संस्करण: 10 सितम्बर-2012

गुजरात दंगा

टूटा 'मसीहा' का मिथक

?    विवेकानंद

               कुछ लोगों को मसीहा टाइप दिखने में बड़ा आनंद मिलता है, यदि चापलूसों द्वारा उन्हें मसीहा या महापुरुष की संज्ञा मिलने लगे तो फिर क्या कहना...सोचने लगते हैं कि संसार में अब उनके सिवा कोई नहीं। वस्तुत: यह एक किस्म की बीमारी है, लेकिन आत्ममुग्धता की इस बीमारी की गिरफ्त में आया इंसान न केवल अपना नुकसान करता है बल्कि कई बार लोगों को भी बड़ी मुसीबत में डाल देता है। पर जब तक यह मिथक टूटता है तो तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

                  गुजरात दंगे इसी का वलंत उदाहरण साबित हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुजरात दंगों में हुए नरसंहार की सुनवाई के लिए गठित की गई अदालतें जब फैसले सुनाती हैं,गुजरात में गम के बादल मंडराने लगता है। एक कहर उन परिवारों पर टूटता है जिनके पिता,पति या भाई को उम्रकैद या सजा-ए-मौत का ऐलान होता है,और दूसरी ओर दहशत उन घरों में पसर जाती है,जिनके परिवार के सदस्य अभी भी जेल में हैं और उनके गुनाह का फैसला किसी भी वक्त अदालत सुना सकती है। दहशत में जी रहे इन लोगों के लिए आज जैसा वक्त तब कल्पना से परे की चीज थी, जब वे गुजरात की गलियों में चंद लोगों के राजनीतिक स्वार्थ के लिए उकसावे का शिकार हो रहे थे। जिस तरह से सफेद कमीजों का साथ उन्हें मिल रहा था,उससे कभी संदहे ही नहीं हुआ था कि कभी हमारे गुनाहों का इंसाफ भी होगा। तब लग रहा था कि हमारा खलीफा हमें हर मुसीबत से बचा लेगा। और वाकई उस खलीफा ने सबको बचा लिया था, दंगों से जुड़े सारे केस बंद कर दिए थे। लेकिन कहते हैं वक्त किसी को माफ नहीं करता, जो गुनाह किया है सबको अपने-अपने हिस्से की सजा भी एक न एक दिन भुगतनी पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट ने सारे केस फिर से खुलवाए और मसीहा देखते रह गए,अदालतें लगा दी गईं मसीहा हाथ मलते रहे,एसआईटी गठित कर दी गई और आखिर मसीहा को मुंह की खानी पड़ी। अब तक जितने भी फैसले आए हैं उनसे उन परमवीरों का भी यह मिथक टूट गया कि उनका मसीहा उन्हें बचा लेगा और उस मसीहा का भी अहंकार जमींदोज हो गया, जिसे अपने कुटिल इरादों से कालजयी होने का भ्रम था।

                    गुजरात की पूर्व मंत्री और नरोडा पाटिया की विधायक माया कोडनानी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता बाबू बजरंगी को सजा होने से यह साबित हो गया कि गुजरात के दंगे गोधरा की प्रतिक्रिया नहीं थे, बल्कि गोधरा कांड को राजनीतिक मकसद से एक मौके की तरह भुनाया गया था। गोधरा में जितना बड़ा पाप हुआ था उतना ही बड़ा पाप का मठ सत्ता के सहयोग से पूरे गुजरात में खड़ा किया गया। गुजरात के नेता इस तथ्य पर काम कर रहे थे कि जितना बड़ा बड़ा डर पैदा कर सकोगे उतने बड़े नेता बनेगो। लिहाजा एक सुनियोजित साजिश के तहत गोधरा कांड की आग में अफवाहों का बारूद डाला गया। कुछ खास व्यक्तियों ने आम आदमी को उनकी अस्मिता और स्वतंत्रता को खतरे में पड़ने का भय दिखाया। इस अफवाह ने लोगों में अनावश्यक भय पैदा किया,जिसने क्रोध को जन्म दिया, क्रोध ने हिंसा को और  इस हिंसा ने गांधी के गुजरात को रक्त रंजित कर दिया। हिंसा में राय का नुकसान हुआ, आम आदमी का नुकसान हुआ, आम हिंदू और मुसलमान मारे गए। और अंतत: वह साजिश सफल रही जिसके लिए इस रक्तपात की नींव डाली गई थी। इस हिंसा से एक साधारण नेता गुजरात का मसीहा बन गया और आम आदमी के हाथ लगी या तो मौत या कालकोठरी की सजा।

                  यह बात किसी से छिपी नहीं है कि संजय जोशी के साथ जब नरेंद्र मोदी को संघ ने गुजरात भेजा गया था तब उनकी संघ में और भाजपा में क्या हैसियत थी। संजय जोशी ने अपनी कार्यकुशलता और संगठन क्षमता के बूते पार्टी के पुराने नेताओं के साथ मिलकर भाजपा को सफलता दिलाई। लेकिन मौके को ताड़ने में माहिर मोदी ने ऐसी बिसात बिछाई कि केशूभाई पटेल की कुर्सी उनके हाथ लग गई। कुर्सी मिलने के बाद गुजरात में जो जो कुछ अच्छा हुआ था वह सब मोदी ने अपने नाम लिख लिया। राजनीति में चापलूसों की कमी नहीं होती,उन्होंने भी मोदी को महिमा मंडित किया। इसे नरेंद्र मोदी की किस्मत कहें या गुजरात का दुर्भाग्य,गोधरा कांड मोदी की राजनीति में सुनहरा अवसर बनकर आया। जिस वक्त लोगों से धैर्य की अपील की जानी थी,भाजपा और बजरंग दल के लोग भारतीय भगवा संस्कृति को कलंकित करते हुए लोगों में उत्तेजना पैदा करने में लगे थे। यह उत्तेजना दंगों के रूप में सामने आई। आम आदमी की कोमल भावनाओं को भड़काकर गांधी के गुजरात को कलंकित किया गया। लेकिन जब जिम्मेदारी लेने का वक्त आया तो परमवीर पलायन कर गए। अपनी अस्मिता को बचाने के लिए लोगों ने जिस मसीहा की बात मानकार खून बहाया था वह वक्त पर काम नहीं आया। शुरू से आखिरी तक गुजरात का यह मसीहा केवल अपने बचाव में लगा हुआ है। कभी क्रिया की प्रतिक्रिया कहकर खुद को देशवासियों से बचाता है तो कभी 84 के दंगों को अपनी ढाल बनाता है। कभी सीना ठोककर नहीं कहता कि हां मैंने गोधरा का बदला लिया, हां मैंने कारसेवकों और रामभक्तों की मौत का बदला लिया...क्यों? क्योंकि यह सच नहीं है, यह बदला नहीं था, यह साजिश थी वक्त के साथ, जिसमें भावनाओं को भड़काकर अपना सियासी उल्लू सीधा किया गया, और देश का दुर्भाग्य था।

                 जो लोग आज कोर्ट के फैसले पर आंसू बहा रहे हैं उन्होंने कभी सोचा कि उनके परिवार का सदस्य गोधरा आई साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाने क्यों गया था?किसी ने सोचा कि बेस्ट बेकरी में महिलाओं और बच्चों को जिंदा जलाने से उसे क्या हासिल होगा?किसी ने नहीं सोचा। जिन्हें यह बातें नागवार गुजर रही हों वे चाहे मुस्लिम समाज के हों या हिन्दू समाज के उदारवादी सान हों, बुरा मानने की बजाए इसकी समीक्षा करें कि गुजरात में दंगों का इतिहास क्यों बना?लेकिन ताज्जुब है कि आज भी कुछ ऐसे लोग हैं जो उस नरसंहार को विजयोत्सव की तरह याद करते हैं और जिसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए यह रक्तपात हुआ उसे महान बताकर अब भी उनकी शौर्यगाथा गा रहे हैं। यह बात और है कि इन्होंने केवल दूर से बैठक तमाशा देखा है,इनके हाथ न दंगों में जले हैं न ही उन्हें सजा की दहशत है। वे अब भी मानते हैं कि गुजरात में जो हुआ वह गोधरा कांड की प्रतिक्रिया थी। इसमें इनका दोष नहीं है...दोष है उन लोगों को जिन्होंने इन्हें गुमराह किया, इनकी आस्था और विश्वास का इस्तेमाल खुद की प्रगति के लिए किया। उनके नेता ने कभी नहीं बताया कि आने वाली नस्लों पर इन दंगों का क्या प्रभाव होगा? चमकते गुजरात के बीच गुमनामी के अंधेरे में खोई उन बस्तियों में जहां विस्थापित मुसलमान रहते हैं,अशिक्षा और नफरत के बीच पैदा होने वाले बच्चों का व्यवहार भविष्य में कैसा होगा? जिनके परिवार का पालन पोषण करने वाला उम्रकैद की सजा भुगत रहा है उसके परिवार का लालन-पालन कैसे हो रहा होगा? उसके बच्चों को शिक्षा कैसे मिल रही होगी? उल्टे नफरत की आग जलती रहे इसलिए गोधरा में जला रेल का डिब्बा डिब्बेश्वर बाबा बनाकर पूजा जा रहा है।

                बहरहाल डिब्बेश्वर बाबा के पुजारियों का पाखंड खंड-खंड होना शुरू हो गया है। अभी माया कोडनानी और बाबू बजरंगी को सजा मिली है, आगे और भी जनता को बरगलाकर आपस में लड़ाने वालों को सजा मिलेगी। हां राजनीतिक दखल अधिक होने के कारण सजा मिलने में कुछ समय जरूर लगा वरना दंगों में सत्ताधारी संलिप्त हैं इसका प्रमाण तो तभी मिल गया था जब अहमदाबाद के तत्कालीन पुलिस कमश्निर के पत्र सार्वजनिक हुए थे। नफरत की आग में जलते गुजरात को देखकर आईपीएस पीसी पांडे ने 2 पत्रों में गुजरात पुलिस की मजबूरी बयां की थी। कमिश्नर पांडे ने 19 अप्रैल 2002 को पहला पत्र गुजरात के पुलिस महानिदेशक को लिखा था। जिसमें ये साफ हो गया था कि सरकार के तत्कालीन मंत्री भारत बरोट कैसे भीड़ को दंगों के लिए भड़काने का काम कर रहे थे। एक टीवी चैनल यह पत्र दिखा चुका है, जो निश्चित तौर पर भारत के खिलाफ सबूत होना चाहिए। चैनल के मुताबिक पांड ने लिखा था 15 अप्रैल 2002 को सुबह के 9.30 बजे से 9.45 के बीच दिल्ली दरवाजा इलाके के कापड़िया हाईस्कूल के पास पत्थर फेंकने की एक घटना घटी। गुप्त सूचना मिली कि माननीय मंत्री श्री भारत बरोट एक निजी सफेद कार में आए और भीड़ को संबोधित किया। उनके जाने के बाद भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया। इस चिठ्ठी के मिलने के बाद पांच लोगों को गिरफ्तार भी किया गया था लेकिन उन्हें जल्द ही जमानत मिल गई थी। तीन दिन बाद एक बार फिर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं की करतूत कमिश्नर पीसी पांडे की नजरों में आई जिसके बाद उन्होंने इस बार डीजीपी का भरोसा छोड़कर सीधे 22 अप्रैल 2002 को गुजरात के अतिरिक्त मुख्य सचिव अशोक नारायण को एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने लिखा-विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के नेता रक्षा ने नाम पर व्यापारियों से पैसा इकट्ठा कर रहे हैं। जिन इलाकों में अल्पसंख्यक समुदाय की संपत्ति को बर्बाद किया गया,वहां उन्हें दुकानें लगाने नहीं दी जा रही हैं। इन संपत्तियों पर कब्जा जमाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। गुजरात सरकार ने इन पत्रों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया था। लेकिन वक्त ने इंसाफ किया और नतीजा सबके सामने है। माया कोडनानी और बाबू बजरंगी सहित कुछ और नेता टाईप लोग उम्रकैद की सजा पा चुके हैं। बेशक इनके पास कानूनी लड़ाई के लिए मैदान खुला है,लेकिन समय का इंसाफ किसी भी सरकार और किसी भी अदालत से बड़ा होता है। जब वक्त इन्हें यहां तक लाया है तो अंजाम पर भी ले जाएगा। और यही नहीं हर उस व्यक्ति का यही अंजाम होगा जिसने अपने स्वार्थ के लिए निष्पाप लोगों का रक्त बहाने का गुनाह किया होगा। मसीहाओं और मठाधीशों का मिथक टूटेगा और हिन्दुस्तान के माथे पर लगे दाग अवश्य धुलेंगे।

? विवेकानंद