संस्करण: 10 मई-2011

अपने गिरहबां में क्यों
नहीं झांकती भाजपा
 

? महेश बाग़ी

               पिछले दिनों राजनीतिक फ़लक पर कुछ ऐसी घटनाएं सामने आईं, जो भारतीय राजनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सुखद नहीं कहीं जा सकती। इसे भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यहां विपक्ष सिर्फ़ विरोधा की राजनीति करता है और जब वह सत्ता में होता है,तो उसके सुर बदल जाते हैं। अब भाजपा सांसद मुरली मनोहर जोशी को ही लें। इन दिनों उनके चेहरे पर संतोष की छाप साफ़ दिखाई दे रही है। तमाम अडंग़ेबाज़ियों के बावजूद वे 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की पीएसी जांच रिपोर्ट लोकसभा अधयक्ष मीराकुमार तक पहुंचाने में कामयाब रहे। वे यह सोच कर भी खुश होंगे कि सार्वजनिक चर्चा होने से पहले ही इस रिपोर्ट को उन्होंने कैसे सरकार पर वार करने का हथियार बना लिया। डॉ. जोशी इस बात से भी खुश होंगे कि उनके विरोधी तमाम विवाद उठा कर भी उन्हें दोबारा लोक लेखा समिति (पीएसी) का अध्यक्ष बनने से नहीं रोक पाए।


                राजनीति में चल रहे इस नंबर गेम से क्या देश भी ख़ुश होगा ? नहीं, कतई नहीं। पहले बात 2-जी घोटाले की करें। इसमें कोई दो राय नहीं कि चंद राजनेता और बड़े घराने देश को खोखला कर रहे हैं। इस घोटाले के प्रकाश में आने के बाद एक मंत्री (ए. राजा) को न सिर्फ़ मंत्री पद छोड़ना पड़ा, बल्कि जेल की हवा भी खाना पड़ रही है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है,वैसे-वैसे कई दिग्गज कारपोरेट भी जेल के सींखचों के पीछे जा रहे हैं यानी सरकार देर से ही सही,अपना काम कर रही है। डॉ.जोशी ने लोकसभा अधयक्ष को सौंपी रिपोर्ट में यह सवाल भी उठाया है कि क्या संविधान द्वारा अधिकार प्रदत्त संसदीय समिति को दलगत आधाार पर काम करना चाहिए ? यहां यह बताना ज़रूरी है कि पीएसी का गठन प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसलिए किया था कि नौकरशाही को परोक्ष रूप से संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जा सके,क्योंकि मंत्रियों से तो संसद के अंदर सीधो जवाब-तलब किया जा सकत है,परंतु नौकरशाही मंत्रियों के आदेश पर काम करती है। इसलिए सरकारी ख़र्चों में मंत्रियों की जवाबदेही तय करने के लिए ही लोकलेखा समिति के गठन का फ़ैसला किया गया था। इसमें यह भी तय किया गया था कि सरकारी ख़र्च में किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार की ज़िम्मेदारी उस विभाग के अफ़सर पर तय की जा सके। संबध्द विभाग का मंत्री यह काम नहीं कर सकता,क्योंकि उसी के आदेश के तहत काम हुआ होता है। इसीलिए लोक लेखा समिति में सभी दलों के सदस्यों का शामिल करने का प्रावधान किया गया है, ताकि दलगत भावनाओं से ऊपर उठकर निरपेक्ष भाव और सर्वसम्मति से फैसला किया जा सके। लोक लेखा समिति के दोबारा अधयक्ष बने डॉ. जोशी यह बता सकेंगे कि इस परंपरा का पालन क्यों नहीं हुआ? वे आज सरकार से शालीनता की उम्मीद क्यों कर रहे हैं? क्या सत्ता में आने के बाद उनके सुर नहीं बदलते?


               भाजपा के इस दोहरे रूख़ का एक उदाहरण गुजरात से सामने आया है। गुजरात में ऐसे कई अधिकारी हैं,जो मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के कोप के शिकार हैं। ताज़ा मामला आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट का है,जिन्होंने मोदी के ख़िलाफ़ दिए बयान में कहा कि ''27मई को (दंगों के समय)मुख्यमंत्री ने अफ़सरों को साफ़ कहा कि हिंदुओं के गुस्से को बाहर आने दो। प्रशासन दंगों के दौरान हिंदू-मुसलमान के बीच संतुलन साधाने की पुरानी परंपरा का निर्वाह इस बार न करे।''इस बयान से मोदी पर भविष्य में संकट गहरा सकता है। इसलिए संजीव भट्ट को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया गया है। उन्होंने शिकायत की है कि उनकी जान को ख़तरा है तथा उन्हें और उनके परिजनों को अतिरिक्त सुरक्षा मिलना चाहिए। इस पर मोदी सरकार ने क्या किया?भट्ट को जो साधारण सुरक्षा मिल रही थी,वह भी हटा दी गई है। जिस अफ़सर को दिलेरी और साफ़गोई के लिए पुरस्कृत किया जाना चाहिए,उसे मरने के लिए उसी के हाल पर छोड़ दिया गया है। इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि यदि आप मोदी के विरुध्द बोलते हैं,तो सरकार नागरिक की सुरक्षा वाले दायित्व से मुकर जाएगी।


              भ्रष्टाचार पर आज आसमान सिर पर उठा रही भाजपा के नेतृत्व में जब एनडीए सरकार दिल्ली की सत्ता पर थी,तब तहलका डॉट कॉम ने भाजपाइयों की काली करतूतें उजागर करना शुरू की थीं। तब तहलका के रिपोर्टर अनिरुध्द बहल को जेल भेजने की साजिश रची गई थीं और उनके सहयोगी कुमार बादल को एक दूसरे मामले में फंसा कर हवालात में भारी यातनाएं दी गई थीं। सरकार ने एक साजिश के तहत तहलका की प्रमोटर कंपनी को दिवालिया बना दिया था। जिन अटल बिहारी वाजपेयी को भाजपा अपना आदर्श मानती है,उन्हीं की सरकार के रहते उक्त गुल खिलाए गए थे। पिछले दिनों कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा पर ज़मीन घोटाले का मामला सामने आया था,जिस पर भाजपा ने मुंह बंद कर लिया था और वे अब तक मुख्यमंत्री पद पर काबिज हैं। अब भाजपा के राष्ट्रीय अधयक्ष नितिन गडकरी पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने अनैतिक तरीकों से संपत्ति अर्जित की है। इस मामले में उनसे सफ़ाई देने की मांग भी उठी,पर गडकरी अब तक चुप्पी साधे हैं।


              यह है चाल,चरित्र और चेहरे का दंभ भरने वाली भाजपा का असली चेहरा,जिसे अपनों का भ्रष्टाचार नज़र नहीं आता और सत्ता पक्ष पर कीचड़ उछालना उसका एकमात्र धयेय रह गया है। किसी भी लोकतांत्रिक पध्दति में ऐसी स्थिति सुखद नहीं कहीं जा सकती। आज जब भ्रष्टाचार के ख़िलाफ पूरा देश जाग रहा है,मंत्री और बड़े-बड़े लोग जेल जा रहे हैं,तब एक प्रमुख विपक्षी दल का यह दोहरा रवैया लोकतंत्र की गरिमा के अनुकूल नहीं लगता। भाजपा जैसे फासीवादी दल से इसमें सुधार की अपेक्षा तो नहीं की जा सकती,किंतु एक राजनीतिक दल होने के नाते ही सही,भाजपा नेताओं को अपने गिरहबां में झांक कर देखना चाहिए कि वे कितने पानी में हैं?
 


? महेश बाग़ी