संस्करण: 10  अक्टूबर- 2011

मोदी बनाम आडवाणी

सत्ता षडयंत्रों के युग की वापसी

? विवेकानंद

               प्रधानमंत्री पद को लेकर भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच चल रही रस्साकशी ने सत्ता षडयंत्र के उस काल की याद को जीवंत कर दिया जब सल्तनत हथियाने के लिए बेरहमी से अपनों का ही गला काट दिया जाता था। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके चाहने वालों की हरचंद कोशिश यही है कि बगावत या दबाव, कैसे भी हो, मोदी पार्टी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार्य हों। इधर, पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और उनकी सेना की कोशिश है कि मोदी को किसी तरह इसमें कामयाब न हो सकें। बात यहीं तक होती तो शायद हजम ी हो जाती, लेकिन इस कुनबे में हर दूसरा आदमी प्रधानमंत्री बनने के लिए लालायित है और सबके पास यह सपना देखने के पर्याप्त कारण भी उपलब्ध हैं।

               आडवाणी जी पार्टी के सबसे वरिष्ठ सदस्य हैं और इनके बाद नंबर आता है डॉ. मुरलीमनोहर जोशी का। यह दोनों व्यक्ति पार्टी के वरिष्ठ सदस्य होने के नाते प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार हैं। पिछले लोकसभा चुनावों में जोशी और आडवाणी के बीच प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर जुबानी जंग चलती रही थी। अंतत:आडवाणी जी बाजी मार ले गए। दरअसल, इसके पीछे जादू आडवाणी का नहीं, बल्कि गठबंधन की राजनीति का कमाल था। लेकिन इस बार चुनौती तगड़ी है,जनता द्वारा तीन बार नकारे गए कड़वे अनुभव के सामने तीन बार जनादेश पा चुका प्रतियोगी सामने है। पार्टी में नरेंद्र मोदी को लेकर भारी ईष्या भले ही हो, लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं कि उनके जितना चर्चित चेहरा ी कोई नहीं है। इसलिए आडवाणी एंड पार्टी की कोशिश उन्हें रोकने की है,जिसके लिए 'नीतिशास्त्र' के प्रयोग का संकेत आडवाणी कर सकते हैं, और अपनी प्रस्तावित रथ यात्रा बिहार से शुरू करने का ऐलान करके उन्होंने इस बात के संकेत ी दे दिए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मोदी के सबसे बड़े विरोधी हैं और एनडीए में ाजपा के बाद सबसे सशक्त पार्टी के नेता। लिहाजा चुनावों के वक्त जदयू अपनी ताकत का इस्तेमाल करेगी और जिस पर उसकी सहमति होगी,वही प्रधानमंत्री पद का भी दावेदार होगा। नीतीश विधानसभा चुनावों में अपनी ताकत भाजपा को दिखा चुके हैं। उन्होंने मोदी को बिहार में चुनाव प्रचार की अनुमति नहीं दी। भाजपा हालांकि कहती रही कि हमारे फैसले हम करेंगे,लेकिन अंतत:हुआ वही जो कुमार चाहते थे। नीतीश कुमार आडवाणी जी की महत्वाकांक्षापूर्ति का अंतिम साधन हैं, लिहाजा वे नीतीश को साधे रहेंगे।

                दूसरी ओर नरेंद्र मोदी ने जो रुख अख्तियार कर रखा है उससे लगता है कि वो हार नहीं मानेंगे। बल्कि कोई ऐसा रास्ता निकालने का प्रयास करेंगे जिससे उनकी महत्वाकांक्षा पूरी हो सके। भले ही इस राह पर कितने ही कुर्बान हो जाएं। मोदी की इस विशेषता से पार्टी ी बाकिफ है और संघ भी। वैसे भी इस बात को कौन ूला होगा कि भाजपा में स्वसत्ता को स्थापित रखने के लिए कितने उभरते नेताओं को ठिकाने लगाया गया,कितनों को पार्टी से निकाला गया और कितनों को एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल किया गया। स्वयं नरेंद्र मोदी यहां तक केवल दंगे नहीं अपने ही साथियों को रौंद कर आए हैं। क्या लोग ूल गए हैं कि संजय जोशी को किस तरह किनारे किया गया। क्या कोई इससे इंकार कर सकता है कि नरेंद्र मोदी का जिस तरह आज प्रधानमंत्री बनने का है, वैसा ही कभी गुजरात का मुख्यमंत्री बनने का था और जब संघ ने उन्हें गुजरात भाजपा का संगठन मंत्री बनाकर भेजा तब उनका सबसे पहला निशाना केशुभाई पटेल थे। आज केशुाई का नाम तक सुनाई नहीं देता। संजय जोशी तब भाजपा के संगठन मंत्री हुआ करते थे,जो मोदी को फूटी आंख नहीं सुहाते थे, क्योंकि उनके उद्देश्य और व्यवहार मोदी से एकदम उलटे थे। किसे नहीं पता कि जब आडवाणी पाकिस्तान में जिन्ना की प्रशंसा कर आए थे, तब संघ नाराज हो गया और संघ के आदेश पर संजय ने आडवाणी से अध्यक्ष पद से इस्तीफा ले लिया। जिसका खामियाजा संजय जोशी को अपना करियर तबाह करके चुकाना पड़ा। भाजपा के मुंबई अधिवेशन में एक सीडी बंटी,जिसमें एक व्यक्ति एक महिला के साथ था तथा अफवाह फैली कि यह व्यक्ति भाजपा का संगठन मंत्री संजय जोशी है। तब शायद किसी को यह पता नहीं था कि इसके पीछे असली खेल क्या है और कौन खेल रहा है, लेकिन सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की जांच जब सीबीआई ने की, तब गुजरात के एक इंस्पेक्टर बालकृष्ण चौबे ने खुलासा किया कि संजय जोशी के खिलाफ सेक्स सीडी उसने बांटी थी। सीडी नकली है,जो गुजरात में बनी है और इसे एटीएस के बड़े अधिकारी के कहने पर बनाया गया। इसमें नरेंद्र मोदी का इशारा था या अमित शाह का,अी यह खुलासा आना बाकी है। संजय जोशी की मदद हरेन पंडया और गोरधन झड़पिया करते थे,पंडया को क्या गति मिली किसी से छिपी नहीं है। आज उनकी पत्नी न्याय की तलाश में दरदर भटक रही है।

               पार्टी के इन तीन धु्रवों के अलावा यशवंत सिन्हा, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और अनंत कुमार ऐसे नाम हैं, जो चर्चा में रहते हैं। लेकिन, इनकी एनडीए में प्रधानमंत्री को लेकर स्वीकार्यता होना करीब-करीब असंव है, लेकिन ाजपा संघ के डंडे की धुन पर नाचती है और यहां गडकरी जैसे गुमनाम नेता पार्टी के अध्यक्ष बन जाते हैं, इसलिए झगड़ा शांत करने के लिए कोई ूला-बिसरा चेहरा संघ पार्टी पर थोप सकता है। लेकिन तब एनडीए के घटक दल एकजुट रहेंगे, इसमें संदेह है। कुल मिलाकर यूपीए सरकार को आत्मघात की ओर बढ़ता करार देकर मध्यावधि चुनाव की तैयारियों में जुटी पार्टी खुद अपने नेताओं की महत्वाकांक्षा की ेंट चढ़ने की ओर आगे बढ़ रही है।

? विवेकानंद