संस्करण: 10  अक्टूबर- 2011

क्या मोदी संस्कृति से

उबर सकेगी भाजपा ?

? सुनील अमर

               भारतीय जनता पार्टी की गत दिनों सम्पन्न शीर्र्ष बैठक ने एक बार फिर साबित किया कि वह मोदी संस्कृति से उबर नहीं पा रही है। केंद्र सरकार की कथित विफलताओं के विरुध्द मोर्चा खोलने और आने वाले दिनों में पॉच राज्यों के विधानसभा चुनाव की तैयारियों की समीक्षा हेतु बुलाई गई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की दो दिनी बैठक का पहला महत्त्वपूर्ण दिन मोदी-चर्चा की भेंट चढ़ गया क्योंकि वे सहमति देने के बावजूद बैठक में नहीं आये। भाजपा में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक नयी संस्कृति को जन्म दिया है। वह संस्कृति है स्वयं भू की, मनमर्जी की और पार्टी को ठेंगे पर रखने की। वैसे यह अनायास नहीं है। इसे विकसित करने में एक समय पार्टी ने उनकी खासी मदद की थी। अब भाजपा के उत्तरांचल और कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के क्षत्रप भी अगर इसी संस्कृति का अनुसरण कर रहे हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा! आश्चर्य तो इस बात पर है कि पार्टी दिग्गजों में सुषमा स्वराज को छोड़कर किसी और ने इस पर बोलने की जरुरत भी महसूस नहीं की। सुषमा ने भी बिना किसी का नाम लिए, महज इशारों में ही 'कुछ लोगों ' को अनुशासित रहने की हिदायत दी।

               वर् 2002 में हुए गोधारा कांड और इससे राज्य में उपजी हिंसात्मक प्रतिक्रिया में अपने प्रशासनिक 'अवदान' को लेकर श्री नरेन्द्र मोदी चर्चा में आये। उस वक्त केंद्र में भी भाजपानीत राजग की ही सरकार थी और तब राजग ने मोदी के इस कृत्य को 'हेल' किया था। वर्ष 2008 में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में जब मोदी ने दुबारा सफलता प्राप्त कर ली तो न सिर्फ उनका जादू भाजपा के सिर चढ़कर बोलने लगा बल्कि यह कहने में भी पार्टी ने कोई शर्म महसूस नहीं की कि 'मोदी स्टाइल'को पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए। पार्टी के थिंक टैंकों ने उन्हें 'माचो मैन'यानी मर्दाना पुरुष कहा!यहॉ यह याद रखना जरुरी है कि 2008के विधान सभा चुनाव में मोदी ने पार्टी के कई राष्ट्रीय दिग्गजों और उनके दिशा निर्देशों को लगभग दरकिनार करते हुए 'अपने स्व निर्मित तंत्र'के सहारे चुनाव लड़ा था। बेशक,उन्होंने गुजरात में विकास के कई काम किए थे और मुद्दत से लम्बित पड़ी कई योजनाओं को लागूकर जनाकांक्षाओं को तृप्त भी किया था, लेकिन सिर्फ इतने को ही चुनाव जीतने का कारण नहीं कहा जा सकता।

               असल में श्री मोदी ने राष्ट्रीय ही नहीं, अपनी कैबिनेट के अधिकांश मंत्रियों को भी साइड लाइन कर उनके विभाग के अधिकारियों को सीधे अपने सम्पर्क में रखा और प्रशासन पर अपनी पकड़ मजबूत की। राज्य के उद्योगपतियों को अनैतिकता की हद तक लाभ पहुॅचाया और इसी से आकर्षित होकर टाटा जैसा समूह उनकी विरुदावली गाता हुआ सिंगुर से उखड़कर गुजरात जा पहुॅचा। राज्य की लाखों स्वयं सेवी संगठनों व प्रसिध्द गरबा समितियों को उन्होंने जमकर सरकारी मदद दी और उन्हें अपना विश्वासपात्र बनाया। किस्सा कोताह कि श्री मोदी ने सरकारी धन के इस्तेमाल से अपना निजी तंत्र बना लेने के बाद कथित राष्ट्रीय नेताओं को उपेक्षित निगाह से देखना शुरु किया और सार्वजनिक रुप से कहा भी कि उन्हें चुनाव जीतने के लिए दिल्ली के किसी नेता की आवश्यकता नहीं है। श्री मोदी ने संघ की भी न मदद ली और न परवाह की। इस सबके बावजूद भाजपा ने उन्हें अपना राष्ट्रीय रोल मॉडल माना और कोशिश की कि उस वक्त हो रहे अन्य राज्यों के विधान सभा चुनावों में स्टार प्रचारक के तौर पर उन्हें भेजा जाय लेकिन इस पर बिहार के भाजपाई मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ही सबसे पहले फुल स्टॉप लगा दिया और साफ-साफ कहा कि उनके राज्य में मोदी के आने की कोई जरुरत नहीं है। बाद में,उद्योगपतियों के सम्मेलन 'वाइब्रेन्ट गुजरात ' में उन्होंने खुद को भावी प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट कराया और अभी स्व-निश्चित कथित उपवास के द्वारा उन्होंने एक बार फिर खुद को भाजपा ( या रथयात्रा को उद्यत आडवाणी!) के सिर पर खड़ा दिखाने की कोशिश की। ये सब भाजपा के लिए सिर्फ मुश्किल ही नहीं, हास्यास्पद घड़ियॉ भी थीं।

               बीते नौ वर्षों में श्री मोदी ने कई बार उक्त तरह के कई ऐसे कार्य किये जिसे भाजपा के संविधान में अनुशासनहीनता कहा जाता है। क्या आपको याद आता है कि भाजपा द्वारा उनके खिलाफ आज तक कभी कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही की गई हो? संघ को भाव न देने के बावजूद संघ उन पर फिदा रहता है! तो, तानाशाही और स्वेच्छाचारिता की यह प्रवृत्ति अगर उत्तरांचल,कर्नाटक और हिमांचल तक भाजपा में पसर रही हो तो इसमें अचरज कैसा?क्या बीते दिनों हमने देखा नहीं कि राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा तलब किए जाने के बावजूद कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने कई दिन तक दिल्ली न जाकर कैसे उन्हें सिर के बल खड़ा होने को मजबूर कर दिया था! मुख्यमंत्री का पद त्यागने की क्रिया में भी उन्होंने भाजपा को पर्याप्त शर्मसार किया।

               अब ऐसे मोदियों और येदुरप्पाओं को बंदरिया के मरे बच्चे की तरह चिपकाये टहलने वाली भाजपा जब कॉग्रेस पर भ्रष्टाचार और कुशासन का आरोप लगाकर खुद को चाल-चरित्र और चेहरा की वाहक बताते हुए पार्टी विथ डिफरेंस का शंखनाद करती है तो वह यह देखने की जहमत नहीं उठाती कि निर्लज्जता के कितने ऊॅचे मंच पर वह जा खड़ी हुई है!कॉग्रेस तो भ्रष्ट है ही,लेकिन एक भ्रष्ट को हटाकर उससे भी विकट भ्रष्ट को लाने की क्या कोई संवैधानिक बाधयता है कि जनता भाजपा को ही चुन ले? जो पार्टी अपने अदना कारकुनों को काबू में नहीं कर पा रही है क्या उससे देश की प्रशासनिक व्यवस्था को काबू में करने की उम्मीद करनी चाहिए? क्या देश की अन्य किसी भी छोटी-बड़ी राजनीतिक पार्टी में अनुशासनहीनता व स्वैच्छाचारिता को अनवरत गले लगाये रहने का भाजपा सरीखा उदाहरण देखने को मिल सकता है? आपको याद आता हो तो कृपया बतायें।

               वर्ष 2008 का गुजरात चुनाव दुबारा जीत लेने के अलावा मोदी फैक्टर ने भाजपा का कोई राजनीतिक भला किया हो,ऐसा दिखता नहीं लेकिन पार्टी-अनुशासन पर उसने वह कहर ढ़ाया है कि भाजपा अब शायद मिट के ही पुनर्जीवित हो सके! गत सप्ताह श्री आडवाणी जिस तरह नागपुर से अपमानित होकर निकले हैं, भाजपा सरीखी पार्टी में रहने का षायद यही 'लाइफ टाइम अचीवमेंट' है! अब इसके बाद क्या यह कहा जा सकता है कि देश की इस दो नम्बर की राजनीतिक पार्टी में कोई ऐसा भी है जिसकी पूरी पार्टी पर पकड़ हो? कॉग्रेस, बसपा, सपा, वामदल आदि में लगता है कि कोई एक ऐसा निर्देशक है जिसके नियंत्रण में पार्टी है लेकिन भाजपा?कितने आश्चर्य की बात है कि पार्टी में तमाम दिग्गज नेताओं का होना जहॉ उसे गंभीर और मजबूत बनाता है,भाजपा में बिल्कुल इसका उल्टा है!श्री आडवाणी, सुषमा, जेतली, गड़करी, राजनाथ, मोदी आदि ( येदुरप्पा, निषंक, नीतीश जैसों को यहॉ नहीं गिना जा रहा है ) में से कौन किसके अधीन है क्या इसे बताया जा सकता है? लेकिन एक सवाल का जबाव बताया जा सकता है कि 2002 के पहले ऐसी छीछालेदर इस द्वितीय राष्ट्रीय पार्टी की नहीं थी। 2002 के बाद के अपने चाल-चरित्र और चेहरे के बारे में भाजपा अगर कोई आत्म-चिंतन शिविर लगाकर जरा विचार करे तो शायद उसका अपना ही कल्याण हो। वैसे तो वह वक्त अभी काफी दूर है लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में अगर इसी भाजपा को मतदाताओं ने कॉग्रेस के विकल्प के तौर पर चुन लिया तो कष्टपूर्वक ही सही लेकिन यह कहने में कोई संकोच नहीं कि विश्व के इस सबसे बड़े लोकतंत्र की जनता इस व्यवस्था से पूरी तरह निराश होकर टूट चुकी होगी।


? सुनील अमर