संस्करण: 10 सितम्बर-2012

पर्यटकों पर रोक,

शिकारियों को खुली छूट

? दिग्विजय सिंह

                मैं बचपन से ही वन्यजीवों के प्रति काफी उत्सुक रहा हॅू और आज राजनीति में रहते हुये मुझे सिर्फ एक ही जगह से शान्ति और सुकून प्राप्त होता है जब मैं वन्यजीव उद्यान (वाइल्ड लाइफ पार्क)में होता हूॅ। सर्वोच्च न्यायालय का वाइल्ड लाइफ पार्क के कोर एरिया में पर्यटकों के प्रवेश पर रोक लगाने से मुझे आघात पंहुचा है। वन्यजीव अभ्यारण्यों में पर्यटन पर प्रतिबंध से लाखों वन्यजीव पर्यटकों के साथ जंगल में बाघ को देखने से मैं भी वंचित हो जाऊॅंगा।

               काजीरंगा, कान्हा, बॉधावगढ, रणथंबोर, पेंच, बाँदीपुर, कारबेट, गिर और अब तड़ोबा देश में वन्य जीवन पर्यटन हेतु सर्वाधिक लोकप्रिय पार्क है। बाघों की गणना से यह सिध्द हो गया है कि इन सर्वाधिक पर्यटन वाले पार्कों में बाघों की संख्या 25 प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी है।

               सारिस्का और रणथंबोर पार्क का उदाहरण लेते है, जो दोनों एक ही क्षेत्र में है। रणथंबोर जो पर्यटकों में बहुत अधिक लोकप्रिय है वहाँ बाघों की संख्या बढ़ी है जबकि सरिस्का अवैध शिकार हेतु प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र बन गय है जिसमें कभी-कभी तो शिकारियों को वन अधिकारियों का भी सहयोग प्राप्त होता है। परिणामस्वरूप वहाँ बाघों की संख्या घटकर शून्य हो गई है।

              उपरोक्त उल्लेखित सभी पार्क कोर एरिया है और इनमें से कुछ में बफर एरिया है जिसमें वन्य जीव नही है। अधिकांश बफर एरिया में गाँव है और खनन फेक्ट्रियाँ है  जिन्हें विकसित होने में बरसों लगेंगे। गॉवों को विस्थापित करके वहाँ के लोगों को अन्यत्र बसाना भी कोई आसान काम नही है।

               भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून द्वारा किया गया अध्ययन बताता है कि टाइगर रिजर्व या संरक्षित क्षेत्र पर पर्यटन का कोई प्रतिकूल प्रभाव नही पड़ता है। यह अध्ययन जनवरी-अप्रेल 2012 के मधय हुआ जो पेंच नेशनल पार्क में किया गया था। पर्यावरण और वन विषय के संविधान की समवर्ती सूची में होने के कारण इसके अधकार राज्यों के पास है जिनसे इस संबन्ध में दिशानिर्देश तय करते समय परामर्श नही लिया गया था। संरक्षित क्षेत्रों और राष्ट्रीय उद्यानों की समस्त भूमि राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है न कि भारत सरकार के।

                भारत में ईको टूरिज्म के लिये गाइडलाइन को भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा पहले सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया गया जिसे न तो राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड द्वारा अनुमोदित किया गया और न ही उस पर चर्चा की गई। और न ही उसे नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी की समूची कार्यकारिणी द्वारा अनुमोदित किया गया।

                भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के अनुसार पार्क में पर्यटन की अनुमति देने अथवा मना करने का अधिकार संबन्धित राज्य के मुख्य वन्यजीव संरक्षक का है।

               राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एन.टी.सी.ए.) के दिशानिर्देशों का पैरा-2 राज्यों को इन दिशानिर्देशों का समावेश करते हुये नियमों को संशोधित करने की बात कहता है। एक संघीय ढॉचे में राज्यों के संवैधानिक अधिकारों को छीना नही जा सकता तथा राज्य भी संसद द्वारा पारित वन्य जीव अधिनियम के प्रावधानों को दरकिनार नही कर सकते।

               वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के निम्नलिखित अनुच्छेद इस मामले में राज्य की सर्वोच्चता को स्थापित करते है जिनका यहॉ उल्लेख करना प्रासंगिक है।

               सेक्शन 4(2) : ''इस एक्ट के द्वारा या इसके अंतर्गत मुख्य वन्यजीव संरक्षक अपने कर्तव्य का पालन और अधिकारों का उपयोग करते समय ऐसे सामान्य या विशेष निर्देंशों के पालन हेतु उत्तरदायी होंगे जो उन्हे राज्य सरकारें समय-समय पर देगी।''

               सेक्शन 28(1): ''मुख्य वन्यजीव संरक्षक किसी भी व्यक्ति को आवेदन पत्र प्रस्तुत करने पर अभ्यारण्य में प्रवेश देने या वहॉ रहने की अनुमति निम्नलिखित कारणों से या किसी भी एक कारण से दे सकता है । जैसे -(1) वन्य जीवों पर अनुसंधान या अधययन जो वन्यजीवों के संरक्षण या विकास में सहायक हों। (2) फोटोग्राफी हेतु (3) वैज्ञानिक अनुसंधान हेतु (4) पर्यटन हेतु (5) अन्यारण्य में निवास करने वाले व्यक्ति के साथ वैध व्यवसाय हेतु।

              सेक्शन 35(8): ''सेक्शन 27 और 28 के प्रावधानों को जिस प्रकार अभ्यारण्यों के लिये लागू किया जाता है वैसे ही नेशनल पार्क के लिये भी किया जा सकता है।''

               क्या मान. सर्वोच्च न्यायालय वहाँ के भागीदारों से विमर्श किये बगैर कुछ लोगों द्वारा मनमौजी, अतार्किक और तानाशाहीपूर्ण तरीके से बनाई गई गाइडलाइन के आधार पर वन्य जीव अधिनियम के प्रावधानों के विरूध्द आदेश देगा और राज्य सरकारों के मूलभूत अधिकारों का अतिक्रमण करेगा?

               उक्त गाइडलाइन देश में लगभग 650 संरक्षित क्षेत्रों में राष्ट्रीय उद्यानों और अभ्यारण्यों से जुड़े हुये लोगों के अतिरिक्त दो लाख से अधिक लोगों के रोजगार को प्रत्यक्ष तौर पर तथा दस लाख लोगों की जीविका को अप्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित करती है। इस क्षेत्र में जो कर्मचारी काम करते है उनमें से अधिकांश स्थानीय समुदाय के लोग है जिनमें अधिकतर आदिवासियों सहित ऐसे लोग है जिन्हे इन नेशनल पार्कों के निर्माण के समय विस्थापित किया गया था।

               ईकोटूरिज्म एक मात्र निरंतर व कभी  समाप्त न होने वाला उद्योग है व उन लोगों के लिये उपलब्ध है जो संरक्षित क्षेत्रों के आसपास बसे हुये है। ईकोटूरिज्म संरक्षण की लागत को कम कर सकता है जिसे प्राथमिक तौर पर इन समुदायों द्वारा जन्म दिया गया है।

                मैंने एक आदिवासी युवक को देखा जिसकी जीविका कान्हा में पर्यटन पर निर्भर थी। वह एक न्यूज चैनल से कह रहा था कि यदि उसकी जीविका छीन ली जाती है तो उसके पास जंगल से पेड़ों को काटने और बाघों को मारने अथवा नक्सली बनने के अतिरिक्त अन्य कोई चारा नही होगा।

               अफ्रीकन वाइल्ड लाईफ पर्यटन का उदाहण लेते है जो अनेक अफ्रीकी देशों की जी.डी.पी. का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह सिध्द करने के लिये अनुभवजन्य प्रमाण उपलब्ध है कि रवाण्डा के समाप्ति की कगार पर पंहुच चुके गोरिल्ला को सिर्फ इसलिये बचाया जा सका क्योंकि स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पर्यटन का सकारात्मक प्रभाव था।

                मैं केन्द्रीय पर्यटन मंत्रालय की प्रतिक्रिया से अचंभित हूॅ कि वह इस गाइडलाइन का भारतीय पर्यटन उद्योग पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव से पूर्णतया अनभिज्ञ है।

                मुझे बताया गया है कि इन दिशानिर्देशों को बनाने वाले व्यक्ति एन.टी.सी.ए. के राजेश गोपाल है जिन्हे मैं 1992 से जानता हूॅ जब वे कान्हा नेशनल पार्क के डायरेक्टर थे और वे वहाँ काफी लंबे समय तक रहे। उन्होने मेरे साथ भी कुछ दिन बिताये जब मैं मधयप्रदेश का मुख्यमंत्री था और वे मुझे कान्हा के आसपास घुमाने ले गये थे। उन्होने वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी के मेरे शोक को पूरा करने में सहायता की और इस संबन्ध में मुझसे चर्चा की कि हम कान्हा में किस प्रकार पर्यटन को बढ़ावा दे सकते है। मैंने उन्हे डायरेक्टर प्रोजेक्ट टाइगर बनाने के लिये जोरदार अनुशंसा की थी जहॉ वे राज्य सेवा के अधिकारी होने के बावजूद भी 10 वर्षों से निरंतर बने हुये है। वन्यजीवों के प्रति उनके प्रेम का मैं बहुत सम्मान करता हूॅ किन्तु मुझे यह समझ में नही आ रहा है कि उन्होने ऐसी गाइडलाइन क्यों बनाई जो न सिर्फ वाइल्डलाइफ पर्यटन को बल्कि हमारे राष्ट्रीय उद्यानों के कोर एरिया में वन्यजीवों और जंगलों को भी समाप्त कर देगी।

                एक सशक्त पर्यटन उद्योग जिसका वन्यजीवों और वनों में निहित स्वार्थ है, के अभाव में वैसा ही होगा जैसा सरिस्का में हुआ। जैसे ही पर्यटन बंद होगा, निचले अधिकारियों के सहयोग से वहॉ वन्य जीवों का अवैध शिकार करने वाले शिकारी सक्रिय हो जावेगे।

               मुझे पूरा विश्वास है कि पर्यावरण एवं मंत्रालय, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एन.टी.सी.ए.) और सर्वोच्च न्यायालय का ऐसा लक्ष्य नही है। मैं सर्वोच्च न्यायालय और पर्यावरण तथा वन मंत्रालय से करबध्द अपील करता हूॅ कि वे वाइल्डलाइफ पर्यटन पर पूर्ण प्रतिबंधा लगाये जाने के निर्णय पर पुनर्विचार करें।

? दिग्विजय सिंह

(लेखक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव व मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री है।)