संस्करण: 10 मई-2011

खेलों को ग्लैमर की
बैसाखी क्यों चाहिए ?

? डॉ. गीता गुप्त

               एक जून से महिला बैडमिण्टन खिलाड़ियों के लिए ग्रॉ प्री टूर्नामेण्टों में स्कर्ट पहनने का नया नियम लागू किया जाने वाला है। पहले यह नियम एक मई से लागू होने वाला था परन्तु वर्ल्ड बैडमिण्टन फेडरेशन के उपाधयक्ष पैसन रैग्सिकिफो ने खिलाड़ियों की राय जानने के लिए उक्त तिथि में बदलाव किया। उनका यह भी मानना है कि महासंघ लम्बे समय से टूर्नामेण्टों को अधिक आकर्षक बनाने के लिए महिला खिलाड़ियों को ऐसे परिधान पहनने के लिए ज़ोर दे रहा है जिससे वे अधिक आकर्षक लगें। ऐसे में,प्रश्न यह है कि महिला खिलाड़ियों का आकर्षक दिखना अधिक महत्वपूर्ण है या फिर उनके खेल का उत्कृष्ट होना ?और यह भी कि दर्शक खेल देखना चाहते हैं या महिला खिलाड़ियों के सौन्दर्य का रसपान करना ?


                निस्सन्देह,खेलों की अपनी प्रकृति,अपने नियम होते हैं,तदनुकूल आचार-व्यवहार,वेशभूषा और खानपान का भी विशेष महत्व होता है। जिसका अनुशीलन खिलाड़ियों के लिए अनिवार्य है। लेकिन खिलाड़ियों में ऊर्जा,खेल-तकनीक का ज्ञान,शारीरिक सौष्ठव और खेल-प्रदर्शन की क्षमता का होना सर्वाधिक आवश्यक है,फिर चाहे वे महिला हों या पुरुष। हम फुटबॉल,हॉकी,क्रिकेट,बैडमिण्टन,टेनिस,वॉलीबॉल आदि खेलों की बात करें या एथलेटिक्स,तैराकी,रायफल-शूटिंग जैसी स्पर्धाओं की,सबमें समान रूप से महिलाओं की भागीदारी है। फिर पोशाक को लेकर उनके प्रति दुराग्रह क्यों ?टेनिस या बैडमिण्टन महिला खिलाड़ी स्कर्ट ही क्यों पहने-पुरुष खिलाड़ियों की तरह शार्ट क्यों नहीं ?खेल में यह भेदभाव क्यों ?जबकि सभी जानते हैं कि टेनिस और बैडमिण्टन खेलते समय जिस तरह बार-बार दायें-बायें और नीचे झुकना पड़ता है उसमें स्कर्ट जैसी पोशाक में अभद्रता का प्रदर्शन ही होगा।

 

               यहाँ भारतीय टेनिस सितारा सानिया मिर्ज़ा का प्रकरण स्मरणीय है। लम्बे समय तक सानिया को अपने मिनी स्कर्ट के कारण आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा था। धार्मिक नेताओं ने भी उनके वेश-विन्यास पर टिप्पणियां की थीं जिससे सानिया को तो मानसिक क्लेश हुआ ही होगा। उनके परिजनों को भी अप्रिय कटाक्ष झेलने पड़े होंगे। अस्तु,यह विचारणीय है कि आख़िर खेल में ग्लैमर के समावेश का क्या औचित्य है ?इस बात में कोई सच्चाई नहीं है कि खेलों का आकर्षण घट रहा है। बेशक,विभिन्न खेलों के प्रति क्रिकेट की तरह रुझान नहीं है। पर यह आवश्यक तो नहीं है कि समूचा विश्व समान रूप से सभी खेलों में रूचि ले। क्रिकेट भारतीय खेल नहीं है फिर भी लोगों में उसके प्रति दीवानगी पैसों के कारण है और अब 'चीयर गर्ल्स' को मैदान में उतारकर कोमलांगियों के मांसल सौन्दर्य के सहारे इस खेल को मनोरंजक बाज़ार में तब्दील कर दिया गया है,जहां लोग पैसा फेंककर खेल के साथ-साथ फूहड़ तमाशा भी देख सकेंगे। इण्डियन प्रीमियर लीग में भी यही हो रहा है। 'चीयर गर्ल्स' को यहां 'चीयर क्वीन्स' का नाम दिया गया है जो खेल-दर्शकों के लिए 'आई टॉनिक' का काम करेंगी।
 

               उल्लेखनीय है कि भारत में तो क्रिकेट विश्व कप का खुमार इस क़दर छाया कि अभिनेत्री मिंक सिंह ने अपनी निवर्सन पीठ पर टैटू बनवाकर भारतीय टीम को शुभकामनाएं दीं। वहीं मॉडल पूनम पाण्डेय ने भारतीय टीम द्वारा विश्व कप जीतने पर सार्वजनिक तौर पर निर्वस्त्र होकर खुशी मनाने की घोषणा की थी। यह निर्लज्जता पूर्ण घोषणा और देह-प्रदर्शन खेल में ग्लैमर का तड़का ही तो है जो महिला खिलाड़ियों के लिए गले का कांटा साबित हो सकता है। क्योंकि वे अलग-अलग पृष्ठभूमि,सांस्कृतिक परिवेश और देशों से आती हैं। कुछ देश बहुत रूढ़िवादी हैं अत:खिलाड़ियों को आकर्षक दिखने के नाम पर यदि स्कर्ट या कोई आपत्तिजनक परिधान धारण करने के लिए बाध्य किया गया तो वे खेल से विमुख हो सकती हैं। इसलिए कि वे फ़िल्मी तारिकाओं की तरह व्यर्थ देह-प्रदर्शन में आस्था नहीं रखतीं। उनकी आस्था सिर्फ़ खेल में होती है।

 

               ग़ौरतलब है कि भारत में क्रिकेट अब खेल नहीं है, यह विशुध्द मुनाफ़े का व्यवसाय बन चुका है। इसमें अपार दौलत है। यह जुआ है और जुनून भी। यहां क्रिकेटर बिकते हैं। बाक़ायदा बोली लगाकर ग़ुलामों की तरह उनकी ख़रीद-फरोख्त होती है। फिल्म (ग्लैमर) और उद्योग जगत की हस्तियों ने यह आधुनिक दास-परम्परा विकसित की है जिसमें हमारे लोकतंत्र के पुरोधाओं को कोई बुराई नहीं दिखती। निश्चय ही खेलों में ग्लैमर के समावेश का विचार उन्हीं 'प्रभुओं' के दिमाग़ की उपज होगी जो दौलत की खेती के लिए क्रिकेटरों को ख़रीदकर उनसे गुलामी करवाते हैं। मैदान पर खेल उन्हें विशुध्द आनन्द नहीं देता। इसके लिए उन्हें सस्ता व बाज़ारू किस्म का मनोरंजन चाहिए। यही मनोरंजन 'चीयर गर्ल्स' और 'चीयर क्वीन्स' की देन है जिसे हमारे खेल मंत्रालय के आकाओं ने सहर्ष अनुमति प्रदान कर अपने सांस्कृतिक पतन का परिचय दिया है। यद्यपि संविधान की धारा 294 के तहत सार्वजनिक स्थल पर अश्लील कृत्य का प्रदर्शन दण्डनीय अपराध है,यह जानकारी बी.सी.सी.आई को तो होनी ही चाहिए।

 

               बहरहाल,यदि बैडमिण्टन महिला खिलाड़ियों के लिए स्कर्ट पहनने की अनिवार्यता को खेल में ग्लैमर की पहलक़दमी माना जाए तो प्रश्न ये है कि क्या अब खेलों के दिन लद गए और उनके अस्तित्व की रक्षा के लिए स्त्री को अपनी मर्यादा की आहुति देनी पड़ेगी ?यदि ऐसा नहीं है तो सिर्फ़ महिला खिलाड़ियों के लिए ड्रेस-कोड का फ़तवा क्यों ? और 'चीयर गर्ल्स' या 'चीयर क्वीन्स' की तरह 'चीयर बॉयज़' और 'चीयर किंग' क्यों नहीं ?
 


? डॉ. गीता गुप्त