संस्करण: 10 सितम्बर-2012

नरोदा पाटिया निर्णय मोदी और संघ परिवार के गाल पर करारा तमाचा

? एल.एस.हरदेनिया

                हमदाबाद के नरोदा पाटिया में 28 फरवरी, 2002 को 95 लोग मारे गये थे। जिन्होंने यह जघन्य हत्याकांड़ किया था उनमें भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के सक्रिय कार्यकर्ता शामिल थे। शायद हमारे देश के इतिहास में पहली बार एक महिला ने न सिर्फ दंगे में भाग लिया वरन् हजारों के भीड़ में शामिल लोगों को हथियार बांटे,उन्हें मुसलमानों को चुन-चुन कर मारने के लिये उकसाया। इस महिला का नाम मायाबेन कोडनानी है। दंगे के समय वे भाजपा की विधायक थीं। दंगों के बाद फिर चुनाव हुये लगभग 2लाख के अंतर से चुनाव जीती। इतनी भारी भरकम विजय का कारण क्या था?क्या उनके क्षेत्र के मतदाता वहशियत की हद तक साम्प्रदायिक हो गये थे। क्या उन्होंने मायाबेन को इसलिए भारी बहुमत से जिताया क्योंकि उन्होंने एक क्रूरतम जघन्य हत्याकांड़ में भाग लिया था। उस दिन न सिर्फ पुरूष व महिलाएं मारी गईं वरन् महिलाओं के साथ मायाबेन की उपस्थिति में बलात्कार हुआ। एक गर्भवती महिला का पेट फाड़ा गया,पेट में पल रहे बच्चे को तलवार की नोंक से उठाया गया उसके बाद उसके साथ बलात्कार किया गया और फिर उसे आग के हवाले कर दिया गया। माया के नेतृत्व में हुये इस सामूहिक हत्याकांड़ के लिये उन्हें पुरस्कृत किया गया। नरेन्द्र मोदी ने उन्हें अपनी मंत्री परिषद में शामिल किया। माया बेन डाक्टर है, वे स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं। यह सोचने की बात है कि क्या एक डाक्टर, वह भी स्त्री रोग विशेषज्ञ इतनी क्रूर हो सकती है।

              हत्याकांड में एक और गुजरात का जाना-माना चेहरा शामिल था। उसका नाम है बाबू बजरंगी। वे गर्व से ताल ठोककर कहते हैं कि ''मैं हॅू बाबू बजरंगी''। बाबू नरोदा पाटिया हत्याकांड का प्रमुखतम आरोपी है। वह विश्व हिन्दू परिषद का सक्रिय कार्यकर्ता था। सन् 2007में उसने विश्व हिन्दू परिषद से वैचारिक मतभेद के चलते त्यागपत्र दे दिया। फिर वह शिवसेना में शामिल हो गया। परंतु वहां भी ज्यादा दिन नहीं टिका। बाबू बजरंगी ने ''तहलका''से बातचीत में स्वयं स्वीकार किया था कि वह इस जघन्य हत्याकांड़ में शामिल था। बजरंगी ने बड़े गर्व से बताया कि उसने एक गर्भवती महिला का पेट फाड़कर गर्भस्थ बच्चे को मारा, उसके बाद उस महिला के साथ बलात्कार किया, उसके बाद उसे आग के हवाले कर दिया।  

              बाबू बजरंगी के अनेक धंध हैं। वह एक संस्था का मुखिया है जिसका मुख्य काम अन्तर धार्मिक और अन्तर जातीय विवाहों को रोकना और यदि विवाह हो गया है तो उसे तोड़ना है। ऐसे अनेक विवाह उसने तोडे हैं। उसका दावा है कि उसके 2000 से ज्यादा ऐसे विवाह तोडे है। वह कुतची पटेल समाज का मुखिया है।

               प्रारंभ में इस जघन्य हत्याकांड की जांच गुजरात के पुलिस ने की। परन्तु एक याचिका के बाद इस मामले की जांच रोक दी गई। सन् 2003में दाखिल इस याचिका में की गई मांग के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय ने जांच पर रोक लगा दी थी। 2008में सर्वोच्च न्यायालय ने एक विशेष अनुसंधान टीम गठन की। सी.बी.आई के पूर्व निदेशक राघवन को इस टीम का मुखिया बनाया गया। इस टीम के गठन के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने जांच पर लगी रोक हटा दी गई। जांच में अनेक लोग दोषी पाये गए उसके बाद अनेक लोगों की गिरतारी हुई उनमें मायाबेन भी शामिल थी। गिरतार होते ही मायाबेन ने गुजरात की मंत्रि परिषद से स्तीफा दे दिया। जांच पूरी होने पर डॉ.ज्योत्सना याज्ञनिक को विशेष जज नियुक्त किया गया। यह प्राय: कहा जाता है कि नरेन्द्र मोदी ने किसी भी जांच को प्रभावित नही किया। परन्तु मोदी ने एक ऐसे पुलिस अधिकारी को दंडित किया जिसने मायाबेन और अन्य आरोपियों के मोबाइल पर हुई बातों का पता लगाया। इन बातों ने अपराध सिध्द होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुल 61 लोग हत्याकांड के आरोपी पाये गये। इनमे से 29 को सबूतों के अभाव में निर्दोष माना गया  और 32 आरोपी अपराधा में लिप्त पाये गए।

               न सिर्फ इन सभी 32 आरोपियों को दोषी पाया गया वरन् विशेष जज ने यह भी पाया कि नरोदा पाटिया का हत्याकांड पूर्व में किये गये एक पूर्व रचित षडयंत्र का हिस्सा था।

               गोधारा के बाद जो हिंसक घटनायें गुजरात में हुई उन्हें नरेन्द्र मोदी ने ''क्रिया की प्रतिक्रिया'' बताया था परन्तु इस मामले में जवाबी हिंसा प्रतिक्रिया नहीं वरन् षड़यंत्रपूर्वक की गई थी। यद्यपि सभी पीड़ित स्पेशल कोर्ट के निर्णय से संतुष्ट हैं परन्तु उनकी शिकायत है कि उन पुलिस अधिकारियों को दंडित नहीं किया गया जो इस जघन्य हत्याकांड मे शामिल थे।

               उस दिन कुछ पुलिस कर्मी न सिर्फ मूक दर्शक बने रहे वरन् उन्होंने हत्याकांड में भाग लिया। उस दिन 2000 से ज्यादा दंगाईयों की भीड़ ने नरोदा पाटिया को घेर लिया था और उसके बाद इन दंगाईयों ने इलाके के निवासियों के साथ ऐसा व्यवहार करना प्रारंभ कर दिया जैसा दुश्मन देश की फौज करती है।  भीड़ ने हर संभव हथियार से लोगों को मारना प्रारंभ कर दिया। हत्या के साथ पीड़ितो के मकान,दुकान और होटलों आदि को लूट लिया। एक अनुमान के अनुसार करोड़ो की संपत्ति लूटी गई।

                गुजरात के दंगों के अपराधियों को यदि सजा मिल पा रही है तो उसका संपूर्ण श्रेय सर्वोच्च न्यायालय को जाता है। यदि सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप नही होता और विशेष अनुसंधान टीम गठित नहीं की जाती तो एक भी दंगाई को सजा नही होती। आजादी के बाद हमारे देश में अनेक दंगे हुये हैं परन्तु कम ही दंगो के आरोपियों को सजा मिली है।

               कुल मिलाकर 2002 के दंगे हत्याकांड के नौ मामले विशेष अनुसंधान टीम को सौंपे गये थे उनमें से 6 मामले निपट गए हैं और तीन मामलों में अभी फैसले का इन्तजार है। पहला मामला गोधरा का था। इस मामले में 11को मृत्यूदंड दिया गया, 20 को आजीवन कारावास की सजा दी गई और 63 निर्दोष पाये गये। दूसरा मामला सरदारपुरा का था इसमें 33 मारे गये। इसमें 31 लोगो को आजीवन कारावास दिया गया और 42 निर्दोष पाये गये। मोडे गांव में हुई हिंसा में 23 लोग मारे गये थे। इस मामले में 18 को आजीवन कारावास का दंड दिया गया, पांच को सात वर्ष की सजा सुनाई गई और 23 निर्दोष पाये गये। इसी गांव के एक और हत्याकांड में 3 लोग मारे गये थे। इसमें 9 को आजीवन कारावास की सजा हुई और 32 निर्दोष पाये गये। दीपडा दरवाजा कांड में एक ही परिवार के 11लोगों को जिन्दा जला दिया गया था। इसमें21 को आजन्म कारावास की सजा हुई और 61 निर्दोष पाये गये। नरोदा पाटिया हत्याकांड में 97 मारे गये। जिन मामलों में निर्णय का इन्तजार है। वे हैं नरोदा गांव का एक मामला जिसमें 11लोग मारे गये थे। गुलबर्ग सोसायटी जिसमें 69लोग मारे गये। मरने वालो में पूर्व सांसद एहसान जाफरी थे। तीसरा मामला वह है जिसमें तीन ब्रिटिश नागरिक मारे गये थे। जब नरोदा पाटिया के आरोपियों को सजा सुनाई गई तो जिन्हे सजा सुनाई गई थी वे ओर उनके रिश्तेदार फूट फूट कर रो रहे थे। सभी कह रहे थे वे निर्दोष हैं, उन्हें फंसाया गया है। ये सभी आरोपी यह भूल गये कि जब वे मुसलमानो और उनके परिवार वालों को मार रहे थे तब वे तो इससे ज्यादा रो रहे थे। परन्तु दुख की बात है कि उस इनको उनकी चीखे सुनाई नहीं पड़ी। उनकी चीख सुनकर यदि वे अपना हथियार वापिस खींच लेते तो आज उन्हें रोना नही पड़ता जिनको सजा सुनाई गई उनके परिवार वाले यह शिकायत भी कर रहे थे कि संघ परिवार का एक भी नेता उनका दु:ख बांटने के लिये अदालत में नहीं पहुँचा। कुछ कह रहे थे कि इन्ही नेताओं के भड़काने पर हमने कानून को अपने हाथ में लिया था। पर आज हम पर दु:ख का पहाड़ गिरा है तो ये नेता कीं भी नजर नही आ रहे हैं। लगता है संघ परिवार ''उपयोग करो और फेंक दो'' (Use and throw) के उसूल में विश्वास करता है।                      

? एल.एस.हरदेनिया