संस्करण: 10  अक्टूबर- 2011

सिर्फ लोकपाल नहीं प्रशासनिक सुधार भी जरूरी भ्रष्टाचार रोकने          

? डॉ. सुनील शर्मा

               देश से भ्रष्टाचार निवारण के लिए अपनी समझ के अनुसार हर आदमी कोई न कोई उपाय सोचता है। अन्ना और रामदेव ने भी अपनी सोच के मुताबिक देश से भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए अभियान चलाया हुआ है। लेकिन क्या इनके सुझाए गए उपायों से देश से भ्रष्टाचार का खात्मा संभव है तो यह सोचना सिर्फ एक अच्छी कल्पना ही हो सकती है। उल्लेखनीय है कि देश में भ्रष्टाचार का कारण सरकारी सेवा,अनुदान की प्राप्ति और कार्यों के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता और जगह जगह व्याप्त इंस्पैक्टर राज मुख्य है। इनसे संबंधित अमला भ्रष्टाचार करता है,आम आदमी के कामों में अड़ंगा अटकाकर उसे रिश्वत देने के लिए मजबूर करता है,सरकारी तंत्र से जुड़ा अमला स्थानीय शासन और पंचायत जैसी संस्थाओं के कार्यों को अटकाकर इनसे भी सेवाशुल्क वसूलता है और इसमें जुड़े जन प्रतिनिधियों को भी हिस्सेदार बना लेता है। रिश्वत का कुछ हिस्सा अपने वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुॅचाकर स्वयं को किसी भी संभावित जॉच से सुरक्षा करता है,उच्चाधिकारी यह पैसा नौकरशाहों और मंत्रियों तक पहूॅचातें हैं,इस तरह रिश्वत का यह पैसा रक्त बनकर सारी व्यवस्था की धमनियों में प्रवाहित होता रहता है और इस भ्रष्ट तंत्र पर सारे प्रहार बेकार सिद्व होते हैं। मौजूदा सरकारी कर्मचारी तंत्र की वजह से हर काम में न्यूनतम दस फीसदी का मंत्र आम हो गया है। इस स्थिति में आम आदमी अपने आप को असहाय महसूस कर इस भ्रष्टाचार को ही व्यवस्था का एक अंग मानने मजबूर है। अन्ना के साथ सिविल सोसायटी कहे जाने वाले लोगों के एक समूह ने भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए जनलोकपाल नामक एक नए तंत्र के गठन की मॉग की हैं। टीम अन्ना का मानना है कि इसके लागू होते ही देश से भ्रष्टाचार का नामो निशान मिट जाएगा। हम जानते है कि देश में हत्या और नशे का कारोबार रोकने के कठोर कानून है लेकिन क्या देश से हत्या और नशे का कारोबार बंद हो पाया? वैसे ही भ्रष्टाचार रोकने के लिए कानूनी प्रावधान है लेकिन भ्रष्टाचार की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। और जनलोकपाल के जरिए एक और इंसपेक्टर बिठाने की तैयारी है।अगर अन्य पुराने इंसपैक्टरों की भॉति अगर यह इंस्पैक्टर भी सेवाशुल्क में चुप रहने वाला हुआ तो आम आदमी पर एक और बोझ साबित होगा। 

               वास्तव में भ्रष्टाचार पूर्णत:व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा है और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए प्रशासनिक तंत्र पर नियंत्रण के साथ साथ वर्तमान प्रशानिक व्यवस्था में परिवर्तन की आवश्यकता है,क्योंकि हमारी वर्तमान व्यवस्था में काफी खोट है यहॉ आम आदमी याचक है और सरकारी तंत्र से जुड़ा आदमी सरकार। वास्तव में हमारे देश में सरकारी सेवाओं से जुड़ा व्यक्ति अपने आप को ही सरकार मानने की खुशफहमी में रहता है,वह कोई काम करे या न करे सेवानिवृत्ति तक वह सुरक्षित है और उसके बाद शेष जिंदगी पेंशन और सरकारी चिकित्सा व्यव्स्था के जरिये आराम से गुजरना तय है। इस निष्कंटक जीवनचर्या में वह बेईमान बनकर आम आदमी को लूटता है उसे चक्कर पर चक्कर कटवाता है। लेकिन इसी सरकारी कर्मचारी को अगर इस बात का अंदेशा हो जाए कि उसका कार्य सिर्फ सेवा प्रदान करना है और इसमें लापरवाही तथा एक भी भ्रष्ट काम उसकी जिंदगी का सुख-चैन छीन लेगा तो वह गलत काम करने से डरेगा। वास्तव में सरकारी कर्मचारियों, विशेषकर सेवा और नियंत्रण से जुड़े कर्मचारियों की सेवाशर्तों में साठ साला रिटार्यमेंट की व्यवस्था की समाप्ति की आवश्यकता हैं। सेवा कार्य से जुडे क़र्मचारियों जैसे क्लर्क,पटवारी,सेवाओं के विस्तार से जुड़ा अमला,बैंक कर्मचारी तथा नियंत्रण कार्य से संबंधिात अमला जैसे पुलिस,तहसीलदार और प्रशासनिक अमला इन सबको अधिकतम पॉच-पॉच वर्ष की नियुक्ति पर रखा जाए और पॉच वर्ष के कार्य की समीक्षा के बाद ही अगले पॉच वर्ष के लिए पुर्ननियुक्ति दी जाना चाहिए। इनके कार्यों की समीक्षा जनता के प्रति व्यवहार  मुख्य आधार बनना चाहिए,इनके उच्चाधिकारी द्वारा लिखित गोपनीय चरित्रावली को भी सार्वजनिक करना चाहिए। अपने सभी पंचवर्षीय कार्यकालों को सफलतापूर्वक तय करने के बाद ही इन्हें पेंशन की पात्रता होनी चाहिए। निर्माण से जुड़े कर्मचारियों, इंजीनियरों की सेवा विस्तार का मापदण्ड उनके निर्माण कार्य की गुणवत्ता होनी चाहिए। सेवा से जुड़े अनेक क्षेत्रों जैसे विद्युत वितरण,दूरसंचार, बीमा,कृषि विस्तार,रेल टिकिट विक्रय आदि को पूर्णत निजी हाथों में सौंप देना चाहिए। अच्छे कार्य निष्पादन के आधार पर ही इन्हे कार्य विस्तार की अनुमति मिलनी चाहिए। शिक्षा और चिकित्सा सेवा से जुड़े दो अहम क्षेत्र हैं इन पर राज्य का पूर्ण नियंत्रण जरूरी है इनसे जुड़े सरकारी संस्थानों को जनभागीदारी से संचालित किया जाना चाहिए। निजी हाथों से संचालित संस्थाओं की देखरेख के लिए भी सरकार स्थानीय लोगों की समिति बनाए। उच्च प्रशासनिक पदों पर से आइ.ए.एस.का एकाधिकार समाप्त होना चाहिए। सार्वजनिक सेवा और उद्यम कार्यों से जूडे प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी राजकाज से जोड़ा जाना चाहिए। सरकारी आयोगों और उपक्रमों में सेवानिवृत्त नौकरशाहों को जगह नहीं मिलनी चाहिए,निजी उद्यम में भी सेवानिवृत्त नौकरशाहों के प्रवेश पर रोक लगना चाहिए। राजनीतिक दलों को भी जनता को प्रलोभित करने वाले हथकण्डे अपनाने के बजाए विकास और लोककल्याण का ध्येय रखना चाहिए।

               आर्थिक लाभ की ओर आकृष्ट होना एक मानवीय प्रवृत्ति होती है और  भ्रष्टाचार इसमें सहायक होता है। इसे केवल कानून या मानव मन के आंतरिक शुद्वीकरण से नहीं रोका जा सकता है बल्कि व्यवस्था का ऐसा सृजन किया जाना चाहिए जिससे भ्रष्टाचार करने की गुजांइश ही न रहे और भ्रष्ट व्यवहार के लिए तैयार सेवक को उसके भविष्य का आइना हर समय दिखता रहे कि भ्रष्ट व्यवहार किसी भी समय सुख चैन छीनकर सड़क पर खड़ा कर देगा। हालॉकि इस दिशा में केन्द्र सरकार ने अभी कुछ शुरूआत की है जैसे भ्रष्टाचार में लिप्त नौकरशाहों की पेंशन कटौती,उनपर मुकदमें की अनुमति में शीघ्रता और मंत्रियों के विवेकाधीन कोटे की समाप्ति का विचार वास्तव में अच्छी शुरूआत है। इससे पहले सूचना के अधिकार का अमोघ अस्त्र भी इसी केन्द्र सरकार ने दिया था।

? डॉ. सुनील शर्मा