संस्करण: 10 फरवरी-2014

सुमनी झोडिया :

एक अद्भुत साहस की मिसाल

? धृतिकाम मोहन्ती

        20 वर्ष पुरानी बात है जब सुमनी झोडिया और लंबे अरसे से पीडित उसके आदिवासी समुदाय की जिन्दगी ने करवट ली। उड़ीसा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक 1991 में रायगढ़ जिले के दौरे पर थे। वहाँ के सिरीगुड़ा गाँव की एक अशिक्षित किन्तु निडर आदिवासी महिला भीड़ में से आगे आई और क्षेत्र में देशी शराब की दुकानों को सरकार द्वारा लायसेंस जारी करने के विरूध्द जोर-जोर से चिल्लाना शुरू किया।

                ''महोदय, शराब हमें बर्बाद कर चुकी है। हम आर्थिक रूप से बदहाल हो गये है। हमने सोने के अपने सारे जेवर बेच दिये है, हमारी जमीन, हमारे घर का कीमती सामान सब बिक गया है और यह सब इसलिये हुआ है क्योंकि हमारे पुरूष लोग शराब की लत में डूबे हुये है। घरेलू हिंसा और अन्य सामाजिक बुराइयां तेजी से बढ़ रही है। आप देशी शराब की दुकानों को लायसेंस क्यों देते है? यदि आप शराब की बिक्री बंद नही कर सकते, तो आपको हमारे मुख्यमंत्री होने का कोई अधिकार नही है।'' सुमनी ने मुख्यमंत्री की तीखी आलोचना की।

               पटनायक महिला के साहस और समझदारी से काफी प्रभावित हुये। मुख्यमंत्री ने उसी क्षण सुमनी को सरकार के शराब विरोधी अभियान से जुड़े मामलों में अपना निजी सलाहकार बनाने का निश्चय कर लिया। उसे पुलिस अधिकारी की शक्तियां दी गई। जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को उसके आदेशों का पालन करने के कार्यालयीन आदेश दिये गये थे। सुमनी झोडिया रातों-रात पूरे देश में शराब विरोधी आंदोलन का चेहरा बन गई।

               सुमनी द्वारा अपने समुदाय को शराब की बुराई से बचाने और शराब की लत से ग्रसित पुरूषों को नियंत्रित करने के लिये महिलाओं को सशक्त करने की शुरूआत एक दिन में नही हो गई। उड़ीसा के आदिवासी क्षेत्र के लोगों ने वहाँ के पुरूषों के देशी शराब की लत से ग्रसित होने के दुष्परिणामों को बरसों तक भोगा था।

               यहाँ तक कि अनेक लोग भुखमरी के कारण मर गये थे और परिवार टूटकर छिन्न-भिन्न हो गये थे, क्षेत्र में अवैध शराब की दुकानें चारों और फैल गई थी। पुरूष लोग इसके कारण हो रहे व्यापक विनाश के बावजूद अपनी लत नही छोड़ पा रहे थे। सुमनी ने अपने इलाके में देशी शराब के अड़्ड़े को खत्म कर देने का निश्चय किया।

               उसने स्थानीय स्व-सहायता समूहों की मदद से शराब विरोधी आंदोलन प्रारंभ कर दिया। रायगढ़ में आंदोलन का दूरगामी और व्यापक प्रभाव महसूस किया गया। महिला कार्यकर्ताओं के एक समूह के साथ उन्होने इस धंधे को बंद करवाने के लिये देशी शराब की दुकानों के सामने धरने दिये। जैसे-जैसे स्थानीय लोग उसके इस आंदोलन में शामिल होते गये यह रणनीति तत्काल दूसरी जगहों पर भी फैल गई।

                 सुमनी को इसमें हर कदम पर खतरा था और गुण्डे उसे नुकसान पंहुचा सकते थे। सुमनी ने अनेक अवसरों पर अपनी जान जोखिम में डाली, जब शराब माफियाओं ने उसे मार डालने का प्रयास किया। उसके खिलाफ 8 आपराधिक मामले दर्ज कर दिये गये और उसे बार-बार कोर्ट में घसीटा गया। किन्तु सुमनी को उसके चुने हुये रास्ते से कोई नही डिगा सका। धीरे-धीरे उसका आंदोलन फल देने लगा और महिलाओं ने जब शराब को बंद करवा दिया तो क्षेत्र में किसी ने भी अवैध शराब बनाने का दुस्साहस नही किया न ही कोई आदिवासी पुरूष स्वयं को अवैध शराब के नशे  में डुबो सका।

               1990 के दशक के प्रारंभ में सुमनी ने जंगल से एकत्रित कच्चे माल से झाडू बनाने और उन्हे बाजार में बेचने के लिये ''प्रगति महिला मण्डल'' नामक आदिवासी महिलाओं का एक स्व-सहायता समूह बनाया। इसने उड़ीसा में आदिवासी महिलाओं के बीच स्व-सहायता समूह आंदोलन को जन्म दिया। आर्थिक ताकत और आजादी जिसे वे समझ चुकी थी, उसने उन्हे अपने समुदाय में व्याप्त शराब सेवन की बुराई के विरूध्द एक सामाजिक आंदोलन का साहस प्रदान किया।

               केन्द्र सरकार ने सुमनी को उसके इस योगदान के लिये 2003 में एक पुरस्कार से सम्मानित किया। उसने इनाम की राशि को आदिवासी लड़कियों के कल्याण के लिये दान कर दी। आज सुमनी अपने जीवन के सातवे दशक में है किन्तु उम्र उसकी क्षमता को कम नही कर सकी है। सुमनी कहती है कि उसका मिशन तब तक पूरा नही होगा जब तक कि उसके ब्लॉक  में और उसके आसपास शराब बनाने की हर एक भट्टी समाज के हित में बंद नही हो जाती।

? धृतिकाम मोहन्ती

(''द सण्डे इंडियन'' में दिनांक 12 अगस्त 2011 को प्रकाशित)