संस्करण: 10 फरवरी-2014

हिन्दुत्व के विमर्श में स्त्री

 

? सुभाष गाताड़े

        किसी अलसुबह अगर एक प्रतिष्ठित महिला का चरित्रहनन करने का सिलसिला शुरू हो जाए, उनके मोबाइल नम्बर को सार्वजनिक शौचालय से लेकर पास के रेलवे स्टेशन में सार्वजनिक तौर पर लिख दिया जाए,उन्हें धमकाने,उनके समर्थन में उतरे लोगों को आतंकित किया जाए,और इस मुहिम में लगे लोगों के चेहरे भी जाने पहचाने हों, तो क्या किया जाना चाहिए ? यह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया होगी कि उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत हो और ऐसे उत्पीड़कों को सज़ा मिले।

                यह अलग बात है कि अगर मामला शिवसेना का हो, तो सारी बातें धरी की धरी रह जा सकती हैं। कमसे कम मुंबई शिवसेना के इतिहास में इन दिनों जो घटित हुआ है या हो रहा है, इसे देख कर यही अन्दाज़ा लग सकता है।

              गौरतलब था कि पीड़िता - शीतल म्हात्रो - भी पार्टी की नेत्रियों में थी, दहिसर नामक जगह से नगरसेविका के तौर पर चुनी गयी थी और उसके उत्पीड़क के तौर पर पार्टी के ही एक विधायक का नाम मीडिया में उछल रहा था। महत्वपूर्ण यह भी था कि शीतल की इस यौन प्रताडना को लेकर विपक्षी पार्टी की नगरसेविकाओं ने भी उनके समर्थन में गवाही दी थी। विभिन्न महिला संगठनों ने प्रदर्शन भी किया था। मगर पार्टी के अध्यक्ष उध्दव ठाकरे दिल नहीं पसीजा। बाद में जब विधायक द्वारा शीतल म्हात्रो के घर जुलूस ले जाने की धमकी दी गयी और जिसके बाद रक्तचाप बढ़ने के कारण उन्हें अस्पताल में भरती होना पड़ा,और उध्दव के इस मौन की तुलना मिथकीय कथा महाभारत के धृतराष्ट्र से होने लगी तो संकोच दूर करने के लिए उन्होंने पीड़िता से मुलाकात की।

               जाहिर था कि विधायक पर कार्रवाई नहीं की गयी है, जबकि लगभग एक महिने तक यह मामला चला था। अपने हर भाषण में 'मर्द' को ललकारनेवाले उध्दव ठाकरे के इस मौन को समझना मुश्किल नहीं है।

               शिवसेना जो 1966 में बनी और जिसने पहले मुंबई की वाम पार्टी के नेतृत्ववाली ट्रेड यूनियनों को ,फिर मदरासी अर्थात तमिलभाषियों को, फिर मुसलमानों को अपने निशाने पर रखा, और फिर बिहार-यूपी वालों को भी इसी श्रेणी में ला खड़ा किया,उसके इतिहास को देखें तो यह कोई अजूबा नहीं जान पड़ता। विरोधाभास उसकी अन्तर्वस्तु में निहित है।

             लोगों को याद होगा कि जन्माष्टमी के अवसर पर सूबे की राजधानी मुंबई के शिवाजी पार्क मैदान में शिवसेना की तरफ से ही पुरूष एवं स्त्री गोविन्दाओं को पांच सौ तलवारें सार्वजनिक तौर पर बांटी गयीं थी। एक क्षेपक के तौर पर बता दें कि इस दिन महाराष्ट्र में तमाम स्थानों पर दही हंडी कार्यक्रम का आयोजन होता है, जिसके अन्तर्गत मानवीय पिरामिड बना कर लोग बहुत ऊपर लटकी हंडी को तोड़ते हैं, और इन्हें तोड़ने के लिए एकत्रित पुरूषों, स्त्रियों को गोविन्दा कहा जाता है। परेल के शक्ति मिल कम्पाउण्ड में एक महिला फोटो पत्रकार के साथ हुए अत्याचार की घटना से जनता ने अपनी व्यापक नाराजगी प्रगट की थी, इसी को भुनाने के लिए शिवसेना की तरफ से तलवारें बांटने के इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।

             शिवाजी पार्क में जमा विशाल भीड़ के सामने ढाई फीट लम्बी तलवारें बांटने का आयोजन करनेवाले शिवसेना नेता अभिजीत पानसे ने कहा था कि ''तलवारें योध्दाओं एवं शौर्य का प्रतीक होती हैं। महिलाओं के खिलाफ क्रूर बलात्कार एवं हिंसा की बढ़ोत्तरी को देखते हुए यह तलवारें उन्हें मदद कर सकती हैं। इन तलवारों से पुरूषों को चाहिए कि वह उन लोगों के हाथ काट दे जो महिलाओं पर अत्याचार करते हैं और महिलाएं आत्मरक्षा के लिए इनका इस्तेमाल करें।''  शीतल म्हात्रो प्रसंग की चर्चा करते हुए मराठी के चर्चित नाटककार एवं संस्कृति कर्मी संजय पवार ने 'लोकसत्ता' के अपने आलेख में व्यंग करते हुए लिखा (2 फरवरी 2014) ' शीतल म्हात्रो और उनकी समर्थक पूर्व मेयर सुश्री शुभा राउल कहां थीं जब अभिजीत पानसे जैसे 'मर्द' तलवारें बांट रहे थे।

             'अन्य' के खिलाफ हिंसा करने के लिए उकसानेवाला हिन्दुत्व का विमर्श किस तरह अपनी अन्तर्वस्तु में गहरे में पितृसत्तात्मक है, इसे प्रमाणित करने के लिए कोई अन्य मिसाल देना जरूरी नहीं है। इसे शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की यौनवादी भाषा को सुन कर भी अन्दाज़ा लग सकता था, जिसे वह सार्वजनिक मंचों पर खुल कर बोलते थे।

              दरअसल हिन्दुत्व - जो एक राजनीतिक विचारधारा है तथा जिसे हिन्दु धर्म के साथ घालमेल करना अनुचित होगा - के लिए स्त्रियों का सशक्तिकरण खास तरीके से ही अभिप्रेत है, वह उन्हें उसी हद तक सशक्तिकृत करना चाहता है, जिस हद तक वह 'अन्य' के खिलाफ आक्रामक हों मगर अगर यही सशक्तिकरण का सिलसिला उसके अन्दर जागृत हो उठता है तो उसके लिए वह बर्दाश्त नहीं है।

                बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद 1992-93 के बम्बई दंगों में हम सभी इस बात को देख चुके हैं कि किस तरह शिवसेना की महिला आघाडी में सक्रिय महिलाओं ने हिस्सेदारी की थी, महाआरतियों के आयोजन के बाद मुस्लिमों के घरों को चिन्हित कर वहां 'आक्रमण' करने में वह कंधो से कंधा मिला कर चली थीं, या उसके बाद के तमाम दंगों में - फिर 2002 में गुजरात के जनसंहार में भी इसी स्थिति से हम रूबरू होते हैं। बम्बई में जब दंगाइयों को पकड़ने के लिए पुलिस पहुंचती थी, तो पुलिस की गाड़ियों को घेरना या सड़कों पर लेट जाना आदि तमाम कामों में वह सक्रिय थी।

             मगर उसी शिवसेना को अपने सहमना अन्य संगठनों के साथ यह कत्तई मंजूर नहीं था कि स्त्रियों की यौनिकता को या स्त्रियों को पूरी छूट मिले। वैलेन्टाइन डे को लेकर उनके विरोध प्रदर्शन या हिंसा या महिलाओं के आपसी यौन सम्बन्धों को चित्रित करनेवाली एक हिन्दी फिल्म की उन्होंने की मुखालिफत ऐसी तमाम मिसालें हमें मिलती हैं। यही वह सोच है जिसके चलते अगर हम हिन्दुत्व के इतिहास पर गौर करें तो हम पाएंगे कि हिन्दुत्व के समूचे विश्वनज़रिये में बलात्कार का दोहन करना अपने आप में एक अलग अहमियत रखता है। फिर वह चाहे 'परायी' अर्थात 'दूसरे धर्मों की' औरतों के साथ बलात्कार कर उसे अंजाम दिया जाये या फिर 'अपनी' औरतों के साथ हुए बलात्कार की झूठी सच्ची कहानियां प्रसारित करके समूचे समुदाय को जनूनी खूनी मुहिम के लिए उकसाया जाये, या फिर खुद को महिलाओं का हिमायती साबित करने के लिए बलात्कार के लिए सज़ा ए मौत के प्रावधान की समय समय पर मांग करते रहा जाये।

              आखिर बलात्कार को हिन्दुत्व के प्रोजेक्ट में इतनी अहमियत क्यं मिली है ? अपने एक महत्वपूर्ण आलेख 'हिन्दुत्व की प्रयोगशाला : पूर्वइतिहास और वर्तमान के बारेमें चन्द बातें'( सन्धान, जनवरी 2003) में प्रख्यात इतिहासकार तथा नारीवादी एक्टिविस्ट सुश्री उमा चक्रवर्ती इस पर रौशनी डालती है '' सभी पिछड़े समाजों की तरह यहां भी औरत के सम्मान को समुदाय/कम्युनिटी के अपमान/सम्मान के साथ जोड़ कर देखा जाता है। इसमें अन्तर्निहित पितृसत्तात्मक सोच तो स्पष्ट है जिसमें औरत का अपना वजूद गौण होता है और वह गोया समुदाय के सम्मान के प्रतीक के तौर पर प्रस्तुत होती हैं। समुदायविशेष की औरतों के साथ हुए अत्याचार का बदला अत्याचारियों को दण्डित करके नहीं बल्कि अन्य समुदाय की औरतों के साथ अत्याचार करके चुकाने की सोच इसी में पनपती है। विडम्बना यही है कि औरतें खुद भी इस सोच की वाहक बनी रहती हैं। चूंकि पितृसत्ता की विचारधारा हावी रहती है तो स्पष्ट है 'पौरूषत्व' को भी अत्यधिक महत्व मिलता है। एक समुदाय का 'पौरूषत्व' दूसरे से ज्यादा है इसे दिखा करके दूसरे को अपमानित रखा जा सकता है। यौन अपमान को लेकर गालियों का इस कदर इस्तेमाल किया जाता है कि इसका दायरा अलग अलग समुदायों के भगवानों तक भी पहुंचता है। ''

               छत्रपति शिवाजी महाराज के चरित्र का एक प्रेरणादायक प्रसंग यह है कि जब कल्याण पर उनका कब्जा हुआ तब उनके सरदार ने उनके सामने कल्याण के मुस्लिम सरदार की बहू को नज़राना के तौर पर पेश किया। बताया जाता है कि उपरोक्त महिला को इस कदर पेश किये जाने से नाराज शिवाजी महाराज ने अपने सरदार को न केवल दण्डित किया बल्कि मुस्लिम सरदार की बहू को ससम्मान वापस भेज दिया। मराठों के एक सरदार चिनाजी अप्पा द्वारा भी पोर्तुगीज गवर्नर की पत्नी के साथ इसी तरह का सलूक किया गया था। जानने योग्य है कि अपनी किताब ' सिक्स ग्लोरियस इपौक्स आफ इण्डियन हिस्ट्री' में हिन्दुत्व के सियासी प्रोजेक्ट के अग्रणी प्रवक्ता जनाब सावरकर साफ साफ लिखते हैं : 'आज की तारीख में भी हम शिवाजी महाराज तथा चिनाजी अप्पा की महानता का इस मायने में बखान करते हैं लेकिन क्या यह सही नहीं है कि ऐसा करते वक्त वे भूल गये थे कि किस तरह महमूद गजनी, मुहम्मद गोरी, अल्लादीन खिलजी ने हिन्दु लड़कियों तथा महिलाओं के साथ अत्याचार किया था। ..लेकिन महिलाओं की रक्षा के विकृत धार्मिक विचारों के प्रभाव के चलते जिसने हिन्दू समाज को नुकसान पहुंचाया न शिवाजी महाराज न चिनाजी अप्पा इन मुस्लिम महिलाओं के साथ ज्यादती कर सके। महिलाओं की रक्षा करने की यही वह आत्मघाती हिन्दू नीति है जिसने इन मुस्लिम महिलाओं को हिन्दू महिलाओं पर हुए अत्याचारों की सज़ा भुगतने से बचाया।''( पेज 71, राजधानी ग्रंथागार, दिल्ली,1971)

               स्त्रियों को लेकर यह की वह मानसिकता है जो एक तरफ बलात्कार को औचित्य प्रदान करती है और किसी नगरसेविका की यौन प्रताडना को लेकर आंखें मूंदे रहती है।

? सुभाष गाताड़े