संस्करण: 10 मई-2011

इस साल गेहूं का फिर ज्यादा उत्पादन
म.प्र. में भण्डारण की समस्या गेहूं सड़ने की नौबत
 

? राजेंद्र जोशी

                इस वर्ष देश में 8 लाख हेक्टेयर में गेहूं की बोवनी में वृध्दि होने से उत्पादकता में भार वृध्दि को दृष्टिगत रखते हुए फिर से नये गेहूं की भण्डारण समस्या पैदा हो गई है। गेहूं की फसल अच्छी होने से अनेक राज्यों में विगत वर्ष की तरह फिर भण्डारण की समस्या जस की तस बनी हुई है। राज्यों में जिनमें उ.प्र.,राजस्थान,गुजरात,बिहार में गेहूं समर्थन भाव से नीचे बिक रहा है,वह भी बोनस की घोषणा के पहले। बोनस को जोड़कर तो भावों का उतार और अधिक हो जायगा। केंद्र सरकार द्वारा बोनस दिए जाने पर यदि राज्य सरकार किसानों के खाते में बोनस राशि जमा करवा देती है तो म.प्र.के किसानों की गेंहूं पर 150रुपये का बोनस मिल जायगा। जो कि एक रिकार्ड होगा। राज्य सरकार को इस आशय की घोषणा करना होगा क्योंकि इससे किसानों को ही लाभ पहुंचेगा। इस वर्ष गेहूं उत्पादन में 30से 35लाख टन अधिक होने की संभावना दर्ज की गई है।

               सरकार के सामने गेहूं के भंडारण की समस्या मुंह बाये खड़ी है। पिछले साल से ज्यादा बड़ी समस्या भंडारण की इस वर्ष आने वालशी है। क्योंकि अभी तो पिछले वर्ष का अनाज भी भरा पड़ा हुआ है।

               अन्य राज्यों की तरह मध्यप्रदेश में भी गेहूं खरीदी जोर-शोर से शुरू हो चुकी है। भारी मात्रा में गेहूं का स्टाक भी हो चुका है। राज्य में अनेक राज्यों की तरह त्यौहारों की वजह से मंडियों,बैंकों में अवकाश आने से खरीदी की गति धीमी हो गई है। मंडियों में रविवार का अवकाश छोड़कर बाकी सामान्य दिनों में तेजी से कामकाज शुरू करने की व्यवस्था कर दी गई है ताकि मंडियों में खरीदी का प्रतिशत बढ़ सके। जहां तक केंद्र सरकार द्वारा किसानों को 50 रु. कर देने का सवाल है,इससे पूर्व ही कुछ राज्यों में किसानों ने बाजार भाव में लाखों बोरी गेहूं बेच दिया है। जो किसान पूर्व में अपना गेहूं बाजारों में बेच चुके हैं उन्हें बोनस की स्पष्ट घोषणा के बाद बोनस का लाभ बिल्कुल नहीं मिल पायेगा। कतिपय राज्यों में बोनस का लाभ मिलने के पूर्व नीचे भावों पर गेहूं बेचने से किसान भाइयों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

               मध्यप्रदेश के किसान भाइयों को गेहूं का बिक्री भाव रु.1120पर सौ रुपये बोनस देकर 1220रु.से भुगतान किया है। केंद्र सरकार मध्यप्रदेश को 1170रु.के भाव से भुगतान करेगी। देखना यह है कि म.प्र. सरकार केंद्र सरकार से मिलने वाले बोनस को किस प्रकार समायोजित करती है। सामान्यत: केंद्र सरकार म.प्र. को 1170 रु. के मान से भुगतान करती है तो 50रु.का लाभ समर्थन भावों का गेहूं तौलने वाले किसानों को मिलना चाहिए। म.प्र. के किसानों को गेहूं का बिक्री भाव 1270 रु.मिल सकता है जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में सर्वाधिक होगा। उत्पादन में वृध्दि से प्रदेश के किसान भाइयों की लाटरी तो खुल गई है किंतु सही मायने में उसका लाभ उसे तभी मिल पायेगा जब 50 रु.बोनस की राशि उनके खातों में जुड़ जायेगी।

               बोनस की घोषणाओं से जहां किसानों को लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है,वहीं सबसे बड़ी समस्या म.प्र. जैसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य के समक्ष अनाज भण्डारण की समस्या पैदा हो गई है। भण्डारण व्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में राज्य सरकार ने पिछले साल के अनुभवों को अभी तक दरकिनार कर रखा है,वहीं स्थिति फिर होने जा रही है जब गेहूं खेतों से खलिहानों में आकर गोदामों या वेयर हाऊसों में नहीं पहुंच पा रहा है क्योंकि भण्डारगृहों में पिछले वर्ष का गेहूं ही भारी मात्रा में भरा पड़ा हुआ है। नई आवक के लिए उन भण्डार गृहों में जगह ही नहीं है। गेहूं किसानों के खलिहानों में पड़ा-पड़ा भण्डारण के मामले में किसान भाइयों की नींद हराम कर रहा है। ज्ञात हुआ है कतिपय मंडियां भण्डारण की कमी को देखते हुए गेहूं खरीदी अब बंद करने जा रही है।

               सरकार किसान भाइयों के कल्याण के लिए डींग तो बड़ी हांकती रहती है किंतु उत्पादन में वृध्दि के बाद जो भण्डारण समस्या है,उसको अभी तक नज़र अंदाज करती आ रही है। पिछले साल जब खेतों में,खलिहानों में यहां तक खुली जगहों में गेहूं के बोरे पड़े रहे तब सरकार को काफ़ी नीचे देखना पड़ा था। लेकिन राजनैतिक सत्ताओं के तो ऐसे हालातों के लिए अपना बचाव करते हुए प्रशासनिक अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराकर उनके सिर दोष मढ़ती रही है। विगत वर्ष म.प्र. में यही दृश्य उत्पन्न हो गया था। ऊपर से लेकर नीचे तक मंत्रियों और पार्टी के नेताओं ने भण्डारण क्षमता के प्रति अपनी अक्षमता को छुपाकर कलेक्टरों और संभागायुक्तों की खिंचाई कर दी थी। अनुशासन और मर्यादाओं में बंधो प्रशासनिक अधिकारों को किसान भाइयों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहरा दिए जाते रहे और सत्ता संचालकों ने किसी भी अक्षमता से अपने आपको बचा लिया। प्रशासनिक अधिकारियों ने विगत वर्ष भण्डारण की दुर्दशा पर नीचे के अमलों को कसा, खूब बैठकें आयोजित की। प्रशासनिक आदेश जारी किए गये कि प्रदेश में भंडार गृहों की क्षमता और संख्या बढ़ाई जाय। निर्देश दिए गये कि भंडार गृह प्रत्येक गांवों में सुनिश्चित किए जायं और देखा जाय किसान भाइयों का कोई अहित न हो और अनाज को सड़ने से बचाया जा सके।

              इस वर्ष भण्डारण समस्या और भी विकराल हो गई है किंतु ऐसे कई गांव है जहां गेहूं की आवक तो खूब बढ़ी है किंतु वहां अभी तक एक भी नया भण्डार गृह नहीं बन पाया है। उल्टे पिछले भण्डार गृहों में भी जगह नहीं है। यह सत्ता का एक अदूरदर्शिता का ही परिणाम है। सत्ताधीश अपने आपको किसानों का हितैषी तो खूब बताते हैं भाषणों में अपनी खूब वीरता प्रदर्शित करते रहते हैं किंतु जमीनी हकीकत से उनकी दूरी बनी रहती है। म.प्र. में पिछले दिनों जब किसान भाइयों की हड़ताल से सरकार हिलहिला गई थी तब किसान भाइयों के प्रति जो प्रेम,हमदर्दी और किसान भाइयों से बेटे-भाइयों का रिश्ता जोड़-जोड़कर अपनी जुबान खूब चलाते रहे। अब गेहूं की फसल आ चुकी है फिर से किसानों के प्रति ग्लीसरीनी आंसू बहाने का क्रम किसान-पुत्रों की ओर से शुरू हो जायगा और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को कोसा जायगा। किसान भाई फिर से उसी तरह के दुर्दिनों की चिंता में डूब रहा है क्योंकि उनके दरवाजे पर गेहूं के बोरे खुले में पड़े पड़े दस्तक दे रहे हैं और चीख रहे होंगे। किसानों के प्रति,उपभोक्ताओं के प्रति अदूरदर्शिता के ऐसे दुष्परिणाम से ही सत्ताधारियों को अपनी राजनैतिक चाले चलने का अवसर मिलने लगता है।


? राजेंद्र जोशी