संस्करण: 10  अक्टूबर- 2011

पुस्तक समीक्षा

'गोडसे के वारिस'

भारत में हिन्दुत्व आतंकवाद पर नज़र'

? संजीव कुमार

               दक्षिण एशिया के इस हिस्से में आतंकवाद का सवाल -विशेषकर धर्म के दोहन पर केन्द्रित अतिवादी समूहों की गतिविधियों का सवाल -चुनौती के रूप में खड़ा है। अमेरिका में हुए आतंकवादी हमले 9/11 की दसवीं सालगिरह पर फिर एक बार सभी ने इसे शिद्दत से महसूस किया। बहरहाल,इसे किसी सुचिन्तित योजना का हिस्सा कहें या सहज मानवीय भूल का परिणाम की चाहे अनचाहे आतंकवाद पर केन्द्रित यह विमर्श दुनिया भर में समुदायविशेष पर ही केन्द्रित रहता आया है। भारत की स्थिति भी इससे अलग नहीं रही है।

               विगत कुछ सालों से जबसे नांदेड, मालेगांव, अजमेर, मक्का मस्जिद, समझौता एक्स्प्रेस आदि बम धमाकों में संघ परिवार या अन्य हिन्दुत्ववादी संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं की संलिप्तता के ठोस सबूत सामने आए हैं,तबसे स्थिति में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। विगत नवम्बर माह में संघ के प्रचारक असीमानन्द की गिरतारी एवं उसके कबूलनामे ने स्थिति को स्पष्ट किया है।

               यह अलग बात है कि अभी भी बहुसंख्यक आतंकवाद की इस विकरालता को लेकर गम्भीरता की कमी दिखती है। ताजा समाचार के मुताबिक विभिन्न राज्यों के पुलिस महकमे के डायरेक्टर जनरलों एवं इन्स्पेक्टर जनरल आफ पुलिस के वार्षिक सम्मेलन के दौरान हुई प्रस्तुतियों में इण्टेलिजेन्स ब्युरो के विशेष निदेशक द्वारा की गयी प्रस्तुति कई मायनों में अहम थी। (डेक्कन हेराल्ड, 20 सितम्बर 2011) अपने वक्तव्य में विशेष निदेशक महोदय ने यह कह कर काफी गर्माहट पैदा कर दी कि देश के अलग अलग हिस्सों में सामने आयी बम विस्फोटों की 16 घटनाओं के पीछे या तो हिन्दुत्व आतंकवादियों की भूमिका की जांच चल रही है या उन पर सन्देह है।

               लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता, सुभाष गाताडे, जो हिन्दी एवं अंग्रेजी में समान रूप से लेखन करते आये हैं, तथा वैचारिक पत्रिका 'सन्धान' का सम्पादन भी करते हैं, उनकी नयी किताब 'गोडसेज् चिल्डे्रन : हिन्दुत्व टेरर इन इण्डिया' GODSE's CHILDREN : Hindutva Terror in India, Pharos Media, 2011 इस दिशा में एक नयी जमीन तोड़ती प्रतीत होती है।

               किताब की प्रस्तावना दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कालेज के प्रिन्सिपल एवं संघ की राजनीति के विशेषज्ञ प्रोफेसर शमसुल इस्लाम ने लिखी है। इकतीस अध्यायों में चार सौ पेज तक फैली यह किताब,भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को खतरे में डाल सकनेवाली इस सबसे खतरनाक परिघटना पर पहले विस्तृत अध्ययन के रूप में सामने आयी है। याद रहे कि सितम्बर 2008में मालेगांव बम धमाके की महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते के प्रमुख हेमन्त करकरे की अगुआई में जो जांच चली थी, उसी के बाद इसके बारे में समूचे देश की जनता का धयान इस तरफ गया था, जिसमें प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टनेन्ट कर्नल पुरोहित, शंकराचार्य दयानन्द पाण्डे जैसे लोगों से लेकर डा आर पी सिंह, पूर्व सांसद बी एल शर्मा प्रेम जैसे शख्सियतों की सहभागिता सामने आयी थी। लेखक ने हिन्दुत्व आतंकवाद के जड़ों की विवेचना आजादी के बाद हुई महात्मा गांधी की सुनियोजित हत्या के किस्से से की है और इस बात के ठोस प्रमाण भी रखे हैं कि किस तरह नाथुराम गोडसे एवं उसके आतंकवादी गिरोह के सदस्यों के परोक्ष-अपरोक्ष रूप से महिमामण्डन की कोशिशें भी चलती रही हैं।

               लेखक की मूल चिन्ता यह दिखती है कि हिन्दुत्व आतंक के असली मास्टरमाइंड या उसके विचारक अभी भी गिरतार नहीं किए जा सके है और केन्द्र में सत्तासीन कांग्रेस सरकार भी इस मसले पर समझौताविहीन संघर्ष चलाने की स्थिति में नहीं दिखती। अपने आप को सेक्युलर कहलानेवाले दलों, संगठनों के हस्तक्षेप की सीमाओं को भी लेखक ने रेखांकित किया है,जहां वह बहुसंख्यक आतंकवाद की इस खतरनाक अभिव्यक्ति के खिलाफ कोई सशक्त,सार्थक जनहस्तक्षेप कर पाने में या उसके उभार के संकेतों के मद्देनज़र कदम उठाने में असफल रहे हैं।

               विडम्बना यही कही जाएगी कि न केवल पुलिस, जांच एजेंसियां बल्कि न्यायपालिका एवं सिविल सोसायटी का अच्छा खासा हिस्सा विषिश्ट समुदाय के इस 'आतंकवादीकरण' में या उनको 'कलंकित' (stigmatise) करने की मुहिम में शामिल रहा है। यह अकारण नहीं कि इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई में भारत की सरजमीं पर हिन्दुत्व आतंक का जो सिलसिला तारी हुआ, जिसने गोडसे की परम्परा को आगे बढ़ाया, उसके उद्धाटन में काफी वक्त जाया हुआ।

               आतंकवाद के इस एकरंगी चित्रण के हावी होने का नतीजा है कि इक्कीसवीं की पहली दहाई में हुई कई आतंकी घटनाओं में अल्पसंख्यक समुदाय से सम्बधित निरपराधों को बिना वजह झूठे आरोपों में जेलों में, गैरकानूनी हिरासत में बीताने पड़े है। जांच एजेंसियों का पक्षपाती रूख किस तरह समुदायविषेश के सदस्यों को प्रताडित करने का आसान जरिया बनता है इसकी एक प्रातिनिधिक मिसाल हम मालेगांव 2006 बम धमाके को अंजाम देने के आरोप में विगत पांच सालों से जेल में बन्द लोगों के रूप में पा सकते हैं। किताब इस पर बखूबी रौशनी डालती है। मालूम हो कि नवम्बर 2010 में गिरफ्तार हिन्दुत्व आतंकी असीमानन्द ने दिल्ली की दीपक डबास की अदालत में यह कबूलनामा दिया था कि किस तरह वह एवं उसके गिरोह के सहयोगियों ने मालेगांव 2006, मालेगांव 2008, अजमेर शरीफ, मक्का मस्जिद आदि आतंकी काण्डों को अंजाम दिया था। यह एक ऐसा कबूलनामा था जिसे अदालत में सबूत के तौरपर भी पेश किया जा सकता है। इन्साफ का तकाजा था कि सरकार 2006की आतंकी घटना में अभियुक्त बनाए गए इन निरपराधों को रिहा करने के लिए उपयुक्त कदम उठाती,मगर इसे आज तक नहीं किया गया है। जब आतंकवाद विरोधी दस्ते की अदालत के सामने इस कबूलनामे की बात रखी गयी तब उसने इसे अहम सबूत के तौर पर एडमिट तक नहीं किया। अब जबकि नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी अपनी तरफ से सीबीआई को बता चुकी है कि इनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है, तब यह उम्मीद की जा सकती है कि 30 अक्तूबर को जब यह मामला अदालत के सामने होगा तो इनकी जमानत होगी।

               हर किस्म का आतंकवाद - फिर वह चाहे हिन्दुत्व के नाम पर अंजाम दिया गया हो या जिहाद के या उसे राज्य कारकों द्वारा अंजाम दिया गया हो - को काबू में करने के लिए किताब संविधान में प्रदत्त इस बुनियादी बात को रेखांकित करती है कि कानून का राज कायम हो तब काफी हद तक इस पर नकेल कसी जा सकती है। अन्त में किताब साम्प्रदायिकता के विविध रूपों के खिलाफ समझौताविहीन संघर् पर जोर देती है। लेखक का मानना है कि अलग अलग रंगों के ''आतंकवादों'' से मुक्ति का यही एकमात्र रास्ता है।

               भारतीय राजनीति में लोकतंत्र के बेहतर भविष्य के लिए चिन्तित हर व्यक्ति के लिए इस किताब का अध्ययन आवश्यक जान पड़ता है। पुस्तक में आलेखों की पत्राकारितानुमा शैली के चलते अलग अलग लेख रूचिकर तो बन पड़े हैं, मगर जैसा कि लेखक ने अपने प्राक्कथन में स्पष्ट किया है कि मूलत: यह इस विषय के इर्दगिर्द लेखों का संकलन है, इसकी वजह विषय की प्रस्तुति कई बार उतनी प्रवाही नहीं जान पड़ती, अनावश्यक व्यवधान का सामना पाठक को करना पड़ता है। इसके अलावा किताब का मुख्य फोकस हिन्दुत्व आतंकवाद पर होते हुए भी अगर प्रारम्भिक अध्याय में धर्म के दोहन पर टिके जिहादी आतंकवाद या अन्य आस्था आधारित आतंकवाद की विस्तृत चर्चा होती तो पाठक के लिए स्थिति को समग्रता पूर्वक आकलन कर पाना आसान होता।

 
? संजीव कुमार