संस्करण: 10 मई-2011

सभ्य और बर्बर समाजों के सजा प्रावधानों का फर्क!

? अंजलि सिन्हा

               दिल्ली की एक सत्र अदालत में 15 वर्षीय एक बच्ची के साथ उसके सौतेले पिता द्वारा बलात्कार की घटना की सुनवाई के दौरान जज ने कहा कि विधिविशेषज्ञों द्वारा ऐसे बलात्कारियों के बन्धयाकरण यानि उन्हें नपुंसक बनाने के प्रावधान के लिए कानून बनाने पर विचार करना चाहिये। शल्य चिकित्सा या रासायनिक प्रक्रिया द्वारा ऐसे पुरुषों को ऐसा बना देना चाहिए कि वे फिर ऐसे अपराध करने के काबिल ही नहीं रहें। उक्त अपराधी को 10 साल के कारावास के साथ ही 25 हजार रूपया जुर्माना देने के लिए भी निर्देश दिया गया है।

 

               यूं तो जज की बेचैनी और क्रोधा को आसानी से समझा जा सकता है। उनके सामने अक्सर ही ऐसे केस आते होंगे जो अपराधी पुरुषों की बर्बर हरकतों एवं पीड़ित की पीड़ा से रूबरू कराते होंगे। खास तौर पर जब अबोध बच्चियां इसके शिकार होती हों तो यह अधिक चिन्तनीय मसला बन जाता होगा। वैसे यह सब तब और गम्भीर हो जाता है जब आत्मीय समझा जाने वाला या जानकार इस कृत्य को अंजाम देता है। घर आंगन जब इतना असुरक्षित हो जाय तो बचकर कोई और कहां जाए ?

 

               और यह किसी जजविशेष का मामला भी नहीं है। बलात्कार की दिनेंदिन बढ़ती घटनायें अब लोगों को उद्वेलित कर रही हैं। न्यायविदों के अलावा समाज का प्रबुध्द समुदाय भी बचाव के विकल्पों पर विचारमंथन करता है। इन्ही उपायों में कभी मृत्युदण्ड, कभी उम्र कैद की अवधि बढ़ाने या फिर सार्वजनिक रूपसे फांसी की सज़ा आदि सुझाव आते हैं। बन्धयाकरण जैसे सुझाव इसके पहले भी कुछ संस्थाओं या समाज के कुछ हिस्सों की तरफ से आते रहे हैं।

 

               मुद्दा यह है कि क्या पुरुषों के पौरुष खतम करने से दूसरे सम्भावित बलात्कारियों को वाकई भय होगा?यदि ऐसा होता तो मौत की सजा वाले अपराधो पर काबू पाया गया होता। दरअसल मौजूदा कानून के तहत भी दोषियों की गिरफ्तारी और सजा की दर काफी कम है। जितनी बड़ी संख्या में अपराध होता है उतनी बढ़ी संख्या में न तो पीड़ित शिकायत के लिए पहुंचती हैं और न ही जो शिकायत करती है उन्हें न्याय की गारन्टी होती है। इन दोनों का कारण हमारे यहां की टेढ़ी और लम्बी न्यायिक प्रक्रियाएं हैं तथा सामाजिक दबाव और लोकलाज का भय पीड़ितों को शिकायत करने से रोकता है।

 

               अतएव पहला मुद्दा तो यह है कि बलात्कार जैसे अपराध के लिये पूरी न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने की जरूरत है। तथा पीड़ितों को फिरसे परेशान करने वाले प्रावधानों को समाप्त किया जाना चाहिए। जैसे की अबतक बलात्कार की पुष्टि के लिए मेड़िकल टेस्ट में फिगर का इस्तेमाल होता है। पिछले दिनो इस प्रकार की जांच प्रक्रियाओं का काफी विरोध हुआ था। फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग भी बहुत बार हो चुकी है। कुछ विदेशी महिलाओं के पीड़ित होने पर जरूर ऐसा कोई कोर्ट बिठाया गया लेकिन यहां की महिलाओं के साथ केस और सुनवाई वैसे ही सालों लटके पड़े रहते है। ऐसे में कम ही पॣड़ित शिकायत करने का साहस जुटा पाते हैं।

 

                हमारा समाज महिलाओं के लिये कितना असुरक्षित है इसे देखते हुए यह भी स्पष्ट है कि ऐसे मामलों में न्याय की रफ्तार भी बहुत धीमी होती है। पिछले दिनों की बात है कि दिल्ली के एक कोर्ट में हाल में सामूहिक बलात्कार के दो आरोपियों को बरी कर दिया क्योंकि कहा गया कि पीड़िता ने कोर्ट में आरोपियों को नहीं पहचाना तथा अपना बयान बदल दिया। पीड़िता के परिवारवालों ने भी सहयोग नहीं किया। अदालत मामले को आगे बढ़ाये इसकी अब कोई वजह नहीं बची थी क्योंकि अब पीड़ित परिवार की इसमें रूचि नहीं बची थी। इसके पहले भी ऐसे केस आए है जहां पीड़िता द्वारा बयान बदल देने से आरोपियों के बरी होने का मामला सामने आया है।

 

               इसकी वजह साफ है कि एक तो कानूनी प्रक्रियाओं में ऐसे छेद हैं जिनका फायदा आरोपी उठा लेते हैं जैसेकि कलमबन्द बयान जो पीड़िता से लिया जाता है और जो केस को आगे चलाने के लिए जरूरी होता है,वही देरसे लेना तथा इस बीच पीड़ित पक्ष को डराने-धामकाने,लालच देने आदि का मौका मिल जाता है। कई बार यह देखने में आया है कि ऐसी देरी में पड़ रहे दबाव,मिल रहे प्रलोभन के चलते लड़की अपना बयान ठीक से दर्ज नहीं करती है और सन्देह का लाभ देकर आरोपी के बरी हो जाने का रास्ता खुलता है। पीड़िता के परिजन भी कई बार दबाव व लालच का शिकार हो जाते हैं तथा पीड़िता पर अपना बयान बदलने के लिए दबाव बनाते हैं। कई मामलों में तो यह भी होता है कि मेडिकल परीक्षण में बलात्कार की पुष्टि हो जाने के बाद भी,विभिन्न परिस्थितिजन्य सबूतों के बावजूद भी पीड़िता के विरोधाभासी बयानों के आधार पर आरोपी छूट जाता है।
 

               दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह विचार करने का है कि किसी भी सभ्य होते समाज में सजा के मध्ययुगीन तरीकों को कैसे सही ठहराया जा सकता है। अपराधी का अपराध निश्चित ही छोटा नहीं है लेकिन सभ्य समाज जब सोच-समझ और विचार कर के सजा देगा तो वह भी सख्त तो हो सकता है लेकिन क्रूर और बर्बर नहीं। पहले के समय में कई प्रकार के अपराधों के लिए हाथपैर ,नाक, कान काट दिये जाते थे या इसी प्रकार क्रूरता की जाती थी ताकि दहशत फैलाकर अपराध पर काबू पाया जा सके। अब तो कई देशों ने अपने यहां मौत की सजा का प्रावधान भी समाप्त कर दिया है। इसका अर्थ कतई यह नहीं है वहां अपराध करने की छूट है।
 

               वैसे यह उदाहरण भी इस समय दिया गया है कि कई विकसित कहे जाने वाले देशों में बलात्कार की सजा के लिए बन्धयाकरण का प्रावधान है। जैसे अमेरिका,ब्रिटेन,जर्मनी आदि में यह विकल्प है। लेकिन विकसित होने का पैमाना सभ्य होने की पुष्टि नहीं करता है। यदि ऐसा होता तो विकसित और सुपरपावर माने जाने वाले अमेरिका द्वारा इराक में स्थापित अबू गरेब जेल में कैदियों के साथ जो अमानवीय तथा संवेदना को कुन्द कर देनेवाला बर्बर कृत्य का हवाला दुनिया भर की मीडिया में सूर्खियां बना वह नहीं होता। उस देश ने भी अपने यहां मौत की सजा को भी बरकरार रखा है। दुनियाभर के बाजारों तथा विकासशील तथा अविकसित समाजों से लूटकर यदि वह अपने देश के नागरिकों को कुछ सुविधाएं अधिक दे देता है तो इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि वह सभ्य भी हो गया है। इस मामले में उससे नहीं सीखना ही बेहतर होगा।
 

               कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बलात्कारियों का अंग भंग करना या उसे मार ड़ालना समाधान नही है बल्कि सख्ती से वे जेल के अन्दर रहे तथा उम्रकैद की अवधि भी बढ़ा दी जानी चाहिए। उन्हें जेल के अन्दर भी बैठाकर खिलाने के बजाय उनसे श्रम कराया जाना चाहिये तथा उससे उत्पादित या बने वस्तुओं आदि जनहित में इस्तेमाल हो। दूसरा महत्वपुर्ण मुद्दा यह है कि अपराध के बचाव का जिसमें अपराधी प्रवृत्ति या व्यवहार का जन्म ही न हो । यानि लोग अधिकाधिक सभ्य ,संवेदनशील तथा दूसरों का सम्मान करनेवाले बने। हर व्यक्ति की अधिकारों के प्रति यदि चेतना बढ़ती है तथा महिला समुदाय को बराबरी मिलती और वह सशक्त होती है तो उसके खिलाफ अपराधा कम होंगे। पूरे समाज में चेतना और जागरूकता के साथ ही न्यायिक सक्रियता और सख्ती तथा चुस्त पुलिस प्रशासन समस्या से बचाव एवम् निराकरण के उपाय हो सकते हैं।


? अंजलि सिन्हा