संस्करण: 10  अक्टूबर- 2011

ऐसे नहीं बचेंगी बेटियां

? महेश बाग़ी

               मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर शिगूफेबाजी करने का फितूर सवार है। कभी वे न्याय यात्रा करते हैं तो कभी विकास यात्रा। कभी कार्यकर्ता गौरव दिवस मनाने लगते हैं,तो कभी औद्योगिक विकास के नाम पर चीन की यात्रा कर आते हैं। अब उन्होंने बेटी बचाओं अभियान का श्रीगणेश किया है। निश्चित रूप से घटता लिंगानुपात गंभीर चिंता का विषय है और लड़कियों को बचाया जाना ज़रूरी है,लेकिन बेटी बचाने के नाम पर सरकारी उत्थान कोरा दिखावा तो है ही, जन धन की बर्बादी भी है। इस अभियान के नाम पर तमाम अखबारों में बड़े बड़े विज्ञापन दिए गए और प्रदेशभर में होर्डिंग्स लगाए गए,जिनमें मुख्यमंत्री को एक बच्ची उठाए दर्शाया गया। सवाल यह है कि क्या इतना करने और एक आयोजन करने भर से बेटियों को बचाया जा सकता है ?क्या एक बेटी के पांव पखारने से कन्या भ्रूण हत्या करने वालों का हृदय परिवर्तन हो सकता है ?

               जिस दिन राजधानी में बेटी बचाओ अभियान का शुभारंभ किया गया, उसी दिन अखबारों में घटते लिंगानुपात की भयावह तस्वीर भी सामने आई। प्रदेश का ग्वालियर-चंबल संभाग कन्या भू्रण हत्या करने में सबसे आगे हैं। मुरैना में तो कई परिवार ऐसे है, जिनकी संख्या डेढ़ सौ तक पहुंच गई है, किंतु उनमें एक भी लड़की नहीं है। क्या इसे संयोग कह कर टाला जा सकता है। निश्चित रूप से इसका उत्तर नकारात्मक ही होगा। बेटियों की संख्या में वृध्दि करने के लिए राज्य सरकार ने लाड़ली लक्ष्मी योजना भी प्रारंभ की है, किंतु यह योजना भी लालफ़ीताशाही की शिकार हो गई है। गर्भवती माताओं को अस्पताल लाने और प्रसव के बाद घर पहुंचाने के लिए दीनदयाल रथ (एंबुलेंस)भी खरीदे गए हैं। इनका किस कदर दुरुपयोग हो रहा है,यह भी पांच अक्टूबर के अख़बार में स्पष्ट हो गया। इस दिन तीन प्रसूताएं दीनदयाल रथ का इंतजार करते-करते थक गई और आख़िरकार उन्हें आटो रिक्षा से घर जाना पड़ा। जब राजधानी में यह आलम है, तो सुदूर अंचलों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

               दरअसल सरकार की योजनाएं तो अच्छी हैं, किंतु उनका क्रियान्वयन सही ढंग से नहीं हो पा रहा है, क्योंकि उनकी मॉनीटरिंग की कोई व्यवस्था नहीं है। यही वजह है कि आम जनता को इन योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है। बेटी बचाओं अभियान का भी यही हश्र हो सकता है। हालांकि देश के कुछ राज्यों में लिंगानुपात का अंतर कम होने के संकेत मिले हैं, परंतु मध्यप्रदेश में स्थिति चिंताजनक है, जहां एक हज़ार लड़कों के मुकाबले मात्र 912 बेटियां हैं। भिंड, मुरैना, दतिया, रीवा तथा नरसिंहपुर में तो स्थिति और भयावह है, जहां यह औसत 830 है। लिंगानुपात में अंतर के कई कारण हैं। इनमें सबसे प्रमुख है दहेज। खर्चीली शादी और दहेज की बढ़ती मांग के कारण लोग बेटियों को जन्म नहीं होने देना चाहते हैं। ग्वालियर चंबल संभाग में स्थिति थोड़ी अलग है। यहां के लोगों की धारणा है कि लड़की शादी के बाद पराए घर चली जाती है, जबकि लड़का साथ में रहता है। उनका यह भी मानना है कि लड़ाई झगड़े की स्थिति में लड़के ही काम आते हैं। इसके अलावा दबंगों द्वारा ढाए जाने वाले जुल्म की स्थिति में भी लड़के ही उसका सामना कर पाते हैं। इन कारणों के चलते इन अंचलों में कन्या भ्रूण हत्याएं की गई,जिसका दुष्परिणाम घटे लिंगानुपात के रूप में सामने आया। आज स्थिति यह है कि यहां लोगों को अपने बेटों की शादियों के लिए लड़कियां ही नहीं मिल पा रही हैं और उन्हें अन्य राज्यों में रिश्ते करना पड़ रहे हैं।

               कई बार तो यह भयावह तथ्य भी सामने आ चुका है कि घर की बुजुर्ग महिलाएं ही लड़की पैदा होने पर बवाल मचा देती हैं। ऐसी महिलाएं गर्भवती माता को 'पुत्रवान भव:' का आर्शीवाद देती हैं, किंतु 'पुत्रवती भव:' कोई नहीं कहता। इससे यह कहावत चरितार्थ होती है कि स्त्री की दुश्मन स्त्री ही है। इसके अलावा पुरुषों में यह धारणा भी है कि लड़की हुई तो भविष्य में उन्हें उसके ससुराल वालों के सामने सिर झुका कर रहना पड़ेगा। हालांकि आज के दौर में ऐसा माहौल नहीं है, किंतु अशिक्षा के चलते लोग अब भी भ्रांतियों के शिकार होकर कन्या भ्रूण हत्या का पाप कर रहे हैं। ऐसे लोगों को राह पर लाने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाने की ज़रूरत है। प्रशासन को महिला एवं बाल विकास विभाग,सामाजिक न्याय विभाग और शिक्षा विभाग के साथ मिल कर गांव-गांव में जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। इसके साथ ही लिंग परीक्षण करने वाली लेबोरेटरीज़ के स्टिंग ऑपरेशन करना चाहिए। सादी वर्दी में महिला पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को खुद लिंग परीक्षण करवाने और मोटी रकम का लालच देकर छापामार कार्रवाई करना चाहिए। कानून में संशोधान कर लिंग परीक्षण करने वालों को कठोर दंड दिया जाना चाहिए और दहेज लेने-देने के संबंध में भी कठोर प्रावधान किए जाने चाहिए। इससे ही घटते लिंगानुपात पर नियंत्रण किया जा सकता है। एक दिन के बेटी बचाओ अभियान मनाने मात्र से लिंगानुपात को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

? महेश बाग़ी