संस्करण: 10 जून -2013

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आडवाणी ने खोली मोदी के झूठ की पोल

पहले से समृध्द था गुजरात

       खिरकार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास का झूठ सामने आ गया। उनके लिए यह शर्मनाक स्थिति तो है ही, इससे भी अधिक शर्मनाक स्थिति यह है कि उनके झूठ की पोल किसी और ने नहीं बल्कि पार्टी के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी ने खोली है। पिछले दिनों ग्वालियर में भाजपा के एक कार्यक्रम में लालकृष्ण आडवाणी ने साफ-साफ कहा कि मोदी को समृध्द गुजरात मिला था,उन्होंने उसी को आगे बढ़ाया। यानि साफ है कि मोदी अब तक गुजरात में जिस विकास की बात करते आ रहे हैं,उसमें मोदी का योगदान सिर्फ इतना है कि वे पिछले 10सालों से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं।  

? विवेकानंद


आडवाणी जी ने खेली चाल

तारीफ शिवराज की, निराशा मोदी पर!

       भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठतम नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी ने ग्वालियर में आयोजित भारतीय जनता पार्टी के पालक-संयोजक महाअधिवेशन मे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज चौहान की प्रशंसा करते हुए एवं तीर से कई निशाने साधा लिए हैं। शिवराज सिंह की तारीफ के पुल के पीछे आडवाणी के भीतर की वह प्रशंसा उजागर हो गई जो उनके दिल में पिछले एक दशक से कुलबुला रही थी। आडवाणी की प्रंधानमंत्री बनने की भूख मिट नहीं पा रही हैं।

? डॉ. महेन्द्र सिंह चौहान

(लेखक म.प्र. कांग्रेस कमेटी के महामंत्री है)


भाजपा जिसमें प्रशंसा को लेकर

भी स्पष्टीकरण देना पड़ता है

      भारतीय जनता पार्टी के नेता पहले भी दावा करते थे और आज भी करते हैं कि उनकी पार्टी विथ ए डिफरेन्स हैं, अर्थात हमारी पार्टी अनूठी है-दूसरी पार्टियों की तुलना में। यह दावा पहले इसलिये सही लगता था और आज भी लगता है, क्योंकि भाजपा के अलावा देश में कोई भी ऐसा दल नहीं है, जिस पर किसी और संगठन का नियंत्रण हो। यह सौभाग्य सिर्फ भारतीय जनता पार्टी को प्राप्त है। जिसके भीतर राष्ट्रीय स्वयंसेवक की मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता है।

? एल.एस.हरदेनिया


अन्ना हजारे का उत्थान और पतन

सत्याग्रह जब खुराफाती लगने लगा

      न्ना हजारे की सक्रियता का बुखार उतर गया है। इसमें टिकने की शक्ति थी ही नहीं। इसका पता तो उसी समय लग गया था, जब आंदोलन का स्थान दिल्ली से बदलकर मुंबई कर दिया गया था। यह दिसंबर 2011 की घटना थी। उस समय अन्ना के आंदोलन में उतने लोग नहीं उमड़ रहे थे, जितने उसी साल अगस्त और मई के आंदोलन में दिखाई पड़े थे। मुंबई के बांद्रा कुर्ला परिसर मैदान में अन्ना का वह आंदोलन शुरू हुआ था और उसका एक बड़ा हिस्सा खाली दिखाई पड़ रहा था।

? अमूल्य गांगुली


कला-संस्कृति के क्षेत्र में दुष्प्रवृत्तियां

आखिर ये किसे धोखा दे रहे हैं?

         भारी भरकम पृष्ठों वाले समाचार पत्रों में फिल्म और सांस्कृतिक गतिविधियों से सम्बन्धित चार पृष्ठ सुरक्षित रहते हैं। इन पृष्ठों में सांस्कृतिक गतिविधियों से ज्यादा लगातार दिये जाने वाले सम्मानों और पुरस्कारों के समाचार छपते हैं। इन समाचारों में किसी संस्था के बैनर के समक्ष किसी मंत्री या वरिष्ठ अधिकारी के हाथों पुरस्कार लेते देते ऐसे संस्कृतिकर्मियों के चित्र छपे होते हैं जिनके सांस्कृतिक अवदान से अखबारों के अधिकांश पाठक ही नहीं अपितु नगर के संस्कृतिकर्मी तक अनभिज्ञ होते हैं।  

 ?   वीरेन्द्र जैन


राजनीति का 'बोल-युग'

कथनी में सौ में से सौ नम्बर

करनी में पासिंग माक्र्स भी नहीं !

                  ह राजनीति का 'बोलयुग' है जिसमें चारों तरफ 'बोल' ही 'बोल' गूंज रहे हैं। ऐसे में वहीं राजनैतिक दल ज्यादा से ज्यादा सुर्खियों में रहता है जिसमें बड़बोले नेताओं की भरमार होती है। देश और प्रदेश के कतिपय नेताओं की भरमार होती है। देश और प्रदेश के कतिपय नेता तो इतना ज्यादा बोलते है कि वे जिस पार्टी के होते हैं वह बड़बोलों की पार्टी के नाम से जानी जाने लगती है। अपने बड़बोलेपन में ये नेतागण इतने माहिर होते है कि बोल ही बोल में दिन को रात और रात को दिन सिध्द कर देते हैं। इस बात को ये इतने विश्वास और दृढ़ता के साथ पेश करते हैं कि भोली-भाली जनता को रात दिन जैसी और दिन रात जैसा ही दिखने लगता है।    

? राजेन्द्र जोशी


नक्सलवाद से निपटने का सही वक्त

      त्तीसगढ़ में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर नक्सली हमले ने देश को झकझोर कर रख दिया है। इसे अब तक का सबसे बड़ा और नृशंस हमला बताया गया है। इस हमले के बाद नक्सलियों ने लाशों के ढेर पर जिस तरह जश्न मनाया, उससे मानवता तार-तार हो गई है। इसके जरिए नक्सलियों ने अपनी कू्ररता का ही परिचय दिया है, जिससे नक्सली आंदोलन पर ऐसा दाग लगा है, जिसे कभी धोया नहीं जा सकेगा। इस हमले ने केंद्र और राज्य सरकारों को स्पष्ट संदेश दिया है कि अब नक्सलियों से निर्णायक लड़ाई का वक्त आ गया है।

? महेश बाग़ी


यौन हिंसा : कच्ची उमर की दर्दभरी दास्तां

      ध्य प्रदेश के भिण्ड देहात थाना क्षेत्र निवासी एक 16 वर्षीय नाबालिग लडकी के साथ कुकर्म करने में असफल युवक ने उसे उसके ही घर में कैरोसिन डालकर जिन्दा जला दिया। गम्भीर रुप से जली युवती को ग्वालियर रैफ र किया गया था। वहीं रायसेन जिले के गैरतगंज थाना अंतर्गत ग्राम गढ़ी में एक 15 वर्षीय किशोरी के साथ पहले ज्यादती की गई। फिर उस पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी गई। किशोरी की चीख सुनकर पास से गुजर रहे राहगीरों ने एक आरोपी को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया। गंभीर रूप से जली किशोरी को जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गयाए जहां से उसे भोपाल के हमीदिया अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया था।

? राखी रघुवंशी


कार्पोरेट हितेषी नीतियों से बढेग़ा असंतोष

        संजीव कुमार का दुख है कि उनका यह जीवन बेकार ही चला गया। म.प्र. के स्वास्थ्य महकमे में संविदा कर्मी के रूप मे सेवाएॅ देने वाले संजीव कुमार अपने जीवन के 45बसंत पार करने के बाद भी कल की चिंता से मुक्त नहीं हो पाएॅ है। संविदाकर्मी के तौर पर हर वक्त रोजगार खोने का डर सताता है और वेतन इतना कि घरखर्च चलाना ही मुश्किल सो बचत की तो बात सोचना ही संभव नहीं है।अपने परिवार के भविष्य से चिंतित संजीवकुमार अक्सर नए काम की तलाश में रहतें है,मगर काम है कि मिलता ही नहीं।उन्हें इस बात का भी अफसोश है कि जीवन के इस मोढ़ पर वो विद्रोही भी नहीं बन सकते है।

? डॉ. सुनील शर्मा


किसके हित में हैं

मध्यप्रदेश सरकार के ये निर्णय

       भी कभी सरकारें ऐसे निर्णय लेती हैं जिन्हें जनहितकारी नहीं माना जा सकता। तब आश्चर्य की बजाय निराशा अधिक होती है। मध्यप्रदेश सरकार के कुछ ऐसे ही निर्णय उजागर हुए हैं जो हमें सोचने के लिए बाध्य करते हैं कि इनका निहितार्थ क्या है? पहला निर्णय फास्ट ट्रेक कोर्ट संबंधी है। ऐसे में, जबकि राज्य, केन्द्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय भी देश भर में लाखों लंबित मामलों को शीघ्रातिशीघ्र निबटाये जाने की आवश्यकता अनुभव करते हैं और इसके लिए फास्ट ट्रेक कोर्ट अधिकतम संख्या में स्थापित किये जाने की पैरवी करते हैं, तब मध्यप्रदेश की सरकार ने राज्य की सभी 31 फास्ट ट्रैक कोर्ट बंद करने का निर्णय ले लिया है।  

 

? डॉ. गीता गुप्त


इस पहल का और विस्तार हो

        तिहासिक तथ्यों से रूबरू होने में उस दौर के दस्तावेजों की गवाही की तुलना में कोई भी दस्तावेज अधिक विश्वसनीय नहीं हो सकता,लिहाजा आधुनिक दौर में ऐतिहासिक गुत्थियों को हल करने में अभिलेखों के महत्तव को अत्यधिक मान्यता प्रदान की जा रही है और घटनाओं के निष्पक्ष वर्णन के लिए भी रिकार्ड को ही आधार माना जाता है,जिसके अभाव में वास्तविक इतिहास लिखना नामुमकिन है। देश के तमाम अभिलेखागारों में ऐसे कई ऐतिहासिक अभिलेख और फरमान संकलित हैं, जिनके जरिए उस दौर को अच्छी तरह से जाना-समझा जा सकता है।

? जाहिद खान


  10 जून -2013

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