संस्करण: 11फरवरी-2008

 नर्मदा जयन्ती - 13 फरवरी पर विशेष भोग और मोक्ष दायिनी नर्मदा
    बालमुकुंद भारती

     नर्मदा की गणना देश की पांच बड़ी तथा सात पवित्रतम नदियों में की जाती है। इसकी महिमा का वर्णन पुराणों में किया गया है। स्कन्द पुराण का रेवा खण्ड तो नर्मदा को ही समर्पित है। पुराणों के अनुसार यह पृथ्वी की प्राचीनतम नदी है, जो प्रलय के प्रभाव से भी मुक्त है। पवित्रता की दृष्टि से यह श्रेष्ठतम है, क्योंकि महर्षि मार्कण्डेय के अनुसार इसके दोनों तटों पर साठ करोड़ साठ हजार तीर्थ स्थित हैं अर्थात पग-पग पर तीर्थ हैं, जबकि अन्य पवित्र नदियों पर कुछ ही तीर्थ है। इसकी पवित्रता का उल्लेख करते हुए कहा जाता है कि नर्मदा का हर कंकर शंकर है। दूसरी पवित्र नदियों में स्नान करने से मनुष्य मोक्ष और पुण्य लाभ अर्जित करता है, किन्तु नर्मदा के तो दर्शन मात्र से उसे इन लोगों की प्राप्ति होती है।

आदि शंकराचार्य के अनुसार-

सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वयज्ञेषु यत्फलम्।

सर्ववेदेषु यत्रज्ञान तत्सर्व नर्मदातटे॥

अर्थात सम्पूर्ण तीर्थों में स्नानादि से होने वाला पुण्य तथा समस्त यज्ञों के हो चुकने पर जो फल व समग्र वेदाधययन करने पर जो ज्ञान मिलता है, वह सब नर्मदाजी के तट पर विद्यमान है। इसे यदि एक वाक्य में कहा जाये तो कहा जा सकता है कि रेवा तट पर निवास करने से भोग और मोक्ष दोनों सुलभ हो जाते हैं।

यह भी मान्यता है कि नर्मदा में गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों पवित्र नदियों के गुणों का समावेश है। केवल यही एक ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। निमाड़ के प्रसिध्द साहित्यकार श्री रामनारायण उपाधयाय के अनुसार 'नर्मदा की परिक्रमा यानी भारत के हृदय की परिक्रमा। लोक संस्कृति, लोक भाषा का परिचय प्राप्त करना, भारत के हृदय से जुड़ना। एकता की प्रतीक है यह नर्मदा परिक्रमा। रेवा संघर्ष करती है, पहाड़ों को तोड़ती है, यह नदी संघर्ष की प्रतीक है। उसका पास का सान्निधय स्वाभिमान पैदा करता है। स्वाभिमान का प्रतीक है नर्मदा। मैं तो इसी रूप में लेता हूँ परिक्रमा को।

महर्षि वाल्मीकि के अनुसार महाबली रावण नर्मदा तट तक आया था और उसने अपने मंत्रियों तथा परिचरों को नर्मदा में स्नान कर पापमुक्त होने का निर्देश दिया। साथ ही स्वयं भी नर्मदा को पुष्पोहार अर्पित किये। नर्मदा के तट पर महर्षि मार्कण्डेय, महर्षि कपि, महामुनि अगत्स्य सहित अनेक ऋषि-मुनियों ने तपस्या की और यहीं आदि शंकराचार्य ने अपने गुरू महान योगी श्री गोविन्द भगवत्पाद से सन्यास की दीक्षा ली थी। यह अलग बात है कि दीक्षास्थल के बारे में मतैक्य नहीं है। विद्वान श्री कुप्पु स्वामी यह स्थल डिंडोरी जिले में कुकुड़नाथ के समीप मानते हैं, जबकि जगदगुरू शंकराचार्य श्री स्वरूपानन्द सरस्वती नरसिंहपुर जिला में सांकल और कामकोटि पीठ के शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती ओंकारेश्वर के निकट मानते हैं। नर्मदा तट पर ही आदि शंकराचार्य ने मण्डन मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित कर अपने पांडित्य का कीर्ति धवज फहराया था।

हमारे पुराण नर्मदा की उत्पत्ति भगवान शिव के श्वेद कणों से मानते हैं। एक पक्ष की मान्यता है कि लोक कल्याणार्थ शिव शंकर जब एक शैल शिखर पर कठोर तप करने लगे तो उनके शरीर से बड़ी मात्रा में श्वेद (पसीना) निकला, जिसने नर्मदा का रूप धारण कर लिया। दूसरे मतानुसार चन्द्रवंश के राजा हिरण्यतेजा को श्राध्द तर्पण के समय जब आभास हुआ कि उसके पितर अतृप्त हैं तो उसके भगवान शिव की आराधाना की और नर्मदा को पृथ्वी पर उतारा। यह कथा गंगा को पृथ्वी पर लाने में भागीरथ सदृश्य प्रयत्न प्रस्तुत करती है। यह मतभिन्नता होते हुए भी हमारी धार्मिक मान्यताएँ नर्मदा की उत्पत्ति शिव से स्वीकार करती है। इसीलिए नर्मदा को एक नदी के रूप में नहीं, आदिशक्ति के रूप में पूजा जाता है।

विंधयाचल की मेकल श्रेणी से निकली नर्मदा देश के हृदय-भाग को रससिक्त करती है। यह पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और अपने मोहाने पर डेल्टा नहीं बनाती। इसका आंचल उर्वर भूमि, वन संपदा तथा विविधाताओं से ओत-प्रोत है। इस क्षेत्र की माटी आज भी मधयप्रदेश की सभ्यता एवं संस्कृति के वैभवशाली इतिहास के गीत गाती है।

यद्यपि यह नदी मधयप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में बहती है, पर मूल रूप में मधयप्रदेश की नदी है। इसे मधयप्रदेश की जीवन रेखा भी कहा जाता है। अपने उद्गम स्थल अमरकंटक (जिला शहडोल मधयप्रदेश) से भड़ौंच (गुजरात) के निकट खंवाब की खाड़ी में समुद्र से मिलने तक कुल 1312 किलोमीटर में से 1077 किलोमीटर मधयप्रदेश में बहती है। इसका मुल जलग्रहण क्षेत्र कोई 98,800 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से कोई 88 प्रतिशत मधयप्रदेश में है। नदी कछार में कुल 160 लाख एकड़ कृषि योग्य भूमि में से कोई 144 लाख एकड़ मधयप्रदेश में है। नर्मदा की जलराशि बढ़ाने में योगदान करनेवाली सहायक नदियां भी प्राय: मधयप्रदेश में है। इनमें दक्षिण तटीय हिरण, तिंदोली, कोलार, और वाम तटीय बरनर, बंजर, तवा, छोटा तवा आदि उल्लेखनीय हैं।

विंधयाचल और सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के बीच काफ़ी लम्बाई तक बहनेवाली नर्मदा जबलपुर से बड़वानी तक संकरी और गहरी है। इसलिए यह क्षेत्र बांधों के लिए उपर्युक्त गया है। नर्मदा जल विवाद प्राधिकरण की अनुशंसा के अनुसार नर्मदा नदी पर कुल 29 वृहद्, 158 मधयम तथा 300 लघु स्तर की परियोजनाओं का निर्माण प्रस्तावित है। इनसे 3000 मेगावाट विद्युत का उत्पादन होगा और कोई 27 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई संभव होगी। सरदार सरोवर गुजरात की और इंदिरा सागर मधयप्रदेश की सबसे बड़ी परियोजनाएँ हैं। इंदिरा सागर जलाशय देश का सबसे बड़ा जलाशय है, जिसकी क्षमता 12,2 अरब घनमीटर है, जो एक अरब जनता को पीने के पानी की आवश्यकता हेतु पूरे एक वर्ष के लिये पर्याप्त है। इसमें प्रयुक्त 19 लाख घनमीटर कंक्रीट से दो फीट व्यास एवं दो इंच मोटाई का पाइप पृथ्वी का एक चक्कर लगा सकता है।1.27 लाख एम आई. जी फ्लेट या भोपाल से दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई तथा मुम्बई तक सड़क बनाई जा सकती हैं इस परियोजना से 100 मेगावाट विद्युत का उत्पादन होगा और 2.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होगी। इंदिरा सागर का पानी ओंकारेश्वर जाएगा, जहाँ कोई 520 मेगावाट विद्युत का उत्पादन होगा तथा 1.47 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई संभव होगी। सरदार सरोवर परियोजना से मधयप्रदेश को कोई 826.5 मेगावाट विद्युत मिलेगी। बरगी, तवा, बारना, कोलार, मुक्ता और मटियारी परियोजना पहले ही तैयार हो चुकी हैं और उनसे सिंचाई हो रही है।

इस प्रकार मोक्ष और पुण्य के लिए चिरकाल से प्रसिध्द नर्मदा लोगों को पानी और बिजली उपलब्धा कर उनके भौतिक जीवन को भी संवार रही है। आइये, इस नर्मदा जयंती पर हम संकल्प करें कि इस पावन नदी को प्रदूषित होने से बचायेंगे तथा उसके आंचल को हरा-भरा रखेंगे।

बालमुकुंद भारती