संस्करण: 11फरवरी-2008

 खटमल, मच्छर और मुर्गियों ने उड़ाई मानव के नयनों की नींद
   दुलार बाबू ठाकुर

   खटमल और मच्छर का नाम सुनते ही हमारी रुह कांप जाती है तथा मन में इससे निजात पाने के लिए तरह-तरह के नुस्खे जन्म लेने लगते है। परन्तु मुर्गे और मुर्गियों के नाम आते ही हमारी जीभ से लार टपकने लगती है और नाक सांस लेने वाली हवा में चिकन फ्राई के गंध की तलाश करने लगती है। परन्तु फिलहाल बर्ड फ्लू से हम इतने परेशान और हैरान है कि मुर्गियों को मच्छर और खटमल की तरह ढूढ़-ढूढ़ कर मारने को विवश है क्योंकि हमें अपने ऊपर संकट के बादल शेयर बाजार के ऊपर मंडरा रहे बादल की तरह दिखने लगी है। हम जितने चाव से चिकन को दांत से उदार-उदार कर खाते रहे हैं उतनी ही दृष्टता के साथ इन मुर्गियों की बांग वातावरण से आने लगी है कि बहुत हो चुका अब हमारी बारी है। जो भी हो, वर्तमान में बर्ड फ्लू से मची हाहाकार से गीता की वह पंक्ति याद आ रही है जो जनमानस में काफी प्रसिध्द है, जैसी करनी वैसी भरनी अर्थात् जैसा कर्म करोगे वैसा फल देगा भगवान यह है गीता का ज्ञान। हम दिन-पर-दिन ऐशो आराम की खातिर प्रकृति के बनावट और इको सिस्टम का तनिक भी ख्याल नहीं रख पाए। हमने जंगल अर्थात मच्छर के घर को काटकर अपना घर बना लिया तो बेचारा मच्छर कहां जाएगा?

रात के अंधोरे में मानव का घर ही मच्छरों को जंगल सा प्रतीत होने लगा। लंबी पेड़ की तरह लंबी-लंबी इमारतें और उसमें अनेक महल मच्छर को पेड़ की अनेक टहनी जैसा दिखाई देने लगा। इसलिए सभी मच्छर विचार कर इस नए और घने घरनुमा जंगल में ही अपनी जनसंख्या बढ़ाने का निश्चय कर लिया। इस तरह से प्रारंभ हुआ मानव और मच्छर के मधय युध्द। आखिर दो जानवर एक साथ रहेगे तो झगड़ा-फसाद होगा ही। इससे बचने के लिए मानव सुरक्षात्मक अधिक नजर आता है जैसे कभी मच्छरदानी के रुप में ढ़ाल का इस्तेमाल करता है तो कभी मारटीन जैसे मिसाइल से मच्छरों पर प्रहार करता है। दूसरी तरफ मच्छर भी गुरिल्ला युध्द करने में कम माहिर नहीं है। उसकी आंखे पैनी है जब उसे मारटीन मिसाइल दिखता है तब खटमल के साथ बिस्तर में या फर्नीचर के बीच में छिप जाता है। जब देखता है कि मानव मच्छरदानी में सिमट चुका है तब बहुत ही मेहनत और चालाकी से उसमें सुरंग कर अंदर प्रवेश कर जाता है फिर प्रारंभ होती है गाने-बजाने और खून पीने का सिलसिला।

बहुत हद तक ऐसी ही बरताव खटमल भी करने लगा है। उंची और घनी महल ने घरों से आंगन के साथ सूर्य की धूप भी छीन ली है। इस कारण न घर के अंदर सूर्य की धूप और रोशनी पहुंच पाती है और न ही कपड़े को सूर्य की धूप प्राप्त करने का सौभाग्य मिल पाता है। ऐसी परिस्थिति में पतली और पहने-ओढ़ने का वस्त्र कुछ हद तक पंखे की हवा या पड़ोसी की छत के सौभाग्य से दो-तीन दिन में सुख जाते है। लेकिन उसमें एक अलग तरह की गंध जन्म लेती है जो खटमल के जन्म लेने और संख्या बढ़ाने में सहायक होती है। इसके अलावा मोटी और गद्दीदार बिस्तर को कई महीने तक धूप नसीब नहीं होती, उसमें खटमल आराम से अपने वंश का विस्तार करते रहता है। इसकी जितनी अधिक संख्या होती है उतनी ही अधिक हमला मानव के उपर चौबीसों घंटे होता रहता है। इन समस्याओं से सिर्फ भारत के लोग ही नहीं अमेरिकावासी भी काफी परेशान हैं। वहां के लोग इतने परेशान हैं कि खटमलों से निजात पाने के तरीके ढ़ूंढ़ने के लिए न्यूयार्क सिटी में संगोष्ठियां आयोजित करने लगे हैं। साथ ही सरकारी विभाग भी इससे परेशान है इसकी पुष्टी आवास और संरक्षण विभाग के उपायुक्त लुइस एरागोन की बातों से होती है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वर्ष 2004 में प्रशासन को 1800 शिकायतें मिली थी जो बढ़कर 2007 में 7000 हो गई। ऐसा नहीं है कि सिर्फ न्यूयार्क सिटी ही खटमलों से परेशान है। यह अमेरिका के हर राज्य के लिए समस्या बन गया है। इससे आहत हुए लोग इसे 21वी सदी की कीट तक कहने लगे हैं। इतना ही नहीं, खटमलों से निजात पाने के लिए अनेक संस्थान खुल चुके है। लुइस एरागोन इसे एक मनोवैज्ञानिक मुद्दा करार देते हुए कहते हैं कि रात में कोई आपका खून चुसता है और आपको पता ही नहीं चलता है कि वह कहां है। लोगों को खटमलों से निजात दिलाने के लिए हजारों डालर खर्च करने पड़ रहे हैं। इसके अलावा खटमलों द्वारा विभिन्न समानों में बनाए गए अड्डों के कारण उसे फेंकने पड़ रहे है। लुइस के इस वक्तव्य से समस्या की गंभीरता स्पष्ट झलकती है।

इसी तरह से भारत में फिलहाल समाज और सरकार दोनों मुर्गियों को लेकर परेशान है। बर्ड फ्लू से प्रभावित पश्चिम बंगाल में मुर्गियां मारने के लिए आठ विभिन्न राज्यों से केन्द्र सरकार द्वारा विशेषज्ञ भेजे जाने की प्रक्रिया जारी है। लाखों मुर्गियां मारी जा चुकी है और आगे मारे जाने के प्लान बनाए जा रहे है। बिहार और झारखंड सरकार बेरोजगारी और गरीबी की समस्या की तरह मुर्गी से भी परेशान है। इसलिए दोनों ही राज्यों को अपनी सीमाओं को पश्चिम बंगाल से आने वाली मुर्गियों को रोकने के लिए प्रतिबंधित करना पड़ा है। इन समस्याओं से प्रश्न उठता है कि यह क्या हो रहा है? क्या यह एकाएक हुआ है? इसके दोशी कौन हैं? क्या भविष्य में इससे निजात पाए जा सकते है? इन विविधा सवालों की भांति इसके जवाब भी अनेक है। जिससे हम सभी वाकिफ है। परन्तु सिर्फ जानकारी रहने से क्या होगा, जब तक इसके प्रति गंभीरता से कदम नहीं उठाये जाएंगे। हमने जंगल काटे, सैकड़ों नाले और नदियां भरकर घर बनाते चले गए। तो इसका साइड इफेक्ट होगा ही। इससे बचाव के लिए हमें इसकी जड़ को समाप्त करना होगा। जैसे बर्ड लू की समस्या कुछ वर्शों से निरंतर बढ़ती जा रही है। इसे समाप्त करने के लिए पालटीफार्म की संख्या कम करनी होगी। इससे पूर्व मुर्गी व मुर्गा नहीं खाने वालें को पुरस्कृत करना होगा तथा खाने वालों में यह जागृति लानी होगी की इससे नुकसान के अलावा फायदा नहीं है। अन्यथा वहीं कहावत चरितार्थ होगी कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय।

दुलार बाबू ठाकुर