संस्करण: 10 सितम्बर-2012

वस्तुओं की खामियां और असलियत छुपाते हैं विज्ञापन

राजनीति में भी ऐसा होता है

? राजेन्द्र जोशी

                तयुग, त्रेतायुग, द्वापर और अब कलयुग के इस वर्तमान दौर पर हावी हो गया है विज्ञापन युग। वस्तुओं का प्रोडक्शन जब होगा तब होगा, किंतु उसकी विशेषताओं और उपयोगिताओं से विज्ञापनों का बहुत पहले से ही प्रचार शुरू हो जाता है। जब तक किसी वस्तु का उपयोग न करो, तब तक तो उसके बारे में चारों तरफ होर्डिंग्स, पोस्टर्स, पम्पलेट और प्रचार के विभिन्न माध्यमों से ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि जिस तरह की वस्तु का वे उत्पादन करने जा रहे हैं, वैसी वस्तु न तो कहीं कमी थी और न ही कभी ऐसी वस्तु का उत्पादन होगा। विज्ञापनों में लांच होने वाली वस्तुओं और उन वस्तुओं की बिक्री के लिए ऐसे ऐसे जुमले कसे जाते हैं जिसको सुनकर उपभोक्ता के मन में उसके प्रति आकर्षण पैदा हो जाता है। स्वाभाविक है व्यक्ति मजबूर हो जाता ऐसी वस्तु का उपयोग करने के लिए।

                  चड्डी, बनियान, तेल, साबुन से लेकर दवा-दारू तक के विज्ञापनों की बाढ़ में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पूरी तरह डूबे-डूबे नजर आ रहे हैं। विज्ञापन डिजाइन करने, उसकी विषय वस्तु बनाने और उसको जनता के सामने पेश करने की भी पैतरेबाजी होती है। विज्ञापन कला में निपुण होने वाले व्यक्ति का इस दौर में बाजार गरम रहता है। हर व्यक्ति की अपनी दिनचर्या होती है, जिसमें सुबह बिस्तर छोड़ने के बाद और रात में बिस्तर पकड़ने के पहले तक वह जिस तरह की वस्तुओं की उपयोगिता से गुजरता है, उन उपयोगिताओं पर विज्ञापन युग में उत्पादनकर्ताओं की नज़र जाती है। टूथपेस्ट और ब्रश से शुरू हुआ दिन बेड टी, स्नान-ध्यान से गुजरता हुआ नाश्ता, भोजन के बाद जैसे ही आदमी घर से बाहर निकलता है उसे यातायात की जरूरत पड़ती है। इन सब वस्तुओं के विज्ञापन इस कदम छाये हुए है कि यदि आप विज्ञापन के मुताबिक वस्तु का उपयोग नहीं करते हैं, तो आप पीछे रह जायेंगे। एक बनियान के विज्ञापन ने तो सड़क से गुजरते हुए एक ट्रांसपोर्ट मंत्री तक को राह में फेंक दिया। मंत्री एतराज करते हैं तो ट्रेफिक मेन कहता है-आगे वहीं रहता है जो फलां कम्पनी की बनियान पहनता है। मतलब यह कि जिस कम्पनी का विज्ञापन है उसे ही आप पहनिए तो आप मंत्रीजी से भी ज्यादा सम्मानित माने जायेंगे। प्रश्न यह उठता है कि जो जो लोग उस कम्पनी की बनियान पहनते हैं, क्या उससे बेहतर और कोई बनियान नहीं हैं। आपको ऐसे बहुत लोग मिल जायेंगे जिनकी वे बनियान ज्यादा दिन तक चलती हैं बनिस्बत उस बनियान की कम्पनी से जिसका विज्ञापन हो रहा है और जिसके न पहनने से ट्रांसपोर्ट मंत्री को भी पीछे धाकेल दिया जाता है।

                अक्सर कई लोगों के मुंह से यह सुनने को मिलता रहता है कि विज्ञापन पढ़कर, देखकर या सुनकर फला वस्तु अजमाई परंतु वह बाद में सड़ी निकल गई। यह सही भी है कि जोर-जोर से आवाज निकालकर बेचने वाले की सड़ी सब्जी भी बिक जाती है किंतु जो दूकानदार बिना आवाज लगाये ठेले पर सब्जी बेचने बैठते हैं, वे बैठे ही रहते हैं। लोग आकर्षित नहीं हो पाते हैं। विज्ञापन के माध्यम से वस्तुओं की मार्केटिंग का नाम ही व्यावसायिकता है किंतु वर्तमान दौर में व्यवसाय की तरह कोई ऐसा क्षेत्र नहीं बचा है जो विज्ञापन की बीमारी से दूर हैं।

                 समाजसेवा, राजनीति धर्म और प्रशासन संचालन जैसे क्षेत्र भी विज्ञापन के माध्यम से अपनी पहचान मजबूत करने की प्रतिस्पर्धा में लग गये हैं। आखिर इन सभी क्षेत्रों की यह मजबूरी बन गई है कि जब तक वे मीडिया का सहारा नहीं लेंगे तब तक उनकी गतिविधियों और उपलब्धियों से जनता अवगत नहीं हो पायगी। प्रत्येक उपभोक्ता वस्तुओं की तरह सामाजिक और राजनैतिक प्रणालियां भी अपनी अपनी कुशलता दक्षता और क्षमता के बढ़-चढ़ विज्ञापनों के प्रचार-प्रसार में पीछे नहीं रहना चाहती है।

                  धार्मिक क्षेत्र अब तक तो धर्म आध्यात्क और योग-साधना जैसे विषयों का प्रचार करते हुए भावनात्मकता का माहौल बनाते आ रहे थे, किंतु अब अपने अपने संस्थानों आश्रमों और पवित्र स्थलों के प्रचार के नाम पर मार्केटिंग पर उतरते देखे जा सकते हैं। देश के भावना प्रधान लोग भक्ति भाव से ऐसे संस्थानों और आश्रमों के विज्ञापों से भ्रमित हो जाते हैं और उनसे जुड़ जाते हैं, किंतु जब इन स्थलों के सत्य, असलियत और खामियों को पास से देखते हैं तो स्वाभाविक तौर पर ऐसे स्थलों और उनकी कार्यप्रणालियों को एकदम विपरीत पाते हैं। धर्म के साथ-साथ समाजसेवा जैसे कार्यों को भी विज्ञापनों की प्रतिस्पर्धाओं ने एकदम अरूचिकर बना दिया है। समाजसेवा के नाम पर प्रचारों के जरिए प्रारंभिक दौर में समाजसेवक और उनके संस्थानों की छवियां जिस रूप में उठाई जाती हैं, वे ज्यादा  दिनों तक टिक नहीं पाती है। ऐसे अनेक उदाहरणों से समाजसेवा का क्षेत्र भरा पड़ा है जिनसे यह खुलकर सामने आ जाता है कि यह क्षेत्र भी प्रचार की भूख से क्षुधित रहता है।

               इस दौर में यदि किसी क्षेत्र में खतरनाक स्थिति बनी है तो वह है राजनीति क्षेत्र की। विज्ञापनों पर भरोसा करके जिस तरह खरीदी गई कई उपभोक्ता वस्तुओं के साथ कई बार होता है कि वह सड़ी गली निकल जाती है, ठीक उसी तरह राजनीति क्षेत्र में बजने वाले ढोल ढमाके भी उसी तरह बेसुरे निकल जाते हैं। कुल मिलाकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि राजनीति केवल होर्डिंग्स, पोस्टर, नारों और विज्ञापनों के इसी तरह के माध्यमों से चमकाई जाने लगी है। विज्ञापनों में होता कुछ है और जमीनी हकीकतों में कुछ और। विज्ञापन दाता जिस भाषा और जिस स्वरूप में कामा-फुलिस्टॉप लगाकर अपनी विषय वस्तु की मार्केटिंग का ड्रॉफ्ट भेजता है हूबहू वहीं का वहीं मीडिया में उतरकर उपभोक्ताओं के सामने आता है। घर में ही खुद ने विज्ञापन का ड्राफ्ट बना लिया, मीडिया में जगह खरीद ली और उस जगह पर अपनी वाहवाही की इमारत खड़ी कर दी जाती है। विज्ञापन की उस बुलंद इमारत के बारे में केवल मीडिया में ही पढ़ा जा सकता है किंतु इमारत के नक्शे पर से जमीन की हकीकत का कोई वास्ता नहीं होता। हवा ही हवा में विज्ञापनों द्वारा बनाई गयी अनेक शख्सियतों की छवि ऐसे निखरकर सामने आती है जैसे उनकी शख्सियत जनसेवा के लिए ही है किंतु उनकी असलियत और उनके जीवन के सच पर नज़र डाली जाय तो लगता है कि यह तो विज्ञापन की फिरत का ही कमाल है, जो उन्हें राजनीति-जगत में सर्वश्रेष्ठ बनाये हुए है।

                विज्ञापनों की चकाचौंध देशभर में छाई हुई है। ऐसे में यह संदेश ज्यादा मौजूं हैं ''कहनी है एक बात हमें, इस देश के पहरेदारों से, सम्हल के रहना अपने घर में, इन झूठे विज्ञापन से''

   ? राजेन्द्र जोशी