संस्करण: 10 मई-2011

मॅहगाई और विकास कैसे चले साथ साथ ?

? डॉ. सुनील शर्मा

              मॅहगाई से परेशान देशवासियों को राहत देने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी ओर से महत्तवपूर्ण कार्यवाही कर ही डाली। इसके तहत रिजर्व वैंक ने अपनी दरों रेपो और रिवर्स रेपो में वृद्वि कर दी,अब रेपो दर 7.25 फीसदी हो गई और रिवर्स रेपो दर 6.25 फीसदी हो गई ।रिजर्व बैंक के इस कदम से बैंको में बचत खातों में जमा पर ब्याज दर तथा उधार पर ब्याज दर बढ़ना तय है। जिससे आम आदमी बैंको में अब ज्यादा पैसा जमा करेगा तथा बढ़ी हुई ब्याज दरों पर उधार लेने में भी संकोच करेगा अर्थात बाजार में मुद्रा की कमी आ जावेगी। बैंक ऋण से घर बनाने की चाहत रखने वाले फिलहाल घर बनाने का काम रोक देना चाहेंगें।

               वाहन खरीदने वाले वाहन खरीदने की योजना स्थगित कर देंगे। इसका असर से होगा कि बाजार में भवन निर्माण सामग्रियों की बिक्री कम होगी,सीमेंट और लोहा फैक्टरियों का काम घट जाएगा हो सकता है तात्कालिक रूप से अल्प मात्रा में इनके दाम घट जाए?ऐसा ही वाहन निर्माण क्षेत्र में भी संभव है। लेकिन इससे इन फैक्टरियों में श्रमिकों की छॅटनी की नौबत आ सकती है। निर्माण कार्यो में कमी से स्थानीय स्तर पर भी बेरोजगारी बढ़ना तय है,इससे आम आदमी का हाथ और तंग होगा तथा बाजार में खरीदारी का अभाव रहेगा। बचत के मामले में पहले से ही सजग भारतीय बैंक जमा दरें बढ़ने से अब से और भी ज्यादा मुद्रा बैंक में रखेगें जिससे भी उपभोक्ता सामग्री की खरीद फरोख्त में भी गिरावट संभव है इससे इनके निर्माण से संबंधित उपक्रमों में भी संकट के बादल छा सकते है। निश्चित रूप से रिजर्व बैंक के इस कदम से भारतीय बाजार मुद्रा की किल्लत महसूस करेगा और मुद्रा संकुचन से बाजार का विकास रूक जाएगा।

               पूजी बाजार जिसमें कि मात्र सात आठ भारतीय फीसदी भारतीय अपनी आय का दस फीसदी से भी कम हिस्सा लगाते हैं,इसमें भी गिरावट आएगी क्योंकि भारतीय मानसिकता सुरक्षित निवेश और बचत की है। मुद्रास्फीति से बेखबर भारतीय अपना पैसा अलमारी रखना ज्यादा अच्छा समझता है।उल्लेखनीय है कि भारतीय अपनी जमा पूजी का बड़ा हिस्सा नगद रूप में रखतें है और ग्रामीण भारत में तो 41.7फीसदी बचतें नगद के रूप में रखी जाती। भारतीय अपनी बचत का 35फीसदी हिस्सा बैंको में जमा करना पसंद करता है जबकि बैंक दरें हमेशा मुद्रास्फीति से परास्त होती हैं।इस तरह अधिकांश भारतीय जब निवेश से मुद्रा के निर्माण से अनिभिज्ञ हैं या इसे असुरक्षित समझतें हैं,ऐसे में मॅहगाई से राहत के लिए रिजर्व बैंक का यह कदम दीर्घकालिक स्तर पर फायदेमंद नही हो सकता है।

               क्योंकि मॅहगाई एक वैश्विक समस्या है,विश्व व्यापार समझौता स्वीकार करने के बाद हमें दुनिया के बाजार से कदमताल करना ही होगा।कच्चे तेल और पाम आयल के लिए वैश्विक कीमतें स्वीकार करना अपरिहार्य हैं।इन्हें सस्तें में बॉटना आत्मघाती ही होगा। हमारे जनजीवन को खाद्यान्न की मॅहगाई सर्वाधिक प्रभावित करती है।अगर हम मुद्रास्फीति के वैश्विक ऑकड़ों की बात करें तो खाद्यान्न के मामले में हमारे देश का ऑकड़ा अब भी दुनिया के तमाम विकासशील देशों की तुलना में नीचे है। नवम्बर 2010में ब्राजील में खाद्य मुद्रास्फीति 9.2फीसदी रही है जबकि ठीक एक वर्ष पूर्व 3.3 फीसदी थी। नवम्बर 2010 में ही चीन मे खाद्य मुद्रास्फीति 11.7 फीसदी थी जबकि ठीक एक वर्ष पूर्व 3.2 फीसदी थी। इसी कालानुक्रम में इंडोनेशिया में ये दरें क्रमश:13.2 और 4.7 फीसदी रहीं है।लेकिन इसी कालावधि में हमारे देश में ये दरें उलट 5.4 और 17.6 फीसदी रहीं है। आधार वर्ष 2004-05 पर वर्षानुवर्ष दिसंबर 2010 में घरेलू खाद्य मुद्रास्फीति 8.6फीसदी जबकि वैश्विक खाद्य मुद्रास्फीति 25.3फीसदी पर थी। मुद्रास्फीति और मंहगाई के बीच आम भारतीय की आय भी बढी है। 2010-11में स्थिर कीमतें पर प्रति व्यक्ति आय 36003रूपए है जो कि गत वर्ष की प्रतिव्यक्ति आय 33731 रूपए से 6.7 फीसदी अधिक है। देश में जारी कल्याणकारी योजनाओं के कारण अब लगभग दो तिहाई आबादी सस्ते खाद्यान्न योजना की पात्र होने वाली है और एक दिन की मजदूरी की कीमत पर महीने पर का राशन मिल जाएगा ऐसे में खाद्यान्न की मॅहगाई अधिकांश आबादी को त्रास नहीं दे पाएगी। मॅहगाई मुक्ति के मौद्रिक उपायों की बजाए जरूरत इस बात की है कि लाभकारी रोजगार पैदा हो जिससे आम आदमी के हाथों में पैसा आ सके जिसे वह पुन: बाजार के प्रवाह में लगा दे।हमारा दर्शन कहता है कि धन की तीन गति- दान,भोग और नाश होती हैं। अगर व्यक्ति अपनी आय को दान अर्थात परोपकार में लगाता है एवं उपभोग करता है तो इससे मुद्रा बाजार के प्रवाह में आती है और सृजन का साधान बनती है। लेकिन वह ये दोनों कार्य नही करता है एवं मुद्रा का संग्रह करके बाजार में आने से रोकता है तो इससे लगातार अवमूल्यन के जरिए मुद्रा नष्ट हो जाती हैं । वास्तव में रिजर्व के वे तमाम कदम जो मुद्रा को बाजार के प्रवाह में आने से रोकना चाहते हैं वो मुद्रा की तीसरी गति की ओर अग्रसर कर देश के विकास को रोकने वाले है।बचत के लिए विख्यात हम भारतीयों के लिए जरूरी है कि उन्हें अपनी बचत को बाजार के प्रवाह में लाने के लिए तैयार किया जाए।इसके लिए भारतीय पूजी बाजार की अच्छाइयों और इसमें सुरक्षित निवेश के तरीकों का प्रचार प्रसार किया जाए। हर एक भारतीय की मानसिकता है कि उद्योग एवं व्यापार में अच्छा लाभ होता है,लेकिन हर आदमी ये काम नहीं कर सकता है।परन्तु पूजी बाजार के जरिए वह इनमें भागीदार जरूर हो सकता है। अत:भारतीय पूजी को बाजार में प्रवाह के तमाम प्रयास होना चाहिए इससे निर्माण यानि विकास,रोजगार और उपभोग तीनों में वृध्दि होगी। लेकिन इनमें मुद्रास्फीति और मंहगाई रूकावट नहीं बन पाएगी।


? डॉ. सुनील शर्मा