संस्करण: 10 सितम्बर-2012

बचत खाता आम आदमी का अधिकार बने

? डॉ. सुनील शर्मा

                रामभगत पेशे से मजदूर है,उसने अपनी मजदूरी से कुछ रूपये जुटा कर वक्त मौका के लिए पन्नी में लपेट लकड़ी की पेटी में रख दिए थे। कुछ दिनों बाद पेटी खोलने पर उसे अपनी मेहनत की कमाई कतरन के रूप मे मिलती है,क्योंकि चूहों ने रूपयो को कतरन में बदल दिया। बेचारे रामभगत के पास अपनी कमाई को सुरक्षित रखने का एकमात्र साधन लकड़ी की पेटी थी जिसमें चूहों ने आक्रमण कर उसकी कमाई को मिट्टी में मिला दिया। वैसे रामभगत पहले अपनी मजदूरी मालिकों के पास जमा रहने देता था, परन्तु उसमें भी उसे जरूरत पड़ने पर पैसों के लिए मालिकों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था। हालॉकि कुछ समय पहले रामभगत के कुछ साथियों ने शहर से आई एक बैंकनुमा संस्था के कर्मचारियों के पास भी रूपये जमा करवाएॅ थे। इस संस्था के कर्मचारी आश्वासन देते थे कि जमा रूपया दो साल में दुगुना कर देगें। कर्मचारियों ने यह बात स्टाम्प पेपर पर भी लिखकर दी थी। इन बातों उलझकर रामभगत के गॉव के अनेक मजदूर और किसानों ने उस संस्था में अपने पैसे जमा किए, संस्था के कर्मचारी दैनिक और साप्ताहिक तौर पर रूपया जमा करते थे। जमा की पावती भी डायरी पर लिखकर देते थे। कुछ मजदूरों को जरूरत पड़ने पर उधार भी दिया। लेकिन एक दिन पता चला कि संस्था बंद हो गई और कर्ताधर्ता भाग निकले। लूटे मजदूर कंपनी द्वारा लिखे स्टांप पेपर और पावती की डायरी लेकर पुलिस थाने पहॅुचे। लेकिन वहॉ से खाली हाथ ही वापिस होना पड़ा। लेकिन यह स्थिति अकेले रामभगत या उसे साथी मजदूर और गरीब वर्ग की नहीं हैं बल्कि देश के नब्बे फीसदी गरीबों कों ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है। कभी इनकी कमाई चूहे काटते तो कभी चोर उड़ा देते हैं अगर इनसे बची तो फर्जी कम्पनियॉ ज्यादा ब्याज का लालच देकर जमा राशि को लेकर रफूचक्कर हो जाती है। देश की राजधानी दिल्ली में भी बुंदेलखण्ड के हजारों मजदूर ऐसी लूटपाट के शिकार होते हैं।

             उल्लेखनीय है कि देश भर में गरीब जिनमें से अधिकांश मजदूरी के कार्य से जुडे हुए हैं, और प्रवासी जीवन व्यतीत करने मजबूर है। वो अगर अपनी आमदानी से बचत करें भी तो उसे सुरक्षित रखने का साधान नहीं हैं। लेकिन ऐसा नहीं कि इन मजदूरों और गरीबों की आय को सुरक्षित की व्यवस्था नहीं की जा सकती है। अगर इन्हें बैंकिग से जोड़कर इनका बचत खाता खोला जाता है तो यह वर्ग अपनी बचत को बढ़ाकर गरीबी के चंगुल से बाहर निकलेगा। परन्तु यह वर्ग बैंकिग सुविधाओं से काफी दूर हैं क्योंकि नियम कायदों के नाम पर बैंकों के दरबाजे इनके लिए बंद हैं शायद बैंकिग व्यवसाय के लिए इनके खाते फायदेमंद नहीं हैं। चूॅकि बैंकिगं से जुड़ने की पहली कड़ी बचत खाता है, इसके लिए सबसे पहले पहचान संबंधाी दस्तावेज जैसे राशन कार्ड, वोटर आईडी कार्ड,आधार कार्ड और पेन कार्ड जैसे दस्तावेज मॉगे जाते हैं। फिर पते के सत्यापन के लिए बिजली या टेलीफोन का बिल जैसे सबूत मॉगे जाते हैं। बैंकें यह शर्त भी रखती हैं एक ऐसा परिचय दाता भी लेकर आओ जिसका बैंक में पहले से खाता हो। केवाईसी का अलग झंझट खड़ा किया गया है,वास्तव में गरीब और मजदूर के लिए इनमें से अधिकांश दस्तावेज जुटाना संभव नहीं होता है। अगर वो कोई दस्तावेज प्रस्तुत करता भी है तो यह कहकर टरका दिया जाता है वो यहॉ का नहीं है,या फिर अपने मूल निवास की बैंक में खाता खुलेगा। इस प्रकार बैंकिग से जुड़ने के पहले कदम पर ही गरीब और मजदूर वर्ग को दुत्कार मिलती है।

               बचत खाता रूपया जमा करने का एक माधयम है,इसके जरिए जमा राशि से बैंक को फायदा ही होगा। यह भी निश्चित है कि बचत खाते के जरिए बैंको से कर्ज नहीं मिलता है। ऐसे में बचत खाता खोलने से बैंको तो कोई जोखिम है ही नही? फिर कागजात के नाम पर देश की बड़ी आबादी को बैंकिंग से क्यो महरूम किया जा रहा है? वर्तमान में बचत और भविष्य की सुरक्षा के लिए पीपीएफ और न्यू पेंशन जैसे सशक्त माधयम उपलब्ध है जिनके जरिए आम आदमी को आर्थिक मोर्चे पर सबल किया जा सकता है लेकिन यहॉ भी मूल निवासी,राशनकार्ड की माथापच्ची। आज जब खाता नम्बर पोर्टेबिलटी की बात हो रही है, बैंकों को इंटरनेट के जरिए एक दूसरे से जोड़ा रहा है। एक व्यक्ति एक खाता की धारणा  पर बल दिया जा रहा है तब आम आदमी बचत खाता खुलवाने के लिए धक्के खाने मजबूर है? प्रश्न है कि आम आदमी को बैंकिग से दूर रखने का दोषी कौन है? बैंकों की नियामक रिजर्व बैंक या फिर कोई दूसरा? निश्चित तौर पर नियामक से ज्यादा बैंकिग संस्थानों के बेलगाम कर्मचारी दोषी हैं, जो नियमों की व्याख्या अपने तरीके से करते हैं जिससे बैंकिंग प्रणाली की समझ से दूर आम आदमी इनसे दूरी बनाए रखने में ही अपनी भलाई समझता है।

                वैसे  भारतीय रिजर्व बैंक का ऑकलन है कि देश की आधी आबादी बैंकिग से वंचित हैं। बैंकिग से वंचित आबादी में दो तिहाई हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले नागरिकों का है। जिनके लिए सरकार राशन या मिट्टी के तेल की सब्सिडी सीधे ही भुगतान करने की मंशा बना रही है। लेकिन यह योजना परिवार के मुखिया के नाम पर बैंक खाता होने पर ही सफल हो सकती है।इस तरह बचत खाता न होने के कारण गरीबों का बड़ा वर्ग इस योजना के फायदे से वंचित रहेगा। देश के गरीबों को गरीबी से बाहर निकलने की राह में उनमें बचत की आदत एक महत्तवपूर्ण कदम हो सकता है। इसमें बैंक या पोस्ट आफिस का बचत खाता मददगार हो सकता है। जरूरी है कि बचत खाता आम आदमी का अधिाकार बने।

? डॉ. सुनील शर्मा