संस्करण: 10 फरवरी-2014

निष्ठुर पति-

भावी प्रधानमंत्री

? मोकर्रम खान

                 रेंद्र मोदी की छवि निरंकुश व्यक्ति की रही है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में वह कठोर प्रशासक माने जाते हैं। भाजपा तथा आरएसएस में वह तानाशाह के रूप में जाने जाते हैं। न तो वह पार्टी के किसी बड़े नेता की सुनते हैं और न ही आरएसएस के पदाधिकारियों की। कहा जाता है कि पिछले गुजरात विधान सभा चुनावों में उन्हों ने संघ के लोगों को भी कह दिया था कि वे उनके पक्ष में प्रचार न करें,इसलिये संघ के लोगों ने केशुभाई पटेल के लिये प्रचार किया परंतु मोदी फिर भी विजयी रहे। भाजपा के पास एक से बढ़ कर एक कुशल राजनेता हैं जिन्हें सत्ता तथा संगठन चलाने का दीर्घ अनुभव है। बेदाग तथा नरमपंथी छवि वाले नेताओं की भी कमी नहीं है किंतु फिर भी आरएसएस के आदेश पर सभी को सुपरसीड कर नरेंद्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री घोषित कर दिया गया। इसके पीछे मोदी को सचमुच प्रधानमंत्री बनाना उद्देश्य है या उनके दंभ को तोड़ना,कहना कठिन है क्यों कि प्रधान मंत्री प्रत्याशी के रूप में भी वह 'एकला चलो'की नीति पर ही आगे बढ़ रहे हैं।हर जगह नमो नमो का जाप चलाया जा रहा है किंतु स्क्रींन पर वह अकेले ही दिखते हैं।उनकी जन सभाओं तथा रोड शो में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति बहुत कम ही रहती है,मोदी लगभग अकेले ही ये कार्यक्रम करते हैं। भाजपा तथा आरएसएस के बड़े नेता मोदी के समर्थन का स्वांग तो कर रहे हैं किंतु कभी उनकी प्रशंशा नहीं करते।  मोदी भी जानते हैं कि उनकी तूफानी रफ्तार से भाजपा तथा संघ के बड़े नेता अंदर ही अंदर खौल रहे हैं, मन से कोई उनका साथ नहीं देना चाहता। इसलिये वह अपनी प्लानिंग स्वयं कर रहे हैं।  पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह तथा कई अन्य नेता उत्तर प्रदेश से ही हैं फिर भी मोदी ने अपने सबसे विश्व सिपहसालार अमित शाह को वहां बैठा रखा है ताकि यूपी के साथ साथ दिल्ली की राजनीतिक गतिविधियों पर भी नजर रखी जा सके क्यों कि राजनीतिक शह और मात के खेल वहीं से खेले जाते हैं। नरेंद्रमोदी जानते हैं कि उनकी उग्र हिंदुत्व  की छवि के साथ दिल्ली की सत्ता के पायदान की सीढियां चढ़ना असंभव है क्योंकि इस देश की कुल जनसंख्या का 01 प्रतिशत मतदाता भी उग्र हिंदुत्व का समर्थक नहीं है। इसलिये अब वह अपनी छवि धर्म निरपेक्ष बनाने में लगे हुये हैं। मुस्लिम मौलानाओं के साथ उनके फोटो छपवाये जा रहे हैं। मोदी अपनी सभाओं में यह कह रहे हैं कि धर्म निरपेक्षता का अर्थ यह नहीं है कि लोग एक दूसरे के धर्म में घुसपैठ करने लग जायं बल्कि यह है कि हिंदू अच्छा् हिंदू बने और मुसलमान अच्छा मुसलमान बने। मोदी न तो धारा 370 की बात कर रहे हैं, न ही समान नागरिक संहिता की और न ही राम मंदिर निर्माण की।  उनके कार्यक्रमों में लोगों की अच्छीक खासी भीड़ रहती है।  इससे भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक है। शायद इसीलिये अब घात-प्रतिघात का खेल चरम पर है।

           मीडिया तथा कांग्रेस ने मोदी के पीछे कोई सेटेलाइट नहीं लगा रखा है जो उनकी पल पल की गतिविधियों की खबर देता रहे फिर भी नरेंद्र मोदी की कमजोरियां मीडिया की सुर्खियां बन रही हैं। जो खबरें कुछ समय से चल रही हैं, उनसे मोदी का स्त्री विरोधी स्वरूप उजागर हो रहा है।  महिलाओं को आधी आबादी माना जाता है।  यदि मोदी इस आधी आबादी के शत्रु सिध्द हो जाते हैं तो उनकी पराजय सुनिश्चित हो जायगी क्यों कि यह आधी आबादी शेष आधी आबादी यानि पुरुषों के मस्तिष्क पर काफी हद तक नियंत्रण रखती है, चाहे पत्नी के रूप में या बेटी, बहन अथवा मां के रूप में। एक महिला इशरत जहां का भूत पहले से ही नरेंद्र मोदी के पीछे पड़ा है। कुछ समय पूर्व उन पर एक महिला की जासूसी का आरोप भी लग चुका है। अब तीसरा आरोप सबसे गंभीर है जो उनके लिये समस्या खड़ी कर सकता है। नरेंद्र मोदी को लोग अभी तक बाल ब्रह्मचारी समझते थे क्यों कि आरएसएस के अधिकांश पदाधिकारी अविवाहित रहते हैं। नरेंद्र मोदी ने भी कभी यह जाहिर नहीं किया कि उनकी कभी शादी भी हुई थी। हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार ने उनकी पत्नी यशोदा बेन का इंटरव्यू छाप दिया जिसमें यशोदा बेन ने बताया कि उनका नरेंद्र मोदी से 45 वर्ष पूर्व विधिवत विवाह हुआ था जो 03 वर्ष तक कायम रहा, उसके बाद नरेंद्र मोदी ने उन्हें छोड़ दिया, वह भी बिना किसी कारण के। यशोदा ने यह भी बताया कि इन 03 सालों में नरेंद्र मोदी ने उनसे अपने आरएसएस या राजनीति की ओर झुकाव का जिक्र नहीं किया। तीन साल के बाद उन्हों ने कहा कि मैं पूरे देश में घूमूंगा और जहां मेरा मन करेगा, जाउंगा। पत्नी  ने सहचरी बन साथ चलने की जिद की किंतु वह नहीं माने। इस इंटरव्यू, ने कई प्रश्न खड़े कर दिये हैं। नरेंद्र मोदी यशोदा बेन के साथ 03 वर्षों तक विवाह बंधान में रहे किंतु 03 वर्षों का वैवाहिक जीवन उनके मन में प्रेम का पौधा रोपने में असफल क्यों रहा। क्या मोदी हृदय विहीन तथा भावना शून्य व्यक्ति हैं। यशोदा बेन उसी गुजरात में शिक्षक की नौकरी करते हुये रिटायर हो गईं और अब अपने भाई के घर पर रह कर पेंशन पर गुजारा कर रही हैं, जहां नरेंद्र मोदी पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से मुख्यमंत्री हैं। गुजरात के विकास का दावा कर देश को प्रगति के शिखर पर ले जाने का स्वप्न दिखा रहे नरेंद्र मोदी ने अपनी ही पत्नी  की सुधा नहीं ली। क्यो कोई पति इतना निष्ठुर हो सकता है। यदि हां तो वह पूरे देश की महिलाओं के प्रति कितना संवेदनशील होगा। मामले का एक जबरदस्त भावनात्मक पहलू भी है। यशोदा बेन विशुध्द भारतीय नारी हैं जो नरेंद्र मोदी द्वारा ठुकरा दिये जाने के बाद भी पिछले 42 सालों से उन्हीं की तसवीर दिल में संजोये हुये है और पति द्वारा पुन अपनाये जाने की समस्त आशायें समाप्ती हो जाने के बाद भी पति को किसी प्रकार की चोट नहीं पहुंचाना चाहतीं बल्कि उनके सुख समृध्दि तथा उनके प्रधानमंत्री बनने की कामना कर रही हैं। यदि ऐन लोकसभा चुनाव के पहले यह भावना प्रधान फिल्म पूरे देश में एक साथ रिलीज कर दी गई (जिसकी पूरी संभावना है क्योंकि राजनीति के खेल में सब जायज है)तो नरेंद्र मोदी की छवि निष्ठुर पति तथा महिलाओं के प्रति असंवेदनशीलव्यक्ति की बन सकती है जिसका प्रभाव नरेंद्र मोदी की चुनावी सफलताओं पर ग्रहण लगा सकता है। वैसे नरेंद्र मोदी के पास एक विकल्प अभी भी उपलब्धा  है।  वे यशोदा बेन को सार्वजनिक रूप से अपनी पत्नी  स्वीकार कर घर ला सकते हैं। अविवाहित होना आरएसएस के पदों के लिये महत्वपूर्ण शर्त हो सकती है किंतु प्रदेश या देश की सत्ता  के शीर्ष पर बैठने के लिये यह एक प्रकार की निगेटिव क्वालीफिकेशन मानी जाती है।नरेंद्र मोदी इस समय सहानुभूति के भी पात्र हैं क्योंकि न तो वह यशोदा बेन को पत्नी के रूप में स्वीकार कर पा रहे हैं और न ही उनके दावे को खारिज कर पा रहे हैं।

   ? मोकर्रम खान