संस्करण: 10  अक्टूबर- 2011

आर्थिक लाभ की दौड़ में दुग्ध के साथ साजिश

? डॉ. राजश्री रावत 'राज'

               'अमृतं क्षीर भोजनम्' की मान्यता आदिकाल से हमारे देश में चली आ रही है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी दूधा को पूर्ण पौष्टिक आहार माना जाता है। परंतु आज आर्थिक लाभ के लालच में उसमें की जाने वाली तरह-तरह की मिलावट ने अमृततुल्य दूध को भी जहरीला बना दिया है। दूध में पानी मिलाना तो सामान्य बात थी पर अब नकली दूध यानी सिंथेटिक दूध बनाकर तो सभी मानवीय मूल्यों को तिलांजलि दे दी गई है।

               भारत में दूध के मामले में प्राचीनकाल से ही संपन्नता रही हैं। पहले जनसंख्या कम थी पर पशुधन पर्याप्त था अत: दूध का उत्पादन भरपूर हुआ करता था। श्वेत क्रांति के बाद से अब तक दूध उत्पादन अब भी कम नहीं होता हैं अपितु दूध उत्पादन के क्षेत्र में भारत की गिनती विश्व में दूसरे नंबर पर होने लगी है। ऑपरेशन फ्लड योजना, विश्व बैंक की सहायता से सघन 'दुग्ध विकास कार्यक्रम' की वजह से श्वेत क्रांति हुई। 1970 में नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड ने दूध विकास की एक योजना प्रारंभ की जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में हो रहे दुग्ध उत्पादन को शहरी क्षेत्रों से जोड़ने पर बल दिया गया।

               अब यह कार्यक्रम चौथे चरण पर है। नई आर्थिक नीतियों के अंतर्गत लघु डेयरी उद्योग के विकास के लिए अनेक कदम उठाए गए। अनेक छोटी बड़ी इकाइयां दूध इकट्ठा करने लगी और यही से दूधा में मिलावट की शुरुआत हो गई।

               दूध में मिलावट तक तो ठीक था पर सिंथेटिग दूध बनाकर दूध की गुणवत्ता पर हमेशा के लिए प्रश्नचिन्ह लगा दिया गया हैं।

               सपरेटा दूध या पनीर फाड़ने के बाद बचे पानी में या सादे पानी में सफेद रंग के लिए दुधिया पोस्टर कलर, मिठास के लिए चीन, झाग के लिए डिटर्जेंट तथा चिकनाई के लिए चर्बी या रिफाइंड ऑयल मिलाकर सिंथेटिग दूध बनाया जाता है। इन रसायनों के मानव शरीर पर कितने खतरनाक प्रभाव पड़ सकते हैं यह समझा जा सकता है। आंचलिक ग्रामीण क्षेत्रों में तो इस दूधा को और भी विषाक्त बनाया जाता है। इन रसायनो को जोहड़ के पानी से तैयार किया जाता है। जिसके पीछे यह मान्यता होती है कि इस पानी में खनिज तत्व अधिक होते हैं और दूध का स्वाद ठीक आता है।

               'आकार' नामक स्वयंसेवी संस्था द्वारा एक सर्वे कराया गया और यह पाया गया कि डेयरी उद्योग के अधिकांश प्रोसेसिंग संयंत्रो द्वारा जितना भी दूध इकट्ठा किया जा रहा है वह मिलावटी होता है। दूध को खराब होने से बचाने के लिए कारोबारी इसमें कॉस्टिक सोड़ा, चूना, कॉस्टिक पोटाश फारमालिन, यूरिया, हाइड्रोजन परॉक्साइड, बेन्जोइक एसिड और सैलिसिलीक एसिड भी मिला देते हैं। ये रासायनिक पदार्थ मानव शरीर के लिए कितने हानिकारक हैं यह अनुमान लगाया जा सकता है। ये मानव शरीर में ज़हर घोलकर उन्हें मौत के मुंह की ओर ढकेल रहे हैं।

               जिस दूध में कौस्टिक सोड़ा मिला हो तो उसके पीने से शरीर में सोडियम की मात्रा बढ़ जाती है। आर्सेनिक जैसे घातक ज़हर से और भी कई तरह के रोग हो जाते हैं। कौस्टिक सोड़ा दूध को खराब होने से तो बचाता है जो सोडियम हाइड्रोक्साइड होता है। इसमें आर्सेनिक ऑक्साइड जैसा घातक ज़हर व सीसा मिला रहता है। इनसे अल्सर, जिगर और आंतों का कैंसर, कोढ़ और पक्षाघात जैसी जानलेवा बीमारियां हो सकती है। अमेरिका की एक फारेंसिक प्रयोगशाला का यह दावा है कि शरीर में केवल चार ग्राम आर्सेनिक ही मौत का कारण बन सकता है।

               मनुष्य की संवेदना के खत्म होने का इससे बड़ा और क्या उदाहरण होगा ? मुंबई में नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड ने एक सर्वेक्षण कराया तो जो तथ्य आये उनसे यह स्पष्ट हुआ कि अमानवीयता की चरम अवस्था पर मनुष्य आज आ खड़ा हुआ है। उनके अनुसार मुंबई में दूध का व्यापार करने वाले प्रतिवर्ष गुजरात व हरियाणा से अच्छी किस्म की गाय-भैंस खरीदते हैं। इनको पैदल मुंबई लाया जाता है। मुंबई में आठ महीने इनको लैक्टेशन पीरीयड के समय रखा जाता है। क्योंकि दूधा की शुरुआत बछड़ों के होने पर ही होती है। इन्हें बछड़ों के साथ खरीदा जाता है। 8-10 दिन बाद बछड़ों को अविश्वसनीय तरीकों से भूखा मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। जानवरों को दूध देने वाली अवस्था समाप्त होने के बाद पुन:  गर्भधारण हेतु भेज दिया जाता है। इस तरह वे गाय भैंस 5-6 बार ही दूध दे पाते हैं। फिर उन्हें कसाईखाने भेज दिया जाता है। गाय-भैंस को बिना बच्चे शीघ्र व ज्यादा मात्रा दूध प्राप्त करने, हेतु हार्मोन के इंजेक्शन, ऑक्सीटोसीन और 'पिटयूटरी' लगाये जाते हैं। इंजेक्शन के कारण दूध में पशु के रक्त व हड्डियों के तत्व आने लगते हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इस प्रकार के दूध के उपयोग से बालक, बालिकाएं असमय ही परिपक्व हो जाती है। मनुष्य की प्रजनन क्षमता भी इससे प्रभावित होती है। कई दिनों के प्रयोग से नपुंसक होने का खतरा रहता है।  ऑक्सिटोसिन कृत्रिम रूप से संश्लेषक द्वारा निर्मित हार्मोन है। यह पशुओं के मांसपेशियों में जमा रहता है और ऐसे पशुओं का मांस खाने वाले मनुष्यों में पहुंच जाता है। ब्रिटेन में जब 'मैडकाऊ' बीमारी का पता चला तब पूरे यूरोप में तत्काल गोमांस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इन सारी स्थितियों से बचने के लिए सशक्त जनक्रांति की आवश्यकता है। प्रत्येक उपभोक्ता का जागरूक होना आवश्यक है। गो पालन की महत्ता को समझना होगा। जन स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान किया जाये तभी दुग्ध के खिलाफ हो रही साजिशों का अंत हो सकेगा।

                
? डॉ. राजश्री रावत 'राज'