संस्करण: 11फरवरी-2008

संदर्भ - बाल विवाह कच्ची उम्र और सात फेरे कब आयगी   जन जागृति और कब सक्रिय होगा तंत्र!
   राजेन्द्र जोशी

  आज ज्ञान का इतना अधिक विकास हो चुका है कि मानव ने आसमान की ऊंचाई और पाताल की गहराई को नापकर रख दिया हैं। अपनी बुध्दि और विवेक से उसने अपने जीवन की तमाम सुख-सुविधाओं को अपनी मुट्ठी में कर लिया है। मृत्युदर और जन्मदर को आज मनुष्य स्वयं निधर्रित कर रहा है। जहाँ मृत्युदर के ऑंकड़े एक आयु विशेष के बाद ज्यादा थे, वहीं अब विज्ञान और विकास के दौर में मृत्युदर के आंकड़े कम हो गये है। जन्म लेते ही मृत्यु होने वाले ऑंकड़ों में कमी आई है। मानव के जीवन स्तर में भी व्यापक परिवर्तन और सुधार आया है।

विज्ञान और विकास की उपलब्धियों के चलते आज भी समाज का एक बड़ा हिस्सा अभी भी पिछड़ेपन, दकियानूसी और पुरानी सोच से उबर नहीं पाया है। एक ओर युवा पीढ़ी, चाहे वह लड़की हो या लड़का, एक उन्मुक्त वातावरण् में जी रही है और अपने जीवन के गुजर बसर के लिए स्वावलंबी बनती जा रही है, वहीं दूसरी ओर एक बड़े पैमाने पर अपने बाल्यकाल के अभिशापों से मुक्त नहीं हो पा रही है। अशिक्षा, असमानता और गरीबी के प्रकोप पर जिस रूप में नियंत्रण होना चाहिए था, वह नहीं हो पा रहा है। इसका परिणाम भुगत रही वह आयुवर्ग की पीढ़ी जो किशोर अवस्था तक पहुँचने के पूर्व ही दकियानूसी विचारधाराओं में उलझकर रह जाती है। जो आयु माता पिता के स्नेह और वात्सल्य पाने की हकदार होती है या शिक्षा ग्रहण करने की पायदान पर होती है, उस आयु में उसे सांसारिक जिम्मेदारियों के गर्त में धकेल दिया जाता है। सामाजिक पिछड़ेपन, अशिक्षा और नासमझी से आज भी अनेक ऐसे बालक हैं जो अंकुरित हो रहे हैं और ऐसी बालिकायें हैं जो कोपल के माफिक कोमल और कच्ची उम्र की हैं, उन्हें विवाह बंधान में बाँध दिये जाने की सामाजिक और पारिवारिक मज़बूरियाँ विद्यमान हैं।

कहने को तो हम खूब प्रचारित करते आ रहे हैं कि आज़ादी के बाद हमारे देश में एक नई सामाजिक क्रांति आई है। हमने अपने प्रयासों से वर्गभेद और जातिभेद के नज़रिए को समाप्त किया है तथा निम्न वर्ग के लोगों में स्वाभिमान जागृत किया है और वे राजनैतिक सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में उच्च वर्गों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर अपने-अपने कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। हमारी इन सब उपलब्धियों के साथ ही जब हम कुछ जातियों और वर्गों में कुरीतियों, दकियानूसियों और पारंपरिक सोच के उदाहरण देखते हैं, तो हमें सामाजिक विकास की उपलब्धियों के नारे बेतुके लगने लगते हैं।

एक सुखी, समृध्द और स्वस्थ परिवार और समाज के लिए यह ज़रूरी है कि दाम्पत्य जीवन एक परिपक्व आयु के बाद ही शुरू होना चाहिए। शिक्षित समाज में तो मनुष्य अपने स्वस्थ और सुखी जीवन के प्रति जागरूक है, किंतु जहाँ अशिक्षा और गरीबी है, ऐसे समाज में आज भी कच्ची उम्र के लड़के-लड़कियों में शादियाँ हो ही रही हैं। बाल विवाह पर रोक के लिए लागू शारदा एक्ट आज अस्तित्व में तो है किंतु इसका प्रभाव जिस रूप में दिखना चाहिए वह नहीं दिख पाता। ऐसा नहीं कि बाल विवाह के मामले केवल दूर दराज़ के अंचलों में ही होते हो, बल्कि जब शादियों का मौसम आता है तब बाल विवाह नगरी क्षेत्रों में भी धड़ल्ले से होते हुए नज़र आते हैं। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के विभाग भले ही कहें कि बाल विवाहों पर कड़ी नजरें रखी जा रही हैं और कहीं भी बाल विवाह नहीं हो पा रहे हैं, किंतु इसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही है। अभी हाल में सी.एस.आर.(सेंटर फॉर स्पेशल रिसर्च) ने नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ पब्लिक कॉरपोरेशन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट के साथ मिलकर एक अधययन किया है। इस अधययन के प्रतिवेतन के मुताबिक यह बात उजागर हुई है कि देश के तीन प्रमुख हिन्दी भाषी राज्यों, राजस्थान, मधयप्रदेश और उत्तर प्रदेश में बाल विवाह प्रथा निरंतर जारी है। अधययन में कहा गया है कि बाल विवाह रोकने के कानून में व्यापक संशोधानों के बाद भी इन तीनों राज्यों में बाल विवाह प्रथा का चलन थमता नज़र नहीं आ रहा है। इन राज्यों में बाल विवाह करने वाली जातियों और समाजों का अनुपात ज्यादा है। सी.एस.आर. की रिपोर्ट के अनुसार बाल विवाह करने वाली जातियों का अनुपात मधयप्रदेश में सबसे ज्यादा, 77.2 प्रतिशत है, जबकि राजस्थान में 41 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में यह अनुपात सिर्फ 10 प्रतिशत है।

इन राज्यों के ये ऑंकड़े बताते हैं कि इन जातियों में आज भी पिछड़ापन बरकरार है और अशिक्षा और गरीबी के कारण इन जातियों में सामाजिक बदलाव नहीं आ पाया है। यह ज़रूरी है कि बाल विवाह की समस्या से निबटने के लिए सामाजिक स्तर को सुधारा जाय ! लोगों को विकास की मुख्य धारा से जोड़कर उनमें व्याप्त अशिक्षा जातिगत भेदभाव और गरीबी के अभिशाप से उन्हें मुक्त कराया जाय। विशेष तिथियों, पर्वों और अवसरों पर विभिन्न जातियों और समाजों में सामूहिक विवाह के आयोजन की परम्पराऐं चली आ रही हैं। सामूहिक विवाहों की परम्परा ऐसे परिवारों के लिए बड़ी ही राहत का काम करती हैं जो निर्धान हैं, और जो समाज की मुख्यधारा से जुड़ नहीं पाये हैं। सामूहिक विवाहों ने एक आदर्श भी कायम किया है और वह यह कि ऐसे विवाहों में फिजूलखर्ची से बचा जा सकता है और एक ही मंडप तले कई जोड़े वैवाहिक बंधान में बँधा जाते हैं।

जिन जातियों और वर्गों में अपनी आने वाली पीढ़ी के भविष्य का कोई नक्शा नहीं होता और जिनका पारंपरिक छोटा व्यवसाय और मज़दूरी ही जीवनयापन का ज़रिया है उन जातियों में बाल्यकाल अवस्था में ही अपने बच्चों की वैवाहिक जिम्मेदारियों से मुक्त होना अपनार् कत्तव्य समझा जाता है। यह माना  कि जब-जब बाल विवाह की जानकारियाँ मिलती हैं, प्रशासन कार्यवाही करने को उन्मुक्त तो होता है, किंतु कई बार विवाह जैसे संवेदनशील अवसरों पर यह कहकर अनदेखी कर दी जाती है, कि इसके संबंधा में कहीं से किसी ने शिकायत नहीं की है। यह भी एक कारण है जिस वज़ह से बाल विवाह को रोकने की प्रक्रिया तत्परता से नहीं हो पाती है।

यह अब ज़रूरी हो गया है कि विकास के इस व्यापक परिदृश्य में पिछड़ी जातियों और वर्गों के लोगों के सामाजिक उत्थान के कार्यक्रमों को सक्रिय बनाया जाय और लोगों की मानसिकता में बदलाव लाया जाय। यह तभी संभव है जब शिक्षा और सामाजिक सुधारों के उपायों का गंभीरता से संचालन हो और लोगों को बालविवाह जैसी कुरीतियों से होने वाले दुष्परिणामों से अवगत कराकर उन्हें जागृत किया। साथ ही इस ओर भी गंभीरता से धयान दिया जाय कि बाल विवाह की रोकथाम के लिए लागू कानूनों का समय पर सख्ती से पालन भी कराया जाय!

राजेन्द्र जोशी