संस्करण: 10 मई-2011

अमेरिका का पतन और भारत-चीन का उदय

? प्रमोद भार्गव

               वैश्विक आर्थिक व सामरिक शक्ति के सम्राट अमेरिका अब पराभव की ओर है। ये संकेत खुद बराक ओबामा और अंतरराष्टीय मुद्रा कोष ने दिए हैं। इन्हें स्वीकार भले ही न किया जाए लेकिन एकाएक नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। सान फ्रांसिस्को में चुनाव कोष जुटाने गए ओबामा ने कहा कि अमेरिका को बदलती दुनिया में अपने को अनुकूल बनाने की जरुरत है,क्योंकि दुनिया में आर्थिक ताकत के रुप में भारत और चीन लगातार उभर रहे हैं। दूसरी तरफ मध्यपूर्व के देशों में परिवर्तन की आहट के चलते अस्थिरता के हालात हैं। तकनीक के कारण दुनिया करीब आ रही है और ज्यादातर प्रौद्योगिकियों का आविष्कार भी पश्चिम में हुआ। इसलिए हमें अपने तरीकों और सोच में मौलिक बदलाव लाना होगा। ताकि हमारे बच्चे उसी अमेरिका को पाएं जो हमें विरासत में मिला था। ऐसे ही हालातों का पूर्वाभास करते हुए ओबामा ने हाल ही में अपने देश के रोगियों को इलाज के लिए भारत नहीं जाने की सलाह भी दी थी। ओबामा के सुर में सुर मिलाते हुए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी पहली बार समय पूर्व आकलन करते हुए दावा किया है कि अगले पांच सालों में अमेरिकी आर्थिक साम्राज्य ढह जाएगा और चीन इस रफतार में 2016 तक उससे आगे निकल जाएगा। अमेरिका इस समय बढ़ते आर्थिक कर्ज और बेरोजगारी से भी जूझ रहा है। यहां मुक्तिबोध की इन पंक्तियों की सार्थकता साफ दिखाई दे रही है, 'पूंजीवाद तेरा एक ही अर्थ,विधवंस।


               अपनी बौध्दिक क्षमता व लगातार मजबूत हो रही आर्थिक वृध्दि के बूते भारत व चीन कालांतर में अंतरराष्ट्रीय शक्ति का केंद्र बनेंगे,ये संकेत कुछ समय पूर्व ब्रिटेन के विदेश मंत्री डेविड मिलीबैंड ने भी दिए थे। मिलीबैंड ने अपने देश के राजनयिकों से कहा था कि वे विश्व संदर्भ में अपना दृष्टिकोण बदलें, क्योंकि विश्व अर्थव्यवस्था के साथ भारत और चीन के मजबूती से जुड़ जाने के कारण भविष्य में शक्ति केंद्र पश्चिम से हस्तांतरित होकर पूरब का रुख करने की तैयारी में है। लेकिन क्या अमेरिका और ब्रिटेन का आर्थिक साम्राज्य इतनी आसानी से ढह जाना मुमकिन है ?क्योंकि अभी अमेरिकी कद के मुकाबले कोई दूसरा देश नहीं है। सोवियत संघ जब अपने संपूर्ण वजूद में था तब भी अमेरिका की तुलना में उसके वस्तुओं के उत्पादन और सेवाएं केवल एक तिहाई थीं। इन उत्पादों के प्रति भी उपभोक्ता की न तो ललक थी और न ही इनकी गुणवत्ता पर भरोसा। इसी तरह जापान अपनी उपलब्धियों के चरम पर अमेरिका का केवल आधा आउटपुट दे पाया। फिलहाल उसे फुकुशिमा में आए तूफान और सुनामी से उबरने में ही लंबा वक्त लगेगा। इसलिए वह अमेरिका तो छोड़िए, चीन और भारत से भी प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएगा। 10 साल पहले तक भी अमेरिका की अर्थव्यवस्था चीन से तीन गुना ज्यादा थी। चीन नई तकनीकों के अविष्कार में भी अभी बहुत पीछे है। बढ़ी आबादी के कारण चीन की ज्यादातर आबादी गरीबी की मार झेल रही है। इसके अलावा चीन,अमेरिका से प्रति व्यक्ति आउटपुट के मामले में भी पीछे है। आईएमएफ के अनुसार 2009 में अमेरिका में प्रति व्यक्ति जीडीपी 28 हजार डॉलर थी,जबकि चीन में केवल ढाई हजार डॉलर। हालांकि आर्थिक मामलों के विशेषझ सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर ही अमेरिका की आर्थिक हैसियत खिसकने का अनुमान लगा रहे हैं,जिसका अर्थ एकाएक अमेरिकी पराभाव के परिप्रेक्ष्य में देखना जल्दबाजी होगा।

 

               इसके बावजूद इतना जरुर है कि चीन भारत की तुलना में अपनी बढ़ी आबादी का रचनात्मक व सकारात्मक उपयोग कर न केवल अपने सकल घरेलू उत्पादों को बढ़ाने में कामयाब हुआ है,बल्कि 60करोड़ आबादी को गरीबी रेखा से उबारने में भी सफल रहा है। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि चीन ने अपनी विशाल आबादी को समस्या न मानते हुए उसे कृषि उत्पादन,प्रबंधान व रोजगार से जोड़ा। फलस्वरुप चीन देखते-देखते इतना बड़ा निर्यातक देश बन गया कि आज वह दुनिया के कुल उत्पादों का 50फीसदी निर्माण खुद करता है। अमेरिका चीन के उत्पादों को खरीदने वाला सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। चीन अपनी अर्थव्यवस्था को ऐसा रुप देना चाहता है,जो घरेलू खपत पर केंद्रित हो। चीन की कोशिश है कि धन का समान वितरण हो,जिससे गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों का जीवन स्तर उपर उठे और असमानता दूर हो। जीवन-यापन की आधारभूत जरुरतों के अलावा,शिक्षा और स्वास्थ्य परियोजनाओं के विस्तार के साथ उनकी गुणवत्ता का ख्याल भी चीन रख रहा है। इसी संतुलित विकास के बूते चीन 60 करोड़ लोगों को गरीबी से छुटकारा दिलाने में सफल रहा है। चीन ने भविष्य की संभावनाओं का ख्याल रखते हुए भी बेहद समझदारी से काम लिया है। अपने प्राकृतिक संसाधानों का वह जरुरत के मुताबिक दोहन के साथ उनके संरक्षण के भी कड़े उपाय कर रहा हैं। प्राकृतिक संपदा की लूट पर चीन में सख्त पाबंदी है। जबकि भारत ने इन्हें बहुराष्टीय कंपनियों के दोहन के लिए खुला ही नहीं छोड़ा,बल्कि विकास और प्राकृतिक संपदा के दोहन की नीतियां भी ऐसी बनाई जा रही हैं,जिनके बूते कंपनियों के नाजायज दोहन के हित भी सुरक्षित रहें। अब ऐसे नतीजे सामने आने लगे हैं कि कथित आर्थिक विकास के बहाने हमारी प्राकृतिक संपदा के भण्डार लगातार रीत रहे हैं। लिहाजा क्षेत्रीय व आर्थिक विषमता की हैसियत जो 20 साल पहले तक चीन की तुलना में 80 प्रतिशत थी वह अब घटकर बमुश्किल 20-22 फीसदी रह गई है। इसलिए न तो अमेरिका के हालात इतने विपरीत हुए हैं कि उसका वैश्विक महाशक्ति का सिंहासन 5-10साल में डावांडोल हो जाए और न ही भारत अथवा चीन के आर्थिक विकास के हालात इतने अनुकूल हैं कि वे विश्व के शक्ति केंद्र बन जाएं। वैसे भी पूरब के अधिकांश देशों में अभी भी जो सामंती प्रभाव और फिरंगी गुलामी के प्रति जो दास भाव है,उससे एकाएक निवृत होकर इन देशों के लोगों में अंहभाव उबरने वाला नहीं है। अमेरिका आर्थिक मंदी और बेरोजगारी के दौर से भले ही गुजर रहा हो,लेकिन महाशक्ति बने रहने के लिए उसके पास अभी भी पर्याप्त आर्थिक व सामाजिक ताकत तो है ही,पश्चिमी देशों का अंधा-समर्थन भी हासिल है। इसी बूते उसका एशिया, पश्चिम एशिया और अफ्रीकी देशों में जबरिया दखल जारी है। लीबिया में मित्रों देशों का हमला,इसका ताजा उदाहरण है। लेकिन अमेरिकी साम्राज्य ढहने के जो पूर्वानुमान लगाए जा रहे हैं,उससे यह मुगालता जरुर टूट रहा है कि भूमण्डलीय आर्थिक उदारवाद वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बने रहने की कोई सैध्दांतिक अवधारणा है।

? प्रमोद भार्गव