संस्करण: 10 सितम्बर-2012

नीतीश और उध्दव के बीच छिड़ी जंग

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का फिर मतलब क्या है?

? उपेन्द्र प्रसाद

               राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के दो घटकों के नेताओं के बीच मुंबई में रह रहे बिहारियों को लेकर जो जंग छिड़ी हुई है, वह दुर्भाग्यपूर्ण तो है ही, वह यह सवाल भी खड़ा करता है कि एक गठबंधन के दो घटक क्या आपस में मिलकर इस समस्या को सुलझा नहीं सकते? नीतीश कुमार का जनता दल (यू) और उध्दाव ठाकरे की षिवसेना दोनों एक ही गठबंधन के घटक दल हैं। दोनों एक साथ मिलकर केन्द्र की अटल सरकार के हिस्से रह चुके हैं। यह सच है कि उन दोनों घटकों में आपसी चुनावी तालमेल नहीं होता। इसका कारण है कि ये दोनों घटक दल एक एक राज्य के क्षेत्रीय दल हैं। जनता दल (यू) का अस्तित्व महाराष्ट्र में नहीं है, तो शिवसेना का वजूद बिहार में नहीं है। फिर भी ये दोनों राजग के घटक दल हैं और समय समय पर राजग की बैठकें भी होती रहती हैं। अटल बिहारी वाजपेयी इसके अध्यक्ष हैं और लालकृष्ण आडवाणी इसके कार्यकारी अधयक्ष। जनता दल (यू)के नेता रद यादव इसके संयोजक हैं।

                 नीतीश द्वारा राज ठाकरे को सिरफिरा कहे जाने के बाद उध्दाव ठाकरे ने बिहार के मुख्यमंत्री पर ही हमला बोल दिया और कह दिया कि यदि महाराष्ट्र में अपराध करके बिहार भागे किसी अपराधी को गिरफ्तार करने के लिए बिहार पुलिस का परमीशन जरूरी है,तो बिहार से आकर मुंबई में रह रहे लोगों को भी महाराष्ट्र सरकार से परमिट लेना चाहिए। जाहिर है उध्दाव ठाकरे का बिहारियों को परमिट देने का यह सुझाव बिहार सरकार के पुलिस परमीशन की मांग के जवाब में था। हालांकि बिहार सरकार ने मुंबई पुलिस के कमिशनर और महाराष्ट्र सरकार को जो चिट्ठी लिखी थी, उसमें नियमों का हवाला दिया गया था।

                 चिट्ठी में कहा गया था कि यह स्थापित नियम है कि यदि किसी राज्य में दूसरे राज्य की पुलिस गिरफ्तारी करती है,तो उसे गिरफ्तारी के बाद वहां की स्थानीय पुलिस को सूचित करना पड़ता है अथवा गिरफ्तारी स्थल के पास की अदालत में गिरफ्तार व्यक्ति को पेश करना पड़ता है। मुंबई की पुलिस ने वैसा नहीं किया। उसने 11 अगस्त को मुंबई में हिंसा फैलानें और अमर जवान स्मृति स्थल को नुकसान पहुंचाने वाले अब्दुल कादिर अंसारी को गिरफ्तार कर सीधो मुंबई का रुख कर लिया।

                 हालांकि आमतौर पर गिरफ्तारी से पहले स्थानीय पुलिस को भी सूचित करने का रिवाज है। इसका कारण यह है कि बाहर से आए हुए पुलिसजनों पर यदि अपराधी भारी पड़ जाएं,तो उन्होंने और भी पुलिस बल की जरूरत पड़ सकती है और वह पुलिस बल स्थानीय पुलिस ही उपलब्ध करा सकती है। इसलिए अपनी सुरक्षा की दृष्टि से भी बाहर से आई पुलिस के हित में यही है कि वह स्थानीय पुलिस को पूर्व जानकारी दे दे और गिरफ्तारी में उसकी सहायता भी ले। परंतु कभी कभी बाहरी पुलिस के पास इतना समय ही नहीं होता है कि स्थानीय पुलिस को सूचित कर सके। खासकर यदि पुलिस अपने राज्य से किसी अपराधी का पीछा करते हुए दूसरे राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाए,तो फिर उस राज्य की पुलिस को सूचित करने और उसकी सहायता लेने के चक्कर में वह अपराधी ही उसके हाथ से निकल सकता है। एक और व्यावहारिक समस्या दूसरे राज्य की पुलिस के सामने आ सकती है। वह समस्या यह है कि यदि अपराधी स्थानीय हो,तो हो सकता है स्थानीय थाने में उसका संपर्क हो। उस संपर्क के द्वारा अपने खिलाफ किसी कार्रवाई की मिली पूर्व सूचना उसे सतर्क कर सकती है और वह बाहरी पुलिस की गिरफ्त से बाहर जा सकते हैं। इसके कारण भी बाहर की पुलिस स्थानीय पुलिस को गिरफ्तारी के पहले सूचित करना उचित नहीं समझती।

              जैसा कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान ने कहा कि जिस अपराधी को मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया, वह बिहार का था ही नहीं, बल्कि जोगेश्वरी मुंबई का था और वह नेपाल भाग रहा था, को यदि हम सच मान लें, तो मुंबई पुलिस को इसके लिए दोष नहीं दे सकते कि उसने गिरफ्तारी के पहले स्थानीय पुलिस को सूचित क्यों नहीं किया। क्योंकि वैसा करने से उस अपराधी के नेपाल भाग जाने का खतरा था और वह खतरा मुंबई पुलिस उठाना नहीं चाहती थी। पर सवाल उठता है कि गिरफ्तारी के बाद मुंबई पुलिस ने स्थानीय पुलिस अधिकारी अथवा अदालत को रिपोर्ट क्यों नहीं किया? जाहिर है, गलती को मुंबई पुलिस से हुई है।

                   इस गलती के बाद बिहार सरकार द्वारा महाराष्ट्र सरकार को मुंबई पुलिस को पत्र लिखना गलत नहीं था, लेकिन पत्र लिखने का तरीका जरूर गलत था। पत्र में उठाई गई आपत्ति गलत नहीं थी, लेकिन उसमें दी गई धामकी गलत थी। गौरतलब है कि बिहार सरकार के मुख्य सचिव ने धमकी दी थी उनकी सरकार अब्दुल कादिर अंसारी के अपहरण का मुकदमा तक मुंबई पुलिस पर चला सकती है। यह धमकी गैर जरूरी ही नहीं, बल्कि गैरजिम्मेदाराना और भड़काने वाली थी। मुंबई पुलिस ने एक ऐसे अपराधाी को गिरफ्तार किया था, जो पुलिस और मीडिया पर हमला कर देष भर में दंगा फैलाने की साजिष करने वाले लोगों में शामिल था। उसका चेहरा टीवी चैनलों पर आ गया था और अखबार में भी जिसकी तस्वीरें छप चुकी थीं। ऐसे अपराधी को गिरफ्तार करने वाले पुलिस कर्मियों को अपहरण का मुकदमा चलाने की धमकी देना बहुत ही आपत्तिजनक था।

                 और इसके कारण ही राज ठाकरे को मुंबई में रह रहे बिहारियों पर हमला करने का मौका मिला। राज ठाकरे को षायद लगा होगा कि जिस कादिर अंसारी को मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया था, वह बिहार का था, लेकिन बाद में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के बयान से साफ हुआ कि वह महराष्ट्र का ही था और वह नेपाल भागने की कोशिश में बिहार नेपाल की सीमा पर था, जहां से मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर वोटों के लिए गंदी राजनीति करने का भी आरोप लगाया। उनके कहने का आशय यह था कि अब्दुल कादिर अंसारी की गिरफ्तारी पर हल्ला कर बिहार के मुख्यमंत्री मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं, जो कि गंदी राजनीति है।

                 वह तो हुई महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का नीतीश पर हमला, पर राजग की सहयोगी शिवसेना के कार्यकारी अधयक्ष उध्दाव ठाकरे ने बिहार के मुख्यमंत्री पर जो हमला किया, उसकी शायद कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि दोनों नेता राजग के हिस्से हैं। नीतीश के प्रवक्ता कह रहे हैं कि उनके दल का शिवसेना से कभी कोई मतलब नहीं रहा है और न ही कभी कोई मतलब रहेगा, लेकिन वे भूल जाते हैं कि दोनों कभी एक साथ ही सरकार में थे और आज भी एक विपक्षी गठबंधन के हिस्से हैं। यदि दोनों राजग के हिस्से होते हुए भी एक साथ नहीं हैं, तो फिर वे दोनों मिलकर राजग के भंग हो जाने की घोशणा क्यों नहीं कर देते?     


? उपेन्द्र प्रसाद