संस्करण: 10 फरवरी-2014

प्रदूषण की सारी सीमाएं तोड़ता चीन

? डॉ. महेश परिमल

        कुछ दिनों पहले अखबार में एक तस्वीर प्रकाशित की गई थी, जिसमें चीनी सूर्योदय-सूर्यास्त देखने के लिए बहुत बड़ी स्क्रीन का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस पर कुछ लोग सोच सकते हैं कि चीन ने विज्ञान के क्षेत्र में कितनी प्रगति कर ली कि इतनी बड़ी स्क्रीन बनाने लगा, जिसमें लोग सूरज के दर्शन कर सकें। इस तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि चीन प्रगति की दौड़ में इतनी तेजी से भाग रहा है कि उसे पता ही नहीं है कि उत्पादन के लिए वह जो फैक्टरियां चला रहा है, उसे चलायमान रखने के लिए इतना अधिक कोयला जलाना पड़ रहा है कि आज वहां की वायु जहरीली हो गई है। फैक्टरियों का धुआं इतना अधिक फैल गया है कि कई शहरों में सूर्य के दर्शन ही नही होते। इसीलिए वह लोगों को सूर्य दर्शन कराने के लिए बड़ी स्क्रीन का इस्तेमाल कर रहा है। सोचो विकास की दौड़ में वह यह भी भूल गया कि जब तक लोगों को सांस लेने के लिए वायु शुध्द नहीं मिलेगी, तब लोग जी कैसे पाएंगे। इसलिए बहुत बड़े बड़े वैक्यूम क्लीनर चीन के कई शहरों में लगाए गए है, ताकि वायु की गंदगी  दूर हो सके, साथ ही लोगों को शुध्द वायु मिल सके। चीन का सबसे प्रदूषण शहर राजधानी बिजिंग ही है, लेकिन हमारे देश की राजधानी दिल्ली अब बीजिंग के साथ प्रदूषण के मामले पर स्पर्धा कर रही है।

               चीन के आर्थिक विकास को देखते हुए यह सोचा जाना आवश्यक है कि इसके लिए उसने क्या खोया? ब्रिटेन के चिकित्सकीय जर्नल में प्रकाशित एक शोध के अनुसार केवल वायु प्रदूषण के कारण चीन में एक वर्ष में 12लाख लोग मारे गए। अन्य देशों में वाहनों एवं कारखानों से निकलने वाली जहरीली वायु को नियंत्रित करने के कई कानून हैं। पर उसने अपनी आर्थिक प्रगति के लिए पर्यावरण तक को बिगाड़ कर रख दिया है। चीन के अधिकांश उद्योग सरकारी होने के कारण प्रदूषण रोकने के लिए बनाए गए कानून की धज्जियां उड़ रही है। चीन की राजधानी बीजिंग में हवा में प्रदूषित कणों की मात्रा औसत से 20गुना बढ़ गई है। हवा में सामान्यत 2.5पीएम नामक कण प्रति घनमीटर 25माइक्रोग्राम हो,तो उसे सुरक्षित माना जाता है। बीजिंग में इन कणों का स्तर 500तक पहुंच गया है। बीजिंग के नागरिक जैसे ही घर से बाहर निकलते हैं,तुरंत ही अपना चेहरा मास्क से ढंक लेते हैं। चीन का सबसे प्रदूषित शहर हार्बिन माना जाता है। जहां प्रदूषण का स्तर 1000माइक्रोग्राम तक पहुंच गया है। कई बार शंघाई की तुलना हमारे मुम्बई से की जाती है। पिछले वर्ष दिसम्बर के महीने में शंघाई में हवा का प्रदूषण इतना अधिक बढ़ गया था कि एक सप्ताह तक हाइवे और स्कूलों को बंद रखना पड़ा था। इस दौरान शंघाई एयरपोर्ट पर अनेक फ्लाइट रद्द करनी पड़ी थी। प्रदूषण दूर करने के लिए चीनी सरकार तरह-तरह के प्रयोग करती रहती है। इससे कई बार प्रदूषण को बढ़ाने में ही मदद हुई है। इनमें से एक प्रयोग यह था कि आकाश में से कृत्रिम बारिश कर प्रदूषण को दूर कर दिया जाए। दूसरा प्रयोग था कि बड़े-बड़े वैक्यूम क्लिनर बनाकर उससे जहरीली हवा सोख लेने का था। इन कारणों से अब चीन में लोग प्रदूषण दूर करने के संसाधन खरीदने लगे हैं। ऐसे उत्पादों की बिक्री भी बढ़ गई है।

              वैक्यूम क्लिनर का उपयोग हम घर का कचरा साफ करने में करते हैं, पर चीन सरकार इसका उपयोग हवा में प्रदूषण कम करने के लिए करती है। इस दिशा में उसके शोध लगातार जारी है। वहां हाल ही में एक डच मेकेनिक ने 50 बाय 50 मीटर का एक तांबे का क्वायल वाला एक वैक्यूम क्लिनर की डिजाइन तैयार की है। इसे किसी बगीचे में लगाया जाएगा। यह हवा के फैले जहरीले कणों को खींच लेगा। इससे बगीचे की हवा साफ हो जाएगी। यदि यह प्रयोग सफल रहा,तो ऐसे ही कई क्लिनर बगीचों में लगाए जाएंगे। फिर जो भी नागरिक शुध्द वायु के लिए इन बगीचों में आएगा,उनसे शुध्द वायु के बदले शुल्क लिया जाएगा। प्रदूषण के कारण कुछ नए-नए करतब भी चीन में हो रहे हैं। यहां के लोग प्रदूषण से इतने अधिक तंग आ चुके हैं कि उद्योगपतियों द्वारा बनाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के प्रदूषणनिरोधी यंत्रों को खरीद रहे हैं। एक व्यक्ति ने ऐसी साइकिल बनाई है,जिसके पैडल घुमाने से आसपास की हवा शुध्द होती है। कई कंपनियों ने बैटरी से चलने वाले एयर फिल्टर बनाए हैं, जिसे चेहरे पर पहनने से सांस ली जाने वाली हवा शुध्द हो जाती है। कई नागरिक शहर के समीप पहाड़ों पर गुफाएं खोदकर रहने का विचार कर रहे हैं।

               2008 में जब बीजिंग में ओलम्पिक खेलों का आयोजन हुआ, तब से प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक बढ़ गया है। ओलम्पिक उद्धाटन के अवसर पर आकाश शुध्द रहे, इसके लिए कृत्रिम बारिश की गई थी, यह प्रयोग उस समय सफल रहा। अब वहां का मौसम विभाग कह रहा है कि ठंड में आकाश को साफ रखने के लिए स्थायी रूप से अब कृत्रिम वर्षा का सहारा लेना ही पड़ेगा। इससे आकाश साफ रहेगा। अभी तक चीनी सरकार का ध्यान कारखानों एवं वाहनों से निकलने वाले धुएं की तरफ नहीं गया है। प्रदूषण के यही सबसे बड़े कारक हैं। इन पर नियंत्रण की सरकार की कोई योजना नहीं है। यदि इस दिशा में कार्रवाई करती है,तो कारखानों में कोयले के बदले गैस का इस्तेमाल करना होगा और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों का लायसेंस रद्द करना होगा। इसके लिए 280अरब डॉलर के यंत्र खरीदने होंगे,जो बिलकुल ही संभव नहीं है। हमारे देश की राजधानी दिल्ली भी बिजिंग की स्पर्धा में उतर रही है। जनवरी के तीन सप्ताह में दिल्ली में 2.5 पीएम कणों का स्तर प्रति घनमीटर 473 माइक्रोग्राम था, जो बिजिंग के प्रदूषण से थोड़ा सा कम है। हमारे देश की प्रजा और सरकार यदि बढ़ते प्रदूषण की दिशा में जाग्रत नहीं होती, तो चीन की तरह हमारे देश में दैत्याकार वैक्यूम क्लिनरों की आवश्यकता होगी। आज जिस तेजी से जंगल खत्म हो रहे हैं, शुध्द वायु भी बिकने लगी है, लोग अधिक प्रदूषण से विभिन्न बीमारियों का शिकार हो रहे हैं, उसे देखते हुए देश को सचेत हो जाना चाहिए। देर हो जाने से कुछ भी ठीक नहीं होने वाला।  

? डॉ. महेश परिमल