संस्करण: 10 सितम्बर-2012

हममें से अगला

ईशनिन्दक कौन है ?

?  सुभाष गाताड़े

                च्चे ईश्वर या खुदा के बारे में क्या जानते हैं ? शायद इतनाही कि उसके नाम पर खड़े किसी प्रार्थनास्थल पर इबादत इसीलिए की जाती है क्योंकि बड़े बुजुर्ग करने के लिए कहते हैं !वरना उसके होने न होने जैसी बहसों से न वह वाकीफ रहते हैं,ना उनकी उसमें दिलचस्पी रहती है। फिर वह उसकी निन्दा कहां से करेंगे ?बहरहाल इतनी छोटीसी बात कानून बनानेवाले नहीं जानते हैं। उनकी किताब में अगर किसी कार्रवाई को दण्डनीय घोषित कर दिया गया हो तो फिर वह खूंखार कुत्तों की तरह आप पर झपट पड़ने के लिए आजाद हैं,फिर आप अल्पवयस्क हों या अवयस्क।

                  ग्यारह साल की रिमशा मसीह, जिसकी भोलीभाली तस्वीर देख कर आप को अपने किसी नन्हे आत्मीय की याद आ सकती है, अभी भी इसी 'अपराध' के लिए जेल की सलाखों के पीछे है, जिसके बारे में वह कुछ जानती भी नहीं है और हक़ीकत में भी उसने वह किया ही नहीं है। आधिकारिक तौर पर यही कहा जा रहा है कि वकीलों की हड़ताल के चलते अदालत में उसका मामला पेश नहीं हो सका। वैसे बीते शनिवार को ही यह बात साफ हुई थी कि इस्लामाबाद की एक गरीब बस्ती मेहराबाद की निवासी उसकी इस दशा के लिए उसके इलाके का वह धर्मगुरू - मौलाना खालिद जादों ही जिम्मेदार है,जो ईसाइयों से नफरत करता है और उसी ने कुराण के चन्द फटे पन्ने उसके हाथ में रखे थे और शोर मचा दिया था कि किस तरह उसने ईशनिन्दा का 'अपराध' किया है।

                बहरहाल देखते ही देखते जूनूनियों की भीड़ ईसाइयों की उस बस्ती में इकट्ठा हुई थी, जिन्होंने हिंसा को अंजाम देना शुरू किया था,मजबूरन लोगों को जान बचाने के लिए वहां से भागना पड़ा था। बाद में मामले की जब जांच शुरू हुई तब यह तथ्य उजागर हुआ कि कुराण के फटे पन्ने उनके घर के सामने बनी मस्जिद के मौलाना ने ही रखवाए थे।

                मालूम हो कि पाकिस्तान के अन्दर अस्सी के दशक में जिया उल हक की हुकूमत के दौरान 'ईशनिन्दा' को लेकर बने कानून के बाद आलम यही है कि अदालतों ने भले अभियुक्त को इसके लिए बरी किया हो,मगर बाद में अतिवादियों ने ऐसे निरपराधों को मार डाला है। कुछ समय पहले इस्लामिक कट्टरपंथियों ने एक न्यायाधीश को इसीलिए खतम किया था कि ईशनिन्दा को लेकर किसी पर चलाए गए मुकदमे में उसने उस शख्स को बरी किया था जिस पर उसके दुश्मनों ने ईशनिन्दा का मुकदमा दायर किया था। विगत दो साल के अन्दर पाकिस्तान ने अपने दो वरिष्ठ नेताओं -पंजाब के गवर्नर रहे सलमान तासीर एवं फेडरल मंत्री शाहबाज भट्टी -को खोया है क्योंकि इस कानून को समाप्त करने की उन्होंने हिमायत की थी।

                वैसे पाकिस्तान के न्यायिक इतिहास में नब्बे के दशक की शुरूआत में गुल मसीह नामक किन्नर का मामला वह पहला मामला रहा है जिसमें अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय से जुड़े एक व्यक्ति को इसी 'अपराध'के लिए अदालत ने मौत की सज़ा सुनायी थी। दिलचस्प था कि जिला सरगोधा के चक 46 शुमाली का निवासी गुल मसीह के खिलाफ जिन भी गवाहों को खड़ा किया गया था उन्होंने अदालत के सामने कसम खाकर कहा था कि गुल मसीह ने न पैगम्बर मोहम्मद और न ही उनकी पत्नी के खिलाफ कोई अपमानजनक/ईशनिन्दक वक्तव्य दिए हों।

                इसके बावजूद न्यायाधीश ने गुल मसीह को दोषी ठहरानेवाले अपने फैसले में कहा '' मेरी नज़र में अभियोजन पक्ष अभियुक्त का अपराध प्रमाणित करने में कामयाब हुआ है और ..इसलिए यह अदालत अभियुक्त को दोषी करार देती है और मौत की सज़ा सुनाती है।''गुल मसीह के पड़ोसी सज्जाद हुसैन -जिसने गुल पर यह फर्जी मुकदमा दर्ज किया था और जिसके सिपह ए साहबा नामक सुन्नी अतिवादी संगठन से ताल्लुकात थे -का उल्लेख करते हुए फैसले में आगे जोड़ा गया था कि ''चूंकि सज्जाद हुसैन 21 साल का नौजवान है, बी ए का छात्रा है, और दाढ़ी रखनेवाला सच्चा मुसलमान है, मुझे कोई वजह नहीं दिखती कि उस पर यकीन न करूं।'' हयूमन राइटस कमीशन आफ पाकिस्तान की चर्चित वकील अस्मां जहांगीर ने गुल मसीह को सुनायी गयी सज़ा के खिलाफ अपील डाली थी, मगर लम्बे समय तक कोई सुनवाई नहीं हो सकी क्योंकि जबभी अदालत में तारीख तय होती,सिपह ए साहिबा के कार्यकर्ताओं का हुजूम अदालत पहुंच कर कार्रवाई बाधित करता।

               पाकिस्तान के चर्चित उपन्यासकार मोहम्मद हानिफ, ने इस मसले पर 'गार्डियन' अख़बार में लिखे अपने आलेख में (6सितम्बर 2012)उन प्रसंगों की चर्चा की है कि किस तरह आप ईशनिन्दक करार दिए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी प्लास्टिक बैग में राख को रख कर कूडेदान की तरफ जाना, जैसा कि रिमा मसीह के मामले में हुआ है ; पानी के पम्प पर वैवाहिक अधिकारों को लेकर किसी समानधर्म के पड़ोसी से बातचीत शुरू करना, जैसा कि चकवल के एक स्कूल अध्यापक के साथ हुआ कि पड़ोसी से बातचीत बहस में तब्दील हुई और दस माह से वह शख्स अभी जेल में है ; अपने स्पेलिंग पर ध्यान न देना, पिछले साल इम्तिहान के पेपर की जांच करते हुए अध्यापक ने उत्तरपत्रिकाओं में ईशनिन्दक सामग्री होने की बात कही और पुलिस बुला ली,बाद में पता चला कि स्पेलिंग की गड़बड़ी थी ;विजिटिंग कार्ड जमीन पर फेंक देना, हैद्राबाद के एक डाक्टर ने दवा कम्पनी के सेल्समैन के प्रति गुस्से का इजहार करते हुए उसका कार्ड फेंक दिया था जिस पर उसका नाम मोहम्मद लिखा था। उसने पुलिस में ईशनिन्दा की शिकायत की। किसी भी सभ्य व्यक्ति को हास्यास्पद लगनेवाले ऐसे कई अन्य प्रसंगों की चर्चा वह करते हैं। जिसमें एक पाकिस्तान की उदितमान लेखिका का भी जिक्र है जिसने एक उपन्यास लिखना चाहा जिसका शीर्षक ही था 'ब्लासफेमी अर्थात ईशनिन्दा'और इसी ख़बर को लेकर अतिवादियों ने उसका जीना हराम कर दिया। मोहम्मद हनीफ बड़े दुख के साथ लिखते हैं कि 'अब वह महिला कुछभी नहीं लिखती।'

                 अगर हम इक्कीसवीं सदी में विभिन्न मुस्लिम बहुल देशों में ईशनिन्दा को परिभाषित करते हुए 'अपराधों' की सूची तैयार करेंगे तो उससे किसीभी सन्तुलित एवम तार्किक व्यक्ति को हंसी आए बिना नहीं रह सकती। उदाहरण के लिए कुछ देशों में संगीत सुनना, शराब का नशा करना, एक ऐसे कमरे में दूसरे यौन के लोगों के साथ होना जो आप के खून से जुड़े रिश्तेदार न हों, दूसरे धर्मों के महोत्सवों में सहभागिता करना आदि को धर्म के मुताबिक प्रतिबध्द व्यवहारों में शुमार किया गया है।

                सवाल यह उठता है कि रिमशा मसीह, गुल मसीह जैसों को ईशनिन्दा कानून के तहत झेलनी पड़ी प्रताडनाओं के बारे में हमें क्यों बेहद चिन्तित होना चाहिए ?  दरअसल 21 वीं सदी में निश्चित ही ऐसे कानूनों की कोई उपयोगिता नहीं है, जहां समाजों के संचालन के लिए हर मुल्क ने अपने संविधानों का निर्माण किया है। हां, एक तरह से ऐसे कदमों की मौजूदगी सत्ताधारी जमातों एवम मौलानाओं के बीच के अपवित्र गठबन्धन को नयी मजबूती अवश्य दिलाती है। इसके चलते अलग अलग धार्मिक समुदायों में आपस में भी टकराव की नौबत आती दिखती है। जाहिर है दुनिया भर के तर्कवादियों एवम अन्य न्यायप्रिय लोगों को इस बात को लेकर मुहिम चलानी चाहिए कि हर देश के संविधान से ईशनिन्दा प्रावधान को हटा दिया जाए।

               हमारी चिन्ता इस वजह से भी होनी चाहिए कि सेक्युलर कहलानेवाले इस मुल्क में कब आस्था, नस्लीयता के नाम पर समुदायवादी ताकतें किसी कोने में हावी हो जाएं और अपनी अपनी धर्मसंसदों से फैसला सुनाने लग जाएं, कहा नहीं जा सकता। और जिस किस्म की प्रतियोगितात्मक साम्प्रदायिकता व्याप्त है फिर अगर एक समुदाय में मामला शुरू हो जाए तो उसे दूसरे समुदाय में फैलने से रोका नहीं जा सकता। सूबा कश्मीर इसकी एक नज़ीर पेश करता है जहां इस्लामी रवायतों के कड़ाई से लागू होने के बारे में इस्लामिक धर्मसंसद के फैसले की जानकारी दी गयी थी। एक अग्रणी अख़बार में छपे समाचार के मुताबिक हुर्रियत के उदारवादी गुट के नेता मीरवाइज फारूक की अगुआई में कश्मीर के तमाम इस्लामिक संगठनों के नेताओं, मौलवियों की बैठक 'मुत्ताहिदा मजलिस ए उलेमा' के बैनर तले हुई, जिसमें सूबा कश्मीर में ईसाई मिशनरियों और अन्य गैरइस्लामिक ताकतों से निपटने के लिए 'तहफुज ए इस्लाम' नामक संगठन का गठन किया गया।

               मालूम हो कि 'स्वधर्मत्याग' (apostasy) रोकने के लिए बनी प्रस्तुत मजलिस की तरफ से तमाम ईसाई स्कूलों को यह फरमान भी जारी किया गया है कि वह अपने यहां सुबह की प्रार्थना बन्द करें और ऐसा कोई साहित्य वितरित न करें जो इस्लामिक शिक्षाओं एवं सिध्दान्तों के खिलाफ हो। इतनाही नहीं मजलिस ने यह फरमान भी जारी किया है कि आइन्दा नमाज़ ए जुम्मा के दिन अर्थात शुक्रवार को छुटटी होगी और उस दिन कोई परीक्षा भी आयोजित नहीं होगी।

? सुभाष गाताड़े