संस्करण: 10 फरवरी-2014

खौफ की राजनीति में

गुम होते सवाल

 

? हरे राम मिश्र

              त्तर प्रदेश के मुसलमान वोटरों के लिए भले ही इसे सामान्य समझ की एक बात भर माना जाय कि अगर नरेन्द्र मोदी देश का प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो गये तो, देश और प्रदेश के मुसलमानों का जीवन बेहद ही असुरक्षित और दूभर हो जायेगा। इस समझ के सामान्य तथ्य देश राजनीति में भले ही मौजूद हैं लेकिन,आज-कल समाजवादी पार्टी समेत कुछ अन्य दलों द्वारा जिस तरह से मुस्लिम समाज के बीच नरेन्द्र मोदी के नाम पर मुसलमान वोटरों के भयादोहन की राजनैतिक रणनीति अपनायी जा रही है उससे यह साफ हो चुका है कि आगामी लोकसभा चुनाव में मुसलमानों की बेहतरी और उनके नागरिकीकरण के सवाल चुनावी एजेंडा तो कतई बनने ही नहीं जा रहे हैं। मोदी को रोकने और उसके इर्द गिर्द सारे राजनीति सवालों को घुमा देने का साफ मतलब यह है कि अब देश-प्रदेश के उन 22प्रतिशत मुसलमानों की बेहतरी के जमीनी सवालों पर किसी किस्म की बहस की भी कोई गुंजाइश आने वाले चुनाव में नही बचती। राजनीति प्रायोजित इस भयादोहन में मुस्लिम समाज का कोई हित तो कतई नही होने जा रहा बल्कि, राजनैतिक दलों की इस प्रवृत्ति ने कई गंभीर सवालों को जन्म दे दिया है। क्या सिर्फ एक व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने के खौफ से मुसलमानों को अपने सारे मौंजूं सवालों को किनारे करके केवल एंटी मोदी फैक्टर या एंटी संघ फैक्टर को ही किसी भी तरह से आगामी चुनाव में मजबूत करना चाहिए या फिर अपनी और मुस्लिम समाज की बेहतरी के सवालों पर खुले मन मस्तिष्क से बहस के लिए माहौल को अनुकूल करना चाहिए? या फिर दोनों के लिए पॉलिटिकल स्पेस बनाना चाहिए? सवाल यह भी है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी जिस तरह से मुसलमानों के भयादोहन की राजनैतिक पृष्ठभूमि का निर्माण भाजपा के साथ मिलकर कर रही है उसमें, बहस की कितनी गुंजाइश बचती है? गैर मुसलमानों के राजनैतिक सवाल भी धार्मिक ध्रुवीकरण के धुंध में गुम हो रहे हैं। क्या मुसलमानों के समक्ष केवल मोदी को रोकना और कथित गैर मोदी वाद को मजबूत करना ही आगामी चुनावों का मकसद और मसला है?क्या सपा सरकार के मुसलमानों के खिलाफ आयोजित कत्लेआम और चुनाव में किये गये वादों पर बेशर्मी से पलट जाने पर मुसलमानों को गहन विचार नही करना चाहिए? 

               गौरतलब है कि मोदी के नाम पर चल रहे भयादोहन के इस प्रायोजित खेल ने प्रदेश में शासन कर रही समाजवादी पार्टी और उसके द्वारा मुसलमानों से किये गये चुनावी वादों, उनकी बेहतरी के सवाल, पढ़ाई, मेडिकल, नागरिक बनने की प्रक्रिया में सरकार का योगदान और अन्य कई जरूरी कदमों पर एक स्वस्थ बहस को किनारे कर दिया है। सपा सरकार इसी बात में अपनी बेहतरी समझ रही है कि अगर प्रदेश के मुसलमानों को मोदी फोबिया से ग्रसित कर लिया जाय तो धार्मिक ध्रुवीकरण के तहत राजनैतिक समीकरण उनके ही हित में होगा। और इस तरह से सपा सरकार की मुसलमानों पर की गयीं ज्यादतियां, दंगों के उलझाऊ सवाल, आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को रिहा करने का मामला किसी तरह से राजनीतिक बहस के केन्द्र में नही आने पायेंगे। काफी हद तक ऐसा त्वरित माहौल बनता भी दिख रहा है लेकिन, यह दावे से नही कहा जा सकता कि मोदी फोबिया से ग्रसित हो रहा प्रदेश का मुसलमान वोटर चुनाव में केवल सपा के साथ ही जायेगा। वह हर जगह भाजपा को हरा सकने वाले विकल्प की ओर ही देख रहा है। पार्टी कोई भी हो सकती है। लेकिन यह सच है कि इस मोदी फोबिया में उसकी सामाजिक आर्थिक बेहतरी के कई सवाल दब चुके हैं जिनका चुनाव के वक्त परिदृष्य में रहना जरूरी रहता है।

               यहां यह बात धयान देने लायक है कि सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव भी कई बार यह कह चुके हैं कि सांप्रदायिक ताकतों को केवल सपा ही आगे बढ़ने से रोक सकती है और वे ही मुसलमानों के सच्चे हितैशी हैं। यह बात अलग है कि ऐसा जमीन पर कहीं दिखता नही है। पूरे प्रदेश में सपा सरकार बनने के बाद सौ से ज्यादा सांप्रदायिक दंगे हुए जिसमें प्रशासनिक मशीनरी की काफी शर्मनाक भूमिका रही। ऐसा देश के इतिहास में शायद ही किसी सरकार के शासनकाल में हुआ हो कि लगातार दंगे दर दंगे हो रहे हों और सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी हो। इन सभी दंगों में मुसलमान ही मारे गये और इसके बाद भी सपा सरकार यह दावा करती है वह ही मुसलमानों की सच्ची हितैशी है? इसके लिए सरकार ने भले ही अपने वेतनभोगी उलेमा-मौलाना पाल रखें हों, और वे दिन रात सरकारी बिरयानी खाकर, सरकारी गाड़ी, सरकारी डीजल और पैसे पर आम जनता के बीच सब कुछ ठीक होने बात कह रहे हों। मोदी फोबिया से मुसलमानों को लैस कर रहे हों तथा उन्हें सपा सरकार को वोट देने के लिए कह रहे हों लेकिन उनके पक्ष में कितनी बात बनेगी यह अभी नही कहा जा सकता। यही नहीं,उत्तर प्रदेश के वक्फ और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री तथा सपा सरकार के मजबूत मुस्लिम चेहरे माने जाने वाले आजम खान तो पूरे प्रदेश के मुसलमान वोटरों को आगाह कर रहे है कि अगर वो बंट गये तो नरेन्द्र मोदी प्रधान मंत्री बन जायेगा जो कि मुसलमानों के लिए काफी खतरनाक होगा। लेकिन सवाल केवल मोदी के प्रधानमंत्री बनने का ही नही है,सवाल मुस्लिम समाज की बेहतरी का भी है। उसकी शिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी का है। लेकिन उस पर सब मौन क्यों हैं? आखिर मुसलमानों की बेहतरी के पॉलिसीगत सवाल पर सपा ईमानदार क्यों नही हैं। मुजफरनगर दंगे में इतने मुसलमान मारे गये इनका गुनहगार कौन है? कुल मिलाकर, मोदी फोबिया ने मुस्लिम समाज की बेहतरी के आधार भूत सवालों को राजनीति से गुम कर दिया है।

               हालांकि यह सच है कि इस देश में मुसलमानों के साथ अन्याय होता है। और इसके लिए उनके बीच आजादी के बाद उपजी राजनैतिक शून्यता ही जिम्मेदार है। पूरा समाज ही मौलाना पॉलिटिक्स से डील होता है। चुनाव में किसके साथ जाना है यह मस्जिद में नमाज के बाद, चुनाव की पूर्वसंध्या पर तय होता है। मुस्लिम समाज को इस मकड़जाल से निकलना ही होगा। जिन्हे वे अपना रहबर समझते हैं, उन्होंने उन्हे केवल कुछ अवसरों पर प्रयोग कर फेंक दिये जाने वाला कन्डोम बनाकर रख दिया है। मोदी फोबिया भी इसी का नमूना है। यह परिदृश्य मुस्लिम समाज के लिए कतई शुभ नही है। बेहतर यही होगा कि मोदी के खौफ से मुसलमान बाहर निकलें क्योंकि यह देश ठीक उतना ही उनका है जितना कि किसी गैर मुसलमान का। मुसलमानों की सारी समस्याएं राजनैतिक हैं और राजनैतिक ताकत बनकर ही वे अपनी समस्या से पार पा सकते हैं। इस चुनाव में वो अपनी बेहतरी के सवालों पर सपा समेत अन्य राजनैतिक दलों से खुलकर बात करें। राजनैतिक जाहिलियत ही उन्हे ले डूब रही है और उनकी समस्याओं की यही असल वजह भी है। 

               कुल मिलाकर, एक सवाल यह भी है कि अगर मोदी प्रधानमंत्री नही बना तो क्या प्रदेश और देश के मुसलमानों का भविष्य चमक जायेगा?उनके साथ नीतिगत स्तर पर हो रही बेइमानी खत्म हो जायेगी। दंगो का आयोजन नही होगा। आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह छोड़ दिये जायेंगे। उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार होगा?जाहिर है ये सब सवाल वैसे ही रहेंगे। असल सवाल यह है कि मोदी के इस खौफ के बहाने प्रदेश की सपा सरकार मुसलमानों से किये गये अपने वादे तथा उनके पूरा न हो पाने से उपजे सवाल,दंगों के जख्म और इंसाफ, मुसलमानों के अस्तित्व के मौंजूं सवालों पर बहस से पीछे क्यों भाग रही है। आखिर क्या वजह है कि सपा मुसलमानो में केवल मोदी का खौफ ही भर रही है तथा उसका राजनैतिक लाभ लेने की जी तोड़ कोशिश कर रही है। आखिर सपा सरकार खौफ की इस राजनीति के सहारे मुसलमानों को कौन सा संदेश देना चाहती है?

? हरे राम मिश्र