संस्करण: 11फरवरी-2008

पुलिस का राजनीतिकरण
   महेश बाग़ी

मधयप्रदेश में अपराधियों के हौसले बुलंद है। राजधानी भोपाल हो या इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर। हर जगह अपराधियों ने सिर उठा रखे हैं और पुलिस प्रशासन बेबस नज़र आ रहा है। लूटमार और राहजनी में भोपाल सबसे आगे है। सरासरी तौर पर इस नाकारापन के लिए पुलिस प्रशासन को कोसा जाता है, पर तह में जाने पर पता चलता है कि इसकी असली वज़ह राजनीति है। नेताओं की अपराधियों से यारी है और पुलिसकर्मियों के तबादले उनकी कमाई का ज़रिया है। इस कारण लगभग पूरे प्रदेश का पुलिस डंडा तंत्र चरमरा गया है। प्रदेश के सबसे बड़े व्यावसायिक नगर इंदौर में अपराधियों पर इसलिए अंकुश नहीं लग पा रहा है, क्योंकि वहाँ नेताओं ने अपनी-अपनी पसंद से टी.आई. पदस्थ कराए हैं। अपराध बढ़े तो एस.पी-आई.जी को कटघरे में खड़ा किया जाता है, पर इसकी असली वज़ह राजनीति है। यह तथ्य प्रकाश में आ चुका है कि इंदौर के छत्तीस में से पच्चीस थाना प्रभारियों सीधो पुलिस मुख्यालय से थाने आवंटित किए गए हैं। सरेआम भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अराजकता का यह जीता-जागता उदाहरण है। जहाँ तक बड़े पुलिस अफसरों का सवाल है तो वे भी अपने राजनीतिक आकाओं से नज़दीकी संबंधा या रिश्तेदारी के चलते मलाईदार जगहों पर तैनात हैं। इस प्रशासनिक अराजकता के चलते कोई आई.जी. या एस. पी. किसी थाना प्रभारी के कान कैसे उमेठ सकता है ?

इसमें कोई दो राय नहीं कि कई पुलिसकर्मी खुद अपराधिायों को संरक्षण देकर अवैधा काम करवाते हैं। ऐसे बीस-तीस बदनाम पुलिसकर्मियों का तबादला कर दिया जाए और वे सीधो मंत्री से मिल कर तबादला आदेश निरस्त करवा लाएं तो फिर एस.पी. की क्या मज़ाल जो वह इन पुलिसकर्मियों को आंख दिखा सके। ऐसे पुलिस कर्मी कानून-व्यवस्था की बजाय अपने संरक्षक नेता और उसके अवैध धांधों का संरक्षण करते हैं। पुलिस प्रशासन में राजनीति किस कदर हावी है, यह इसी से समझा जा सकता है कि प्रदेश के गृहमंत्री हिम्मत कोठारी ने कई नए टी.आई. को सीधो प्रमुख थानों का चार्ज दे दिया है। फील्ड में तथा संवेदनशील क्षेत्रों में अब तक अनुभवी टी.आई. पदस्थ करने की ही परंपरा रही है, लेकिन अब मंत्री का चहेता होना सबसे बड़ी योग्यता बन गया है। जिन थाना प्रभारियों के सिर पर सीधो गृह मंत्री का हाथ हो वे अपने सी.एस.पी.-एस.पी. के निर्देश का कितना ख्याल रखते होंगे, यह बताने की ज़रूरत नहीं है। ऐसे में अगर अपराधां का ग्राफ़ बढ़ने लगे तो एसपी-आईजी को कोसने का क्या मतलब है ?

पुलिस मुख्यालय से सीधो टी.आई. नियुक्त करने के गोरखधांधो से विभागीय मंत्री सत्ता की दलाली करने वाले विधायकों को भले ही लाभ हो रहा हो, पर बदले में समूचा पुलिस तंत्र निरंकुश और अराजक हो गया है। अपराधों के बढ़ने में पुलिस की नाकामी जितनी ज़िम्मेदार होती है, उतनी ही ज़िम्मेदारी राजनीति की भी है, जिसके नेता पुलिस कार्यवाही में बाधा डालते हैं, बेजा हस्तक्षेप करते हैं और अपराधियों को संरक्षण देते हैं। इसलिए यदि अपराध बढ़ने पर आईजी-एसपी को ज़िम्मेदार माना जाता है तो इस दायरे में विभागीय मंत्री को भी रखा जाना चाहिए। मीठा मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू की नीति पर चल कर अपराधों का ग्राफ कम नहीं किया जा सकता है। गृहमंत्री के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक और कोई तथ्य नहीं हैं कि रामभक्त और गोभक्त कहलाने का दंभ भरने वाली सरकार के राज में गोमांस का अवैध कारोबार तेज़ी से बढ़ा है। हाल ही में कई ट्रक, गोमांस जब्त भी किया गया है और अब इसके आरोपियों को बचाने के लिए गोभक्त सरकार के मंत्री-विधायक ज़ोर लगा रहे हैं। इससे भाजपा का असली चेहरा एक बार फिर सामने आ गया है। गोमांस के अवैध कारोबार का पर्दाफाश करने वाले पुलिसकर्मियों को तबादले का 'उपहार' देने की तैयारी की जा रही है। यदि ईमानदार पुलिसकर्मी इसी तरह प्रताड़ित होंगे और मंत्री-विधायक के मुंह लगे अफसर मलाई उड़ाएंगे तो कानून व्यवस्था का जनाज़ा तो निकलेगा ही और यही हो रहा है। अपराधी अपराध करने के लिए स्वतंत्र हैं, पुलिसकर्मी तमाशा देख रहे है और आम जनता लुटने के लिए अभिशप्त है तो इसका कारण सिर्फ और सिर्फ़ राजनीति ही है।

अगर प्रदेश में कानून व्यवस्था की गाड़ी पटरी पर लाना है तो पुलिस प्रशासन में राजनीतिक दख़लंदाज़ी पर सख्ती से रोक लगाना होगी। इसके बाद मंत्री-विधायकों के अयोग्य रिश्तेदार पुलिस अफसरों को सीधो पुलिस मुख्यालय में अटैच करना होगा। जो पुलिसकर्मी अच्छे काम कर रहे हैं, उन्हें पुरस्कृत करना होगा और जो अपराधियों के मद्दगार बने हैं, उन्हें सुदूर अंचलों में भेजना होगा।यह राजनीतिक हस्तक्षेप को तिलांजलि देने पर ही संभव होगा। अभी तो यह हालत है कि एक सिपाही के तबादले की फाइल भी गृहमंत्री की टेबल पर पहुंच रही है। ऐसे में व्यवस्था में सुधार कैसे संभव है ? इन हालातों में आम जनजीवन असुरक्षित होना तय है, क्योंकि यहाँ तो बागड़ ही खेत खा रही है।

महेश बाग़ी