संस्करण: 10 सितम्बर-2012

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गुजरात दंगा

टूटा 'मसीहा' का मिथक

           कुछ लोगों को मसीहा टाइप दिखने में बड़ा आनंद मिलता है, यदि चापलूसों द्वारा उन्हें मसीहा या महापुरुष की संज्ञा मिलने लगे तो फिर क्या कहना...सोचने लगते हैं कि संसार में अब उनके सिवा कोई नहीं। वस्तुत: यह एक किस्म की बीमारी है, लेकिन आत्ममुग्धता की इस बीमारी की गिरफ्त में आया इंसान न केवल अपना नुकसान करता है बल्कि कई बार लोगों को भी बड़ी मुसीबत में डाल देता है। पर जब तक यह मिथक टूटता है तो तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

? विवेकानंद


मोदी का अहंकार

रावण के समतुल्य हो गया है

        रेन्द्र मोदी द्वारा गुजरात का शासन सम्हालते ही भाजपा का पराभव शुरू हो गया था और गुजरात में व्यक्ति मोदी ने पार्टी भाजपा का स्थान लेना शुरू कर दिया था। गुजरात, देश के दूसरे, विशेष कर गोबरपट्टी काऊ बेल्ट वाले,राज्यों की तुलना में शांति प्रिय राज्य रहा है जिसे दूसरे शब्दों में बनिया राज्य कहा जा सकता है। एक आम गुजराती का सारा ध्यान व्यापार बढाने और धन कमाने में लगा रहता है, इसलिए वह कोई लफड़ा पसन्द नहीं करता।    

? वीरेन्द्र जैन


नरोदा पाटिया निर्णय मोदी और संघ परिवार के गाल पर करारा तमाचा

   हमदाबाद के नरोदा पाटिया में 28 फरवरी, 2002 को 95 लोग मारे गये थे। जिन्होंने यह जघन्य हत्याकांड़ किया था उनमें भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के सक्रिय कार्यकर्ता शामिल थे। शायद हमारे देश के इतिहास में पहली बार एक महिला ने न सिर्फ दंगे में भाग लिया वरन् हजारों के भीड़ में शामिल लोगों को हथियार बांटे,उन्हें मुसलमानों को चुन-चुन कर मारने के लिये उकसाया। इस महिला का नाम मायाबेन कोडनानी है। दंगे के समय वे भाजपा की विधायक थीं। दंगों के बाद फिर चुनाव हुये लगभग 2लाख के अंतर से चुनाव जीती। इतनी भारी भरकम विजय का कारण क्या था?

? एल.एस.हरदेनिया


पर्यटकों पर रोक,

शिकारियों को खुली छूट

          मैं बचपन से ही वन्यजीवों के प्रति काफी उत्सुक रहा हॅू और आज राजनीति में रहते हुये मुझे सिर्फ एक ही जगह से शान्ति और सुकून प्राप्त होता है जब मैं वन्यजीव उद्यान (वाइल्ड लाइफ पार्क)में होता हूॅ। सर्वोच्च न्यायालय का वाइल्ड लाइफ पार्क के कोर एरिया में पर्यटकों के प्रवेश पर रोक लगाने से मुझे आघात पंहुचा है। वन्यजीव अभ्यारण्यों में पर्यटन पर प्रतिबंध से लाखों वन्यजीव पर्यटकों के साथ जंगल में बाघ को देखने से मैं भी वंचित हो जाऊॅंगा।

? दिग्विजय सिंह

(लेखक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव व मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री है।)


हममें से अगला

ईशनिन्दक कौन है ?

         च्चे ईश्वर या खुदा के बारे में क्या जानते हैं ? शायद इतनाही कि उसके नाम पर खड़े किसी प्रार्थनास्थल पर इबादत इसीलिए की जाती है क्योंकि बड़े बुजुर्ग करने के लिए कहते हैं !वरना उसके होने न होने जैसी बहसों से न वह वाकीफ रहते हैं,ना उनकी उसमें दिलचस्पी रहती है। फिर वह उसकी निन्दा कहां से करेंगे ?बहरहाल इतनी छोटीसी बात कानून बनानेवाले नहीं जानते हैं। उनकी किताब में अगर किसी कार्रवाई को दण्डनीय घोषित कर दिया गया हो तो फिर वह खूंखार कुत्तों की तरह आप पर झपट पड़ने के लिए आजाद हैं,फिर आप अल्पवयस्क हों या अवयस्क।

 ?  सुभाष गाताड़े


वस्तुओं की खामियां और असलियत छुपाते हैं विज्ञापन

राजनीति में भी ऐसा होता है

                  तयुग, त्रेतायुग, द्वापर और अब कलयुग के इस वर्तमान दौर पर हावी हो गया है विज्ञापन युग। वस्तुओं का प्रोडक्शन जब होगा तब होगा, किंतु उसकी विशेषताओं और उपयोगिताओं से विज्ञापनों का बहुत पहले से ही प्रचार शुरू हो जाता है। जब तक किसी वस्तु का उपयोग न करो, तब तक तो उसके बारे में चारों तरफ होर्डिंग्स, पोस्टर्स, पम्पलेट और प्रचार के विभिन्न माध्यमों से ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि जिस तरह की वस्तु का वे उत्पादन करने जा रहे हैं, वैसी वस्तु न तो कहीं कमी थी और न ही कभी ऐसी वस्तु का उत्पादन होगा। विज्ञापनों में लांच होने वाली वस्तुओं और उन वस्तुओं की बिक्री के लिए ऐसे ऐसे जुमले कसे जाते हैं जिसको सुनकर उपभोक्ता के मन में उसके प्रति आकर्षण पैदा हो जाता है।

? राजेन्द्र जोशी


गुस्से में कार्यकर्ता , निशाने पर सरकार

      ध्यप्रदेश में पिछले 9 वर्षो से शासन कर रही भाजपा सरकार से अब अपने ही कार्यकर्ता भी नाराज है। यह नाराजी प्रदेश भाजपा अध्यक्ष से लेकर मंत्री,मुख्यमंत्री तक के पुतले जलाये जाने और सडकों चौराहोंपर खुले आम हो रहे विरोध प्रदर्शन से साफ नजर आती र्है। सत्तारूढ दल के प्रभावशाली पदों पर बैठे कुछ नेताओं की मनमानी ,अफसरों के मनमाने आचरण, बढते भ्रष्टाचार को लेकर कार्यकर्ताओं का गुस्सा अपने नेताओं पर फूट पडा हैं।

? अमिताभ पाण्डेय


उ.प्र. सरकार के अंतर्विरोध

      देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार अपने व्यापक अंतर्विरोधों के कारण दिन-ब-दिन न सिर्फ जनता की आकांक्षाओं पर निराशा थोप रही है बल्कि कैबिनेट के शिवपाल यादव व आजम खाँ जैसे कई वरिष्ठ मंत्रियों के उन्मुक्त आचरण की वजह से बार-बार हास्यास्पद स्थिति भी पैदा हो रही है। यह सच है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इससे पूर्व कभी किसी सरकार में नहीं रहे हैं और इस प्रकार अपने पहले अवसर पर ही वह प्रदेश के इस सर्वोच्च प्रशासनिक दायित्व के पद पर आसीन हैं। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर भी अपने लम्बे राजनीतिक जीवन में कभी किसी कैबिनेट में शामिल नहीं हुए थे और सीधे प्रधानमंत्री ही बने थे।

? सुनील अमर


नीतीश और उध्दव के बीच छिड़ी जंग

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का फिर मतलब क्या है?

        राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के दो घटकों के नेताओं के बीच मुंबई में रह रहे बिहारियों को लेकर जो जंग छिड़ी हुई है, वह दुर्भाग्यपूर्ण तो है ही, वह यह सवाल भी खड़ा करता है कि एक गठबंधन के दो घटक क्या आपस में मिलकर इस समस्या को सुलझा नहीं सकते? नीतीश कुमार का जनता दल (यू) और उध्दाव ठाकरे की षिवसेना दोनों एक ही गठबंधन के घटक दल हैं। दोनों एक साथ मिलकर केन्द्र की अटल सरकार के हिस्से रह चुके हैं। यह सच है कि उन दोनों घटकों में आपसी चुनावी तालमेल नहीं होता।

? उपेन्द्र प्रसाद


तीसरे मोर्चे की संभावनाओं के सत्य

       कांग्रेस के कोयले की दलाली में काले हाथ होने और राजग ;एनडीए में फूट की आशंकाओं की संभावनाओं की बीच एक जमाने में पहलवान रहे मुलायम सिंह यादव राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर ताकतवर नेता के रुप में उभरने की कोशिश में हैं। उनकी मंशा है, काश उनके नेतृत्व में मजबूत तीसरे मोर्चे का गठन हो जाए तो वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का अपना स्वप्न साकार कर लें। बीते 15साल से उनके अंतर में यह सपना पल रहा है। भाजपा द्वारा जारी संसदीय गतिरोध ने उन्हें मौके की नजाकत का लाभ उठाने के लिए उकसाया और वे छह मित्र दलों के साथ संसद के बाहर धरने पर बैठकर राजनीतिक हलकों में यह संदेश दे गए कि उन्होंने तीसरे मोर्चे को वजूद में लाने की पहल कर दी है।

    

? प्रमोद भार्गव


बचत खाता आम आदमी का अधिकार बने

        रामभगत पेशे से मजदूर है,उसने अपनी मजदूरी से कुछ रूपये जुटा कर वक्त मौका के लिए पन्नी में लपेट लकड़ी की पेटी में रख दिए थे। कुछ दिनों बाद पेटी खोलने पर उसे अपनी मेहनत की कमाई कतरन के रूप मे मिलती है,क्योंकि चूहों ने रूपयो को कतरन में बदल दिया। बेचारे रामभगत के पास अपनी कमाई को सुरक्षित रखने का एकमात्र साधन लकड़ी की पेटी थी जिसमें चूहों ने आक्रमण कर उसकी कमाई को मिट्टी में मिला दिया। वैसे रामभगत पहले अपनी मजदूरी मालिकों के पास जमा रहने देता था, परन्तु उसमें भी उसे जरूरत पड़ने पर पैसों के लिए मालिकों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था।

? डॉ. सुनील शर्मा


14 सितंबर : हिन्दी दिवस पर विशेष

अंगरेजी कर रही राज है, हमको आती कहां लाज है ?

       जिस दिन भारत स्वतंत्र हुआ, उसी दिन महात्मा गांधी ने कहा था कि 'पूरी दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेजी भूल गया। उन्होंने 'मेरे सपनों का भारत'नामक पुस्तक में लिखा है-''हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित करने में एक दिन भी खोना देश को भारी सांस्कृतिक क्षति पहुंचाना है। जिस तरह हमारी आज़ादी को जबर्दस्ती छीनने वाले अंग्रेजी की सियासती हुकूमत को हमने सफलतापूर्वक इस देश से निकाल दिया,उसी तरह हमारी संस्कृति को दबाने वाली अंग्रेजी भाषा को भी यहां से निकालकर बाहर करना चाहिए।''परन्तु हमारा दुर्भाग्य कि सभी राष्ट्रीय और क्रान्तिकारी आंदोलनों तथा नेताओं की लड़ाई की भाषा तो हिन्दी रही मगर जब देश आज़ाद हुआ तो इसके संविधान में ही ऐसे प्रावधान कर दिए गए कि वह आज तक राजभाषा नहीं बन सकी है।

    

? डॉ. गीता गुप्त


  10 सितम्बर2012

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