संस्करण: 11फरवरी-2008

 प्रधानमंत्री की चीन यात्रा और भारत चीन सीमा विवाद
    वीरेन्द्र जैन

हमारे प्रधानमंत्री की हालिया चीन यात्रा के बाद पत्रकारों को दिया गया बयान भले ही औपचारिक हो किंतु उनकी मुस्कान औपचारिक नहीं थी अपितु वह वास्तविक  संतोष की खुशी को प्रकट कर रही थी।

भारत और चीन एशिया के दो ऐसे पड़ोसी देश हैं जिनकी सांस्कृतिक मित्रता सदियों पुरानी है। न केवल धर्म और दर्शन के सम्बंध होने के कारण चीन के बौध्द धार्मावलंबियों के लिए भारत भूमि एक तीर्थ स्थल की तरह रही है अपितु उनके व्यापारिक सम्बंध भी उतने ही पुराने हैं। इन संम्बंधों के खराब होने के पीछे केवल अमरीका का साम्राज्यवाद रहा है जो हमेशा से ही भारत और चीन की दोस्ती से अपनी दादागीरी कमजोर होने की आशंकाओं से डर दोनों के बीच दुश्मनी कराने की नीति पर चलता रहा हे।

  1978 के आसपास जब केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार थी तब राम लाल नामक एक व्यक्ति पकड़ा गया था जो विभाजन के समय शरणार्थी के रूप में दिल्ली आया था। बाद में वह तत्कालीन सांसद बृजनारायण ब्रजेश के बंगले के बाहर अधीनस्थ कर्मचारियों के लिए बने कमरों में किराये से रहने लगा था। सांसद के बंगले का पता होने का लाभ उठाते हुये उसने अनेक सांसदों से परिचय गांठ लिया था। इसके बाद उसने अमरीकी दूतावास से सम्पर्क साधा। अमरीकी दूतावास से पैसे लेकर वह परिचित सांसदों को पूछने के लिए सवाल दिया करता था। ये सवाल तत्कालीन नेहरू सरकार की पंचशील की नीतियों को कटघरे में खड़ा करते थे तथा पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा देश का विकास करने की जगह नये नये हथियार खरीद कर अपनी सैन्य शक्तियों को बढाने की ओर इंगित करते थे। भारत और चीन के बीच का सीमा विवाद बढाने में इन प्रश्नों की बड़ी भूमिका रही है। ऐसे ही प्रश्नों के दबाव में नेहरू सरकार को अनचाहे कुछ कदम पडे जो बाद में पूरे देश को बहुत मंहगे पड़े।

 सन 1954 में एशिया के राष्ट्रों का एक सम्मेलन बाडुंग में हुआ था जिसमें एशिया के बड़े राष्ट्र भारत ने दूसरे महान राष्ट्र चीन का अन्य देशों से परिचय कराया और सभी उपस्थित देशों ने एशिया में साम्राज्यवाद विरोधी मोर्चा बनाने का फैसला किया। अमरीका, इंगलैंड, फ्रांस आदि साम्राज्यवादी देशों की एशिया में अरबों डालरों की पूंजी लगी हुयी थी जो भारत के नेतृत्व में एशिया के शोषित-पीड़ित देशों के एकजुट हो जाने से चिंतित हो उठे थे और तभी से वे भारत चीन की दोस्ती को खत्म कराने के लिए तत्पर हो गये थे। भारत 1947 में और चीन 1949 में विदेशी शिकंजें से मुक्त हुये थे पर मुक्ति देने के लिए विवश साम्राज्यवादी देश दोनों को ही कुछ उलझनें सौंप गये थे जिनमें सबसे बड़ी समस्या सीमा विवाद की थी। भारत के नक्शे ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने बनाये थे व अपनी विस्तारवादी नीति के तहत चीन की बहुत सारी जमीन अपने नक्शों में दिखा दी थी जिसके बारे में प्रधानमंत्री नेहरू ने भी कई बार संसद में कहा था कि हमें इसमें से काफी जगह चीन को दे देनी होगी। इसी तरह चीन के नक्शे अमरीकी साम्राज्यवाद की देन थे जिसमें भारत की बहुत सारी भूमि को चीन की बतायी गयी थी। कुल मिला कर पचास हजार वर्गमील जमीन ऐसी थी जिस पर दोनों ही देश अपना अपना दावा कर रहे थें।

   इसी दौरान तिब्बत में पंचमलामा के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन हुआ और अच्छे गोश्त व अच्छी शराब का शौकीन धार्मगुरू दलाई लामा करोड़ों का सोना चाँदी अपने ऊटों पर लाद कर हमारे देश में आ गया और उसे हमने शरण दे दी। यहाँ आकर उसने चीन विरोधी अभियान प्रारंभ कर दिया तो चीन को मित्र देश भारत का रवैया समझ में नहीं आया। उसे लगा कि भारत की दोस्ती के कारण उसने अपनी सीमाओं की उपेक्षा करके भारी भूल की है। सावधानीवश उसने विवाद वाली जगह पर चौकियाँ स्थापित कर लीं और तिब्बत के लिए सीधा रास्ता बनाने हेतु अक्साईचिन में सड़क बना ली। इसे देख कर भारत ने भी उस रहने के लिए कठिन बर्फीले क्षेत्र में अपनी चौकियाँ बना लीं। विवादास्पद क्षेत्र में दोनों की चौकियाँ बन जाने से एक दिन मुठभेड़ भी हो गयी जिसमें भारत के कुछ सैनिक मारे गये। कम होती दोस्ती के प्रति चिंतित चीन के प्रधानमंत्री बातचीत के लिए भारत आये और उन्होंने कहा कि साम्राज्यवादी शक्तियाँ भरत और चीन की दोस्ती को कमजोर करना चाहती हैं इसलिए हमें सीमा विवाद पर मिल बैठ कर फैसला कर लेना चाहिये। पर भाजपा के पूर्व स्वरूप जनसंघ ने थोथे अन्धा राष्ट्रवाद का उन्माद पैदा करने के लिए चाउ एन लाई के विरूध्द प्रदर्शन किया ताकि भारत और चीन किसी समझौते पर न पहुँच सकें। इसी में अमरीकी साम्राज्यवाद की खुशी भी थी।

बातचीत में चाउएनलाई ने नेहरूजी से कहा कि नक्शों के आधार पर अगर फैसला होना है तो हमारे पास आप से भी पुराने नक्शे मौजूद हैं पर दोनों ही देशों के नक्शे साम्राज्यवादी देशों ने बनाये हैं इसलिए व्यवहारिक बात यह है कि जो जमीन भारत के पास है वह भारत रख ले और जो जमीन चीन के पास है वह चीन के पास रहे। इस समझौते में पचास हजार विवादित भूमि में से सैंतीस हजार वर्गमील जमीन हमें मिल रही थी जिसके लिए नेहरूजी तैयार थे क्यों कि छोड़ी जाने वाली पथरीली बंजर जमीन पर घास का तिनका तक पैदा नहीं होता था। बाद में अक्साईचिन की जमीन के बदले में चीन हमें भूटान और सिक्किम के बीच की अपनी जमीन भी देने को तैयार हो गया था। पर समझौता संभव नहीं हुआ। नेहरूजी के मंत्रिमंडल के पं. गोबिन्द बल्लभ पंत को भी यह मंजूर नहीं था। एक सांसद प्रकाशवीर शास्त्री ने तो सदन में अपने गंजे सिर से टोपी हटाते हुये कहा था कि मेरे इस सिर पर एक भी बाल नहीं उगता पर फिर भी मैं अपना सिर किसी को नहीं दे सकता हूँ, जबकि हमारे सैन्य अधिकारियों ने मंत्रिमंडल को सलाह दी थी कि चीन के साथ सीमा विवाद को अपनी सैनिक क्षमता देखते हुए बातचीत से ही तय कर लेना चाहिये। अक्साईचिन और पाकअधिकृत कश्मीर के गिलगिट पर अमरीकी अड्डे के बीच के सामरिक महत्व और साम्राज्यविरोधी राजनीतिक आवश्यकता को अमरीकीपरस्त नेताओं ने समझने नहीं दिया। अमरीका के साथ स्वार्थों के संम्बंधा साधा चुके नेताओं ने ऐसा विषैला वातावरण बनाया कि अपनी भूटान यात्रा पर जाने से पहले नेहरूजी ने पत्रकारों को बताया कि 'मैंने भारतीय सैनिकों को चीनियों को खदेड़ देने के आदेश दे दिये हैं।' परिणाम स्वरूप वह ऐतिहासिक टकराव हुआ और चीनियों ने आगे बढ कर बनायी गयी भारतीय चौकियों पर कब्जा कर लिया तथा जैसा कि सैन्य अधिकारियों को पहले ही चेतावनी दी थी, हमारे सैनिकों को वापिस लौटना पड़ा।

चीन चूंकि साम्राज्यवादी देश नहीं था तथा उसे भारतीय भूमि अधिकार करने में कोई रूचि नहीं थी इसलिए उसने शीघ्र ही अपनी ओर से इकतरफा लामबंदी की घोषणा कर दी और बीस किलोमीटर पीछे हट गया। साथ ही उसने हमारे सैनिक और सम्पूर्ण अस्त्र शस्त्र भी वापिस कर दिये। उसने बाद में भी कहा कि भारत को कोलम्बों प्रस्तावों को दूर रख कर आपसी बातचीत कर के मामले को निपटा लेना चाहिये जिसके लिए हम सदा तैयार हैं। पर यह नहीं हो सका क्योंकि तब तक देश में सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर अमरीका परस्त लोगों का अधिकार हो चुका था। नेहरू जी की शिक्षा स्वास्थ सार्वजनिक क्षेत्र के विकास की पंचवर्षीय योजनाओं को पलीता लगा कर हथियारों की खरीद होना प्रारंभ हो गया था। देश के बजट का एक बड़े भाग का रक्षा में लगते जाने से हमारे देश की गरीबी भुखमरी बेकारी को निर्मूल करने के लिए सार्थक कदम नहीं उठाये जा सके।

    अरूणाचल प्रदेश के राज्यपाल जनरल जे. जे. सिंह (अवकाशप्राप्त) ने कहा है कि प्रधानमंत्री की इस यात्रा के बाद भारतचीन सीमा विवाद खासकर अरूणाचल सैक्टर में विवाद के समाधान में प्रगति हुयी है। उन्होंने कहा है कि भारत चीन मैत्री से अर्न्तराष्ट्रीय सीमा पर शांति कायम करने में मदद मिलेगी। पूर्व विदेश सचिव ने कहा है कि 1962 में तवांग क्षेत्र से चीन के हटने से मैक्मोहन लाइन की स्वीकार्यता के संकेत मिले थे व मैक्मोहन लाइन की स्वीकार्यता के संकेत से स्पष्ट है कि पश्चिमी क्षेत्र का अरूणाचल का शेष बड़ा भाग अब विवादित नहीं रहेगा। इसलिए तवांग क्षेत्र पर उसका दावा केवल सौदे की शर्तों जैसा हैं।

       भारत और चीन की दोस्ती के बीच भारत में अमरीकी परस्त अनेक वाधाएं खड़ी करने की कोशिशें करेंगे जो सभी पार्टियों में हैं। यदि इन से उबर कर भारत चीन के साथ मित्रता करने में कामयाब रहा तो वह सारी दुनिया में अपनी कामयाबी के झंडे गाड़ सकेगा इसमें कोई संदेह नहीं है।

वीरेन्द्र जैन