संस्करण: 10 सितम्बर-2012

14 सितंबर : हिन्दी दिवस पर विशेष

अंगरेजी कर रही राज है, हमको आती कहां लाज है ?

? डॉ. गीता गुप्त

                 जिस दिन भारत स्वतंत्र हुआ, उसी दिन महात्मा गांधी ने कहा था कि 'पूरी दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेजी भूल गया। उन्होंने 'मेरे सपनों का भारत'नामक पुस्तक में लिखा है-''हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित करने में एक दिन भी खोना देश को भारी सांस्कृतिक क्षति पहुंचाना है। जिस तरह हमारी आज़ादी को जबर्दस्ती छीनने वाले अंग्रेजी की सियासती हुकूमत को हमने सफलतापूर्वक इस देश से निकाल दिया,उसी तरह हमारी संस्कृति को दबाने वाली अंग्रेजी भाषा को भी यहां से निकालकर बाहर करना चाहिए।''परन्तु हमारा दुर्भाग्य कि सभी राष्ट्रीय और क्रान्तिकारी आंदोलनों तथा नेताओं की लड़ाई की भाषा तो हिन्दी रही मगर जब देश आज़ाद हुआ तो इसके संविधान में ही ऐसे प्रावधान कर दिए गए कि वह आज तक राजभाषा नहीं बन सकी है। अन्यथा जिस तरह 1948 में इजराइल का निर्माण होने पर विश्व भर के यहूदियों ने अपने भाषाई मतभेद को भुलाकर 'हिब्रू'को पुनर्जीवित कर दिया,हम भी अपनी राष्ट्रीय भावना का परिचय देते हुए हिन्दी को राष्ट्रभाषा और राजभाषा के रूप में स्थापित करवा चुके होते और अब तक वह विश्वभाषा के रूप में सम्मान पा रही होती। किन्तु यह विडम्बना ही है कि हम अंग्रेजों की दो सौ वर्षों की गुलामी से तो मुक्त हो गए पर भाषा के माध्यम से उनकी गुलामी अब तक कायम है।

                 दरअसल हम जान बूझकर किसी हिन्दी की उपेक्षा कर रहे हैं। इसमें यह भ्रामक तथ्य भी सहायक है कि अंग्रेजी अन्तरराष्ट्रीय भाषा है। जबकि सत्य यह है कि अंग्रेजी का वर्चस्व लगभग 50 ऐसे देशों में ही है, जो अंग्रेजों के गुलाम रहे। अन्य 150 देशों के उच्चाधिकारी और राजनेता तक अंग्रेजी से अनभिज्ञ हैं। भारत में भी बमुश्किल दो-तीन प्रतिशत लोग ही महारानी की तरह राज कर रही है। मगर हमारे नेताओं को दर्द नहीं होता,क्योंकि उनमें स्वदेशाभिमान नहीं है। वे भूल रहे हैं कि किसी भी देश की उन्नति उसकी अपनी भाषा में ही संभव है। रूस, जर्मनी, चीन, जापान, फ्रांस जैसे कई देश इसके उदाहरण हैं। भारत जैसे विशाल देश में बहुसंख्यकों द्वारा व्यवहृत हिन्दी भाषा जैसी सशक्त कोई अन्य भाषा नहीं है। यह संसार में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में चीनी के बाद दूसरे क्रम पर है। तथापि संयुक्त राष्ट्र संघ में अरबी, चीनी, फ्रेंच और रूसी भाषा को तो मान्यता प्राप्त है परन्तु विश्वव्यापी हिन्दी भाषा को नहीं। इसका कारण यही है कि भारतीय नेता, प्रशासक, शिक्षक, साहित्यकार-सभी हिन्दी को लेकर हीन भाव से ग्रस्त हैं। जब तक हमारी मानसिकता अंग्रेजी की दासता से मुक्त नहीं होगी तब तक हिन्दी को वांछनीय स्थान नहीं मिल सकेगा।

                आज दुनिया विश्व ग्राम से परिणित हो रही है और अंग्रेजी सम्पर्क भाषा बनने हेतु सचेष्ट है। परन्तु हिन्दी उससे कमतर कदापि नहीं है। यह कितनों को ज्ञात है कि संसार में सर्वप्रथम 'हिन्दी'पर शोधकार्य का शुभारंभ वर्ष 1911 में फ्लोरन्स विश्व विद्यालय इटली में किया गया। दूसरा शोधकार्य लन्दन विश्वविद्यालय में डॉ. जे.एन. कारपेण्टर ने सन 1918 में किया और संयोगात दोनों शोध कार्य कवि तुलसीदास से संबंधित थे। क्या आश्चर्यजनक नहीं कि 1960 के पूर्व तक हिन्दी भाषा के डॉक्टरेट का शोध प्रबंध भी अंग्रेजी में ही प्रस्तुत किया जाता था। सर्वप्रथम फादर कामिल बुल्के ने 'राम कथा'पर अपने शोध को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी माध्यम से प्रस्तुत करने के लिए अथक प्रयास किया। यही नहीं,भारतीय साहित्य और संस्कृति को समूचे विश्व में प्रतिष्ठित करने में कई विदेशियों का महत्वपूर्ण योगदान है। जेम्स, प्रिंसेप, मैक्समूलर, कवि गेटे को क्या भुलाया जा सकता है ? अमेरिकी राष्ट्रपति ने हिन्दी को इक्कीसवीं शताब्दी की विकासशील भाषा घोषित किया है और इसके विकास हेतु दस करोड़ डॉलर देने की घोषणा क्यों की है ? यह सोचने की बात है। आज हिन्दी की कद्र अपने ही देश में नहीं है। जबकि इसकी व्यापकता को देखते हुए विश्व के लगभग 175 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ायी जा रही है। विभिन्न देशों में प्रवासी भारतीय हिन्दी साहित्य का सृजन कर रहे हैं। हिन्दी वैश्विक बाजार की सशक्त भाषा बन चुकी है। दुनिया भर में पांच सौं से अधिक बहु राष्ट्रीय कंपनियों तथा अलग अलग देशों की एक हजार से अधिक महत्वपूर्ण कम्पनियों ने अपने स्टॉफ के लिए हिन्दी का ज्ञान अनिवार्य कर दिया है। यह प्रचार भ्रामक है कि कम्प्यूटर और इंटरनेट विश्व स्तर पर ज्ञान के एकमात्र स्रोत हैं, जिनकी भाषा अंग्रेजी है। सूचना प्रौद्योगिकी के वर्तमान विकसित दौर में कम्प्यूटर, इंटरनेट और वर्ल्डसाइट वेब के क्षेत्र में हिन्दी का चुनौतीपूर्ण प्रवेश संचार जगत में अपनी उपयोगिता सिध्द कर रहा है। 'वर्ल्ड वेबसाइट'के व्यापारिक महत्व ही नहीं, उसके ज्ञानात्मक और भावनात्मक व्यवहार की अनिवार्यता को भी शिरोधार्य कर रहे हैं। तमाम बड़े देश भारत को सुपर पावर मान रहे हैं अतएवं अपने विश्वविद्यालयों में हिन्दी को स्थान दे रहे हैं। मगर हमारे शिक्षा तंत्र में अंग्रेजी इस तरह हावी है कि भारतीय प्रतिमाएं विदेशों में पलायन कर रही हैं। वे वहां 'साइबर कुली' के रूप में काम कर रहे हैं और उनके उत्पादों के मूल्यवर्धन में योगदान करते हुए नस्ल भेद का शिकार हो रहे हैं। परन्तु अपनी धारती पर, अपनी भाषा में अपने उज्ज्वल भविष्य की कोई संभावना उन्हें दृष्टिगत नहीं होती। इसके लिए दोषी कौन है ?

                 यदि ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री कहते हैं कि 'भारत एक अंग्रेजी भाषी लोकतंत्र हैं' और उनकी सरकार कहती है कि 'भारत जाने वाले राजनयिकों को हिन्दी सीखना अनिवार्य नहीं, क्योंकि वहां सारा कामकाज अंग्रेजी में होता है, तो क्या यह हमारे लिए शर्मनाक नहीं ?असली लोकतंत्र तो वहीं होता है जो लोक भाषा में चले। हमारी लोकसभा में अंग्रेजी भाषा में बहस होती है, हिन्दी बोलने में नेताओं को शर्म आती है। पर क्या हमारी जनता, उससे जुड़ी बुनियादी समस्याओं तथा देश के गंभीर मामलों पर विमर्श और कार्य करने के लिए किसी विदेशी भाषा की दरकार होनी चाहिए ?'क्या एक आदर्श लोकतंत्र में जनता को अपनी भाषा में ही शिक्षा, व्यवसाय, मनोरंजन, न्याय और सम्मानजनक जीवन की गारण्टी नहीं मिलनी चाहिए ?यह अत्यंत पीड़ादायक है कि भारत में राजनीतिक दल हिन्दी को लेकर नकारात्मक वातावरण स्थापित करने की दिशा में ही अग्रसर हैं। जबकि हिन्दी विश्व भाषा बनने की क्षमता और संभावनाओं से परिपूर्ण है। यह भी सच है कि किसी भी देश की स्वतंत्रता और अस्मिता की पहचान उसकी राष्ट्रभाषा ही होती है। लेकिन अफसोस हमारे नेताओं हीं नहीं, हर भारतीय को यह बात समझना अब भी बाकी है।

? डॉ. गीता गुप्त