संस्करण: 11फरवरी-2008

क्षेत्रीयता फैलाने से राष्ट्र को क्षति
   अंजनी कुमार झा

  विद्वेष व घृणा, भय व आतंक के घिनौने चेहरे को पेश कर मुम्बई में गुंडागर्दी का तांडव बेअसरकारी के साथ कई अनुत्तरित सवाल छोड़ गया। शिवसेना से अलग हुई राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना उसी मुद्दे को केन्द्रित कर राजनीति कर रही हे, जिसे सीनियर ठाकरे ने छोड़ दिया। क्षेत्रीयता अल्पकाल तक खूब भाती है, किंतु बाद में यही नासूर बन जाती है। समाजवादी पार्टी की रैली में ठेस पहुंचाने वाले भाषणों ने राज को मुद्दा दे दिया, जिसे उन्होंने क्षेत्रीयता की रोटी सेंकने में लगा दी। उत्तर भारतीयों को निशाना बनाते हुए बिग बी अमिताभ बच्चन व अन्य के बंगलों में तोड़फोड़ ट्रेनों के प्रवेश पर पाबंदी व बंद का ऐलान आदि कृत्यों से एक बार फिर हम सभी शर्मसार हुए। भारतीय समाज व लोकतंत्र कच्चे धागे से नहीं बना जो ऐसी अदूरदर्शितापूर्ण राजनीति से दुर्बल हो जायेगी। स्वयं बाल ठाकरे ने बच्चन परिवार का बचाव कर राज की संकुचित मानसिकता को लगाम दिया। यूं तो पूरे महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के खिलाफ ज़हर घोलने का कुप्रयास किया जा रहा था। तोड़फोड़, पिटाई आदि कर माहौल बनाने के फिराक में राज तो थे, किंतु यह अभियान फ्लॉप रहा। महाराष्ट्र में शिवसेना की छतरी से अलग अपना आशियाना ढूंढ रहे राज राजनीति में कुछ तो जगह बने, कहीं से कुछ भी हासिल हो, के लिए नयी नायिका की तरह कुछ भी करने को तैयार हैं। उत्तर प्रदेश में सूपड़ा साफ़ होने के बाद मुम्बई व अन्य इलाकों में कुछ सीटें प्राप्त करने के लिए समाजवादी पार्टी भी ऐसे हथकंडों का इस्तेमाल कर रही है। अबू आजमी सपा के महाराष्ट्र में बड़े नेता माने जाते हैं। अपराध की दुनिया में एक बड़ी हस्ती हैं। आपराधिक छवि वाले जनप्रतिनिधियों की सपा में लंबी सूची है।

स्वयं बाल ठाकरे ने लंबे समय तक क्षेत्रीयतावाद को उभारा तो पार्टी भी संकुचित हो गई। इसलिए अब वे ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं करते हैं।राज्य किसी  देश की इकाई होती है। किसी भी प्रांत में कोई भी उस देश का नागरिक निवास कर सकता है, नौकरी आदि कर सकता है। ऐसे में पूर्वोत्तर राज्य असम की भांति विरोध न्यायसंगत नहीं है। भाषा व क्षेत्र के आधार पर भारत को बांटने से इसका अर्थ संकुचित हो जायेगा और यह सोवियत संघ की तरह विखंडित हो जायेगा। सैकड़ों वर्ष पूर्व के इतिहास का अवलोकन करें तो लघु मानसिकता के कारण लघुत्तम हिस्सों के हजारों राजा केवल अपने क्षेत्र के लिए मर-मिटते थे। राष्ट्र के प्रति चिंतन न करने का परिणाम हुआ कि शक, हूण, अफगानी, इसकी, मुगल, ब्रिटिश ने हमें खूब रौंदा और सब कुछ थोप हमें गुलाम बना दिया।

यह बात हमें निश्चित रूप से समझना और मानना चाहिये कि बाहर की माटी से बसे लोग भी नयी माटी के लिए उतना ही मर-मिटते हैं जितना स्थानीय। मॉरीशस, फिज़ी, गुयाना की दलदल व बंजर जमीन को भारतीयों ने ही सोना बनाया। स्थानीय जनों का स्नेह, आदर व विश्वास अन्य राज्यों के लोगों पर होना आवश्यक है। क्षेत्रीयता की रोटी सेंकने के लिए अन्य जिलों के लोगों को खदेड़ने का भी अभियान छेड़ा जाता है। ऐसे संकुचित विचारों को स्पर्श भी करना मानवता से धोखा है। लघु भारत का पर्याय मुम्बई व्यावसायिक राजधानी ही नहीं, माया नगरी भी है। उत्तर, दक्षिण, पूर्व व पश्चिम चारों दिशाओं की छटा से बने इंद्रधानुषी मुम्बई में लाखों लोग श्रम, सृजन, कौशल से इसे समृध्द बना रहे हैं। दिल्ली, कोलकाता, बेंगलूर, आदि महानगरों में भी विभिन्न क्षेत्र, भाषा के लोग हैं। वहाँ तो ऐसा विरोध नहीं है।

शिवसेना में रहते राज की छवि कर्मठ नेता की थी। विरासत बाल ठाकरे की न मिलने पर विद्रोह कर नई दुकान बना तो ली पर चले कैसे ? शिवसेना से आगे निकलने के लिए राज ने तुरूप का पत्ता फेंका जो गटर में ही गिरा।जयललिता, करूणानिधि जैसे क्षत्रप अब उत्तर भारत में हिंदी में जनसभा संबोधित करते है। क्षेत्रीयतावाद, भाषावाद का विषबेल तो तमिलनाडु से ही पूरे भारत में फैला। पर आज सकारात्मक स्थिति है। ग्लोबल नज़रिये से देखने पर पूरी दुनिया एक विश्व ग्राम है, तब मुंबई को सिर्फ़ मराठी मानुषों का प्रांत बनाने की बात करना दुराग्रह ही नहीं, मानसिक रूप से पिछड़े होने की भी निशानी है। क्या गैर मराठियों के बगैर मुंबई का हिंदी फिल्म उद्योग इस तरह चमक सकता था ? कोई आबादी सिर्फ स्थानीय लोगों के बूते जीवित नहीं रहती, उसे निखारने में उन लोगों का भी हाथ होता है, जो बाहर से आकर वहाँ बस जाते हैं।सभ्यताएं आखिर इसी तरह बनती हैं।

शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने 'आमची मुंबई' का कार्ड खेलकर 1990 खेलकर 1990 के दशक में अपनी राजनीति चलाई, पर अकेले कभी प्रदेश की सत्ता हासिल नहीं कर सके। मुंबई की पौने दो करोड़ आबादी में आज महाराष्ट्रीय केवल 30 फीसदी हैं। इसी कारण सीनियर ठाकरे छठ जैसे महापर्व में शामिल होते हैं और उत्तर भारतीयों पर भड़काऊ टिप्पणी नहीं करते। बताते चलें कि 1966 में अपनी स्थापना के साथ शिवसेना ने दक्षिण भारतीय विरोधी आंदोलन शुरू किया था। उस काल में बड़ी संख्या में दक्षिण भारत के लोग आ बसे थे। नब्बे के दशक में उत्तर भारतीयों की बड़ी तादाद से घबराये ठाकरे दक्षिण को छोड़ उत्तर का विरोध 1995 से करने लगे। यह खेल उन्हें काफ़ी भारी पड़ा। शिवसेना बुरी तरह हार गई। फिर उनका स्वर मृदु होने लगा। आज स्थिति यह हो गई है कि ऑटो, टैक्सी, पान, दूध, लाइनमैन, वाचमैन, चमड़ा, बेकरी, चाय, समोसे, सब्जी, फूल अर्थात जीवनरेखा ही पर प्रांतीय पसीने से चल रही है। मुंबई को ग्लैमर, मनोरंजन की राजधानी, व्यावसायिक राजधानी बनाने में दूसरे प्रांतों का योगदान कहीं ज्यादा है। शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, सिनेमा, टी.वी., पत्रकारिता, साहित्य, नौकरशाही सब में वे छाये हैं।

क्षणिक लाभ के लिए स्थानीय गौरव को महिमामंडित कर राजनीति की दुकानें चलायी जाती हैं। दुर्भाग्यवश ऐसे उन्माद, हिंसा के समय वाम, काँग्रेस व भाजपा तमाशबीन रहते हैं। राष्ट्रीय आकार, लंबा इतिहास, विचारधारा, वैश्विक सोच सब कुछ तालाब के पानी की तरह ठहर जाता है। यह चिंतनीय बिन्दु है। उल्लेखनीय है कि जब देश पांच सौ से भी अधिक रियासतों-रजवाड़ों में बँटा था, तब भी गुणी कलाकार, मज़दूर, प्रशासक, व्यापारी, प्राकृतिक व कृत्रिम अवरोधां की बेड़ियों को तोड़ एक जगह से दूसरी जगह बसते थे। विडंबना है कि संकीर्ण मानसिकता से इतने तुषारापात के बाद भी हम जकड़े हैं। इसे पूरी तरह नष्ट कर राष्ट्रीय सोच विकसित करने आवश्यकता है।

अंजनी कुमार झा