संस्करण: 10 मई-2011

लादेन का जनक बना लादेन का हत्यारा,

 

? एल.एस.हरदेनिया

               अमरीका द्वारा ओसामा बिन लादेन की हत्या से अनेक कानूनी और संवैधानिक सवाल उठ खड़े हुए हैं। अमरीकी फौज इस तरह पाकिस्तान में घुसी मानो पाकिस्तान अमरीका का ही एक राज्य हो। शायद अमरीकी संघीय पुलिस को भी अमरीका के किसी राज्य में कार्यवाही हेतु प्रवेश करने के पूर्व कम से कम उस राज्य को सूचित अवश्य करना होता होगा।

 

               यदि बिन लादेन के मामले को निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाय तो यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान,अमरीका को लगातार धोखा देता रहा और सर्वाधिक दिलचस्प बात यह है कि अमरीका इस बात को जानता है कि पाकिस्तान उसे धोखा दे रहा है। इसके बावजूद भी अमरीका ने पाकिस्तान के विरूध्द एक शब्द भी सार्वजनिक रूप से नहीं कहा।

 

               9/11 के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने घोषणा की थी कि उन्हें बिन लादेन चाहिए-जिन्दा या मुर्दा। परंतु पूरे दस साल बीत गए और अमरीकी राष्ट्रपति की लादेन को जिन्दा या मुर्दा पाने की इच्छा पूरी नही हो पाई। लादेन की हत्या के बाद भी उसकी शक्ल देखने का अवसर अमरीकी राष्ट्रपति को नहीं मिला। अंत में लादेन की शक्ल देखने का सौभाग्य समुद्र को मिला।

 

               बिन लादेन की लाश समुद्र में फेंकने से यह संदेह करने की गुंजाइश आज भी बनी हुई है कि बिन लादेन अभी भी मारा गया है या नहीं? क्या अमरीका फौजियों को मृत बिन लादेन की सूरत देखने से भी डर लगता था? क्या वे उसके मृत शरीर की एक भी फोटो दुनिया को क्यों नहीं दिखा सके,जबकि लादेन के महल के उस कमरे को दिखाया गया,जिसमें बिन लादेन मारा गया था। उसकी दवाईयों की शीशियां भी दिखाई गईं। बताया गया है कि 40 मिनट की लड़ाई के बाद बिन लादेन को मारा जा सका। उस चालीस मिनट का एक छोटा सा दृश्य भी दुनिया को क्यों नहीं दिखाया गया?


               अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति और राष्ट्रीय हितों की कुछ ऐसी मजबूरियाँ होती है कि जिनके सामने अमरीका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र को भी सिर झुकाना पड़ता है। जब भी यह प्रश्न उठता था कि ओसाबा बिन लादेन कहां है और ऐसी शंका जाहिर की जाती थी कि वह पाकिस्तान में है तो पाकिस्तान,जोरदार ढंग से इस आरोप को नकारता था। परंतु अंतत: लादेन पाकिस्तान में ही मिला।


               यह अंदाज लगाना कठिन है कि लादेन कब से पाकिस्तान में रह रहा था। पाकिस्तान एक तरफ इस मामले में अमरीका को धोखा देता रहा वहीं ऐसा लगता है कि वह लादेन को भी धोखा देता रहा। वैसे तो पाकिस्तान ने लादेन की सुरक्षा की दृष्टि से लगभग एक किला बनाया था और यह किला भी ऐसी जगह बनाया गया था जो अत्यंत सुरक्षित जगह थी। लादेन के किले के पास ही सैनिकों को प्रशिक्षण देने वाली सैन्य अकादमी भी स्थित थी। वैसे इस संबंध में भी कुछ शंकाये की जा सकती हैं। जैसे,लादेन को एक शहर में क्यों शरण दी गई? क्यों उन्हें किसी जंगल या मरूस्थल में नहीं रखा गया? हो सकता है कि इस मामले में पाकिस्तान ने ही ओसामा बिन लादेन को धोखा दिया हो। एक तरफ उसे यह आश्वासन दिया गया होगा कि अब वह पूर्णत: सुरक्षित है व दूसरी ओर अमरीका को उसके छुपने के स्थान की सूचना दे दी गई होगी।


               पाकिस्तान ने स्वयं को लादेन के मारे जाने के अभियान से दूर रखा। यह वास्तविकता है कि यदि पाकिस्तान बढ़ चढ़कर बिन लादेन की हत्या के अभियान में शामिल होता तो उसे पाकिस्तान समेत अनेक मुस्लिम राष्ट्रों और मुस्लिम जनता का विरोध सहना पड़ता क्योंकि अनेक मुस्लिम राष्ट्र और मुसलमान,बिन लादेन को पश्चिमी राष्ट्रो के विरूध्द चल रहे संघर्ष का सर्वोच्च प्रतीक मानते थे। यदि ऐसे व्यक्ति की हत्या होती है तो उसकी आक्रोश भरी प्रतिक्रिया होनी ही थी।

 

               कहा जाता है कि मुस्लिम समाज का एक हिस्सा लादेन की हिंसक गतिविधियों का समर्थक नहीं था। इस वर्ग का कहना है कि इस्लाम,निहत्थे-निर्दोष व्यक्तियों का खून बहाने की इजाजत नहीं देता है। साधारणत:यदि कोई इस्लामिक धार्मिक नेता मारा जाता है तो अखबार उसे शहीद बताते हैं परंतु बिन लादेन की हत्या के बाद मुस्लिम मीडिया ने भी उसे शहीद नहीं बताया। इससे स्पष्ट है कि बिन लादेन इस्लामिक दुनिया में श्रध्दा का केन्द्र नहीं था। यह सोचना सही नहीं होगा कि लादेन की हत्या के साथ आतंकवादी गतिविधियाँ समाप्त हो जाएंगी। बिन लादेन सोचता था कि उसने दुनिया के सबसे ज्यादा मजबूत राष्ट्र (सोवियत संघ) को समाप्त किया है तो वह दुनिया के सर्वाधिाक शक्तिशाली राष्ट्र (अमरीका) को भी तहस-नहस कर सकेगा। वर्ल्ड ट्रेड़ सेन्टर पर हमला उसकी इसी रणनीति का हिस्सा था। वैसे बिन लादेन को आतंकवादी गतिविधिायों का प्रशिक्षण अमरीका के सहयोग से मिला था। एक समय था जब अफगानिस्तान में कम्यूनिस्ट राज की स्थापना हो चुकी थी। अफगानिस्तान की कम्यूनिस्ट सरकार को सोवियत संघ का पूरा संरक्षण प्राप्त था। यह बात अमरीका को अखर रही थी। इसलिए अमरीका ने अफगानिस्तान में कम्यूनिस्ट शासन समाप्त करने की ठान ली। अफगानिस्तान की जनता के एक बड़े तबके को भी अपने देश में सोवियत उपस्थिति अच्छी नहीं लगती थी। अमरीका ने इस स्थिति का लाभ उठाया और अफगानिस्तान की जनता के इस हिस्से को अपने जाल में फांस लिया। न सिर्फ अफगानिस्तान वरन् पाकिस्तान में भी मदरसो की स्थापना की स्थापना की गई। इसी तारतम्य में अमरीका की सहायता से अल कायदा अस्तित्व में आया। प्रारंभिक दौर में अल कायदा को अमेरिका ने 8000 मिलियन डालर और 7000 टन हथियार दिये। मदरसों में मुस्लिम नौजवानों को बताया जाता था कि कम्यूनिस्ट काफिर हैं,और उन्हें मारने वाला या मारने के प्रयास में अपनी जान दे देने वाला सीधो जन्नत जाएगा। अफगानिस्तान में कम्यूनिस्टों के विरूध्द छिड़े संघर्ष में स्वयं बिन लादेन ने भाग लिया था। धीरे-धीरे वह अल कायदा का सबसे बड़ा कमांडर बन गया। अफगानिस्तान से सोवियत सेना की वापिसी के कुछ समय बाद अल कायदा,अमरीका-विरोधी हो गया। अमरीका भी अल कायदा को अपना दुश्मन समझने लगा। एक समय ऐसा आया जब बिन लादेन अमरीका को ही नष्ट करने का सपना देखने लगा। न्यूयार्क पर हमला इसी महत्वाकांक्षा से प्रेरित था। अब बिन लादेन अमरीका का सबसे बड़ा दुश्मन हो गया। अमरीका ने उसकी खोज प्रारंभ की। उसे खोजने के लिए अमरीका ने पाकिस्तान को 50 मिलियन डालर दिये। बिन लादेन और अलकायदा की ओर से भी अमेरिका पर एटमी हमले की धमकी दी जाने लगी। अलकायदा जिस देश में अपनी शाखा नहीं खोल पाता था वहां उसने संबंधित देश की किसी संस्था को अपना फ्रेंचायजी बनाना प्रारंभ कर दिया। इससे अमरीका की चिंता बढ़ी और लादेन की तलाश और जोरदार ढंग से की जाने लगी। अंतत: बिन लादेन अमरीका के लिये भस्मासुर ही सिध्द हुआ।

 

 
? एल.एस.हरदेनिया