संस्करण: 11फरवरी-2008

भेदभाव में उलझा मध्यान्ह भोजन
   अमिताभ पाण्डेय

गैरबराबरी, जातिगत भेदभाव की जड़े ग्रामीण समाज में कितने गहराई तक जमी है इसकी एक मिसाल रोली पीपलिया नामक गांव में देखी जा सकती है जहाँ स्कूली बच्चों को मिलने वाला मधयान्ह भोजन दलित और सवर्ण समुदाय के बीच उलझकर रह गया है। हालात यह है कि पिछले 15 दिनों से बच्चों को भोजन नहीं मिल रहा है। बच्चों के अभिभावक इसकी शिकायत करते करते सरकार के दरवाजे तक आ पहुँचे है।

आप भी रोली पिपलिया गांव में रहने वाली दो दलित महिलाओं मुन्नी बाई, भगंवताबाई से मिल सकते हैं जो कि अपने गांव के स्कूल में मधयान्ह भोजन शुरू किये जाने की अर्जी लेकर नौकरशाही के गलियारों में घूम रही हैं। वे इस उम्मीद में है कि कोई अफसर उनकी परेशानी को धयान से सुनेगा, अन्याय को बयान करती उनकी अर्जी लेगा, प्रभावी कार्य करेगा। भगवंता बाई के साथ उसकी छोटी सी बेटी आरती भी है, जो प्राथमिक विद्यालय रोली पिपलिया में पढ़ती है। आरती के मुताबिक ''पेला आदी छुट्टी में हमारे दो दो रोटी ने दाल मिलती थी अबे नरा दिन हुई गया स्कूल में रोटी नी मिले।''

रोटी मिलना क्यों बंद हो गई ? इस सवाल का जवाब देते हुए भगवंता बाई बताती है कि पहले हमारे बाप के स्कूल में यादव समाज की एक महिला सुगनबाई खाना बनाती थी। जब मधयान्ह भोजन बनाने का काम स्व-सहायता समूहों का देने का फैसला हुआ तो हमारे समाज(दलित) की 10 महिलाओं ने मिलकर दीपिका स्वयं सहायता समूह का गठन किया। दलित समाज की महिलाओं के इस समूह ने गांव के सरपंच मनोहर सिंह भाटी, उपसरपंच बाबू यादव को आवेदन दिया कि स्कूल में मधयान्ह भोजन बनाने की जिम्मेदारी उनके समूह को दे दी जाये। नियमों के मुताबिक तो इसमें कहीं, कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन समूह की महिलाओं का दलित वर्ग से होना ही सबसे बड़ी आपत्ति बन गया। लगभग 600 लोगों की आबादी वाले रानी पीपलिया गांव में सेंधाव, राजपूत, यादव समाज के लोग बड़ी संख्या में है जिन के बच्चे भी स्कूल पढ़ने जाते है। इन बच्चों को धयान में रखते हुए ही यादव समाज की महिला से खाना बनवाया जाता था। जब दीपिका स्व-सहायता समूह ने मधयान्ह भोजन बनाने का आवेदन दिया तो सरपंच ने उसे यह कह कर खारिज़ कर दिया कि तुम्हारे हाथ का बना हुआ खाना हमारे बच्चे नहीं खायेगें इसलिए हमें तुमसे भोजन नहीं बनवायेगें। सरपंच के इंकार के बाद से हालात यह है कि रानीपीपलिया गांव के बच्चों को 1 दिसम्बर से मधयान्ह भोजन मिलना ही बंद हो गया है। सरपंच अब भी सवर्ण वर्ग की महिला से खाना बनवाना चाहते है, जबकि दलित वर्ग के दीपिका स्वयं सहायता समूह ने मधयान्ह भोजन बनाने के लिए कई बार आग्रह किया है जिसे स्वीकार नहीं किया जा रहा है। दलित और सवर्ण वर्ग के बीच पैदा हुई जातिवाद की इस खाई के कारण बच्चे मधयान्ह भोजन से दूर हो गये है। स्कूल के अधयापक उमराव सिंह एवं एक महिला शिक्षक इस मुद्दे पर कुछ बोलने की स्थिति में नहीं है। पहली से पांचवी कक्षा तक कुल जमा 215 से अधिक बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी इन दोनों शिक्षकों पर है इसलिए वे स्कूल की दूसरी समस्याओं में उलझना नहीं चाहते है। सरपंच किसी भी स्थिति में दलित वर्ग की महिलाओं से स्कूल में मधयान्ह भोजन बनवाने को तैयार नहीं है।

गौरतलब है कि रानीपीपलिया गांव भोपाल इन्दौर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित सुप्रसिध्द जैन तीर्थ पुष्पागिरी से लगभग तीन किलोमीटर दूर है। सोनकच्छ विकासखण्ड के इस गांव का विधानसभा में प्रतिनिधित्व भी दलित वर्ग के प्रतिनिधि एक विधायक ही करते है परन्तु उन्होंने इस सम्बन्धा में अब तक कोई कार्यवाहीं नहीं की है।

प्रसंगवश बताते चले कि सोनकच्छ विधानसभा क्षेत्र के स्कूलों में जातिगत आधार पर बच्चों से भेदभाव की यह अकेली घटना नहीं है। इस इलाके में शिक्षा के लिए कार्य कर रही एक संस्था जनसाहस की कार्यकर्ता संगीता बताती है कि बीसाखेड़ी, खेरिया जागीर, सहित आधा दर्जन गांवों में बच्चे सामाजिक गैर बराबरी के आए दिन शिकार होते है। इसकी शिकायत उच्चाधिकारियों तक पहुँचाने के बाद भी यथाशीघ्र कार्यवाहीं नहीं होती।

बहरहाल मधयान्ह भोजन न मिलने की शिकायत सोनकच्छ विकासखण्ड तक के गांवों तक ही समिति नहीं है। अशोक नगर, राजगढ़ सहित कुछ अन्य जिलों के दूरस्थ गांवों में यदि आला अफसर अचानक पहुँच कर स्कूलों का मुआयना करें तो वहाँ भी परिणाम चौंकानेवाले ही मिलेगें। अपने बचपन में ही भेदभाव का शिकार होने वाले बच्चों को जब इससे मुक्ति मिलेगी तब ही संविधाान के निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर का समतामूलक समाज का सपना साकार हो सकेगा फिलहाल तो भेदभाव मुक्त शिक्षा का सपना अधाूरा ही है।

अमिताभ पाण्डेय