकती है और स्वावलंबन के द्वार खोलकर उसकी उन्नति का पथ प्रशस्त कर सकती है।    

? डॉ. गीता गुप्त


  11 फरवरी-2013

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