संस्करण: 10 फरवरी-2014

गरीब पर गंदी मोदी नीति ?

? विवेकानंद

                 योजना आयोग के शहरी इलाके में रहने वाले लोगों को बीपीएल श्रेणी के लिए 32रुपए रोजाना और गांव में रहने वालों के 26रुपए रोजाना कमाई के मानक पर काफी विवाद उठा था।भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने तो इसे लगभग केंद्र सरकार का पाप ही करार दिया था। लेकिन उसी पार्टी के धुरंधर नेता और प्रधानमंत्री बनने के लिए छटपटा रहे नरेंद्र मोदी की सरकार ने गुजरात में बीपीएल परिवारों के लिए नए मानक तय किए हैं। इन मानकों के मुताबिक बीपीएल श्रेणी में शामिल होने के लिए ग्रामीण इलाके में रहने वाले लोगों की मासिक कमाई कम से कम 324रुपए होनी चाहिए जबकि शहरों में रहने वाले की मासिक कमाई कम से कम 501रुपए होनी चाहिए। यानि सरकार मानती है कि गांव में 11रुपए प्रतिदिन से कम कमाने वाला ही बीपीएल कैटेगिरी में आए जबकि शहरों में 17रुपए प्रतिदिन से कम कमाने वाला बीपीएल कैटेगरी में आएगा। बीजेपी के मोदी महान की इस महान करनी पर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के मुंह बंद हैं। बेशर्मी की इंतहा देखिए, जब सफाई मांगी गई, तो वित्त मंत्री नितिन पटेल आगे आए और देश को एक सूत्र में पिरोनो का वादा करते फिर रहे मोदी के इस मंत्री ने गुजरात की गरीबी के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश के वाशिंदों को जिम्मेदार ठहरा दिया। ये तर्क देते समय मोदी के साथी दिमाग वे दिनभूल गए, जब उन्हीं के गठबंधन के एक प्रमुख दल शिवसेना ने महाराष्ट्र की गरीबी के लिए उसी यूपी और बिहार को कोसा था। दरअसल, मौके की राजनीतिभाजपा ने मोदी के नेतृत्व स्वीकारने के बाद ही अपनाई है। इतिहास और अर्थशास्त्र तो कमजोर था ही, समाजशास्त्रभी उन्हें अब याद नहीं रहा।

               यहां एक और बड़ा महत्वपूर्ण सवाल है कि गुजरात में गरीबों के मजाक हो-हल्ला क्यों नहीं किया गया। मीडिया और उन तमाम विशेषज्ञों को भी सांप सूंघ गया है, जो न जाने कितने-कितने तरीके से यह बता रहे थे कि केंद्र सरकार ने गरीबों का मजाक उड़ाया है। यही बीजेपी चीख-चीखकर यूपीए सरकार को गरीबों का पक्का विरोधी करार दे रही थी। जब कांग्रेस के नेता 18 रुपए में थाली उपलब्ध होने का तर्क देते थे, तो उन्हें आटे-दाल का मंडीभाव याद दिलाया जाता था, कई उत्साही मीडियाकर्मी तो बाकायदा दुकानों पर जा-जाकर कुछ खा-पी रहे थे और बता रहे थे कि इसका दाम इतना है, ताकि उन रुपयों का हिसाब बता सकें, जो गरीबी रेखा के नीचे वालों के लिए केंद्र सरकार ने तय किया है। आज वही भाजपाई,मीडिया गुजरात की गरीब-परिभाषा को महज एक खबर मानकरभुला देने की स्थिति में पहुंचा चुके हैं। विषय यहभी है कि मीडिया इतना भाजपाई क्यों हो गया? उन मोदी के प्रति इतना सहिष्णु कैसे हो गया,जो मीडिया के सवालों पर कैमरे के सामने पानी मांगते थे, या सवाल पर जवाब दिए बिना उठकर चले जाते थे। बहरहाल मीडिया की अपनी मर्जी है, वो क्या दिखाए और क्या न दिखाए, उसे यह विशेषाधिकार प्राप्त है। वैसेभी आज-कल मीडिया दिल्ली में आम आदमी पार्टी से प्रेरित है,तो यूपी में नेताजी और उनके पुत्र के प्रभाव में, गुजरात में मोदी के विरोधी रण छोड़ चुके हैं, तो राजस्थान-मप्र में बीजेपी गान जारी है। बिहार में नीतिश राग अभीभी उम्दा है, तो बंगाल में ममता के विरुध्द खबरें छापने पर सजा मिलती है। वे समयभुला दिया गया, जब योजना आयोग ने देश में 32 रुपए कमाने वाले व्यक्ति को गरीब मानने से इनकार कर दिया था, तो बड़ा हो-हल्ला मचा था। लेकिन जनता की आंखें यह देखकर जरूर खुलनी चाहिए कि मोदी जो कहते हैं और जो करते हैं, उसमें कितना अंतर होता है। और मोदी से यह सवालभी पूछा जाना चाहिए जब 36 रुपए पर केंद्र सरकार को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ी तो अब 11 रुपए में ऐसे कौन से लाल लगे हैं, जो गुजरात के गरीब का पेटभर देंगे।

               हालांकि मोदी या बीजेपी नेता इस बात का कोई जवाब नहीं देंगे। वैसेभी मोदी को जवाब देने की आदत नहीं है। वे सिर्फ बातें करते हैं, वहभी तब जब उनके समर्थकों की और ताली बजाने वालों की भीड़ हो। उस भीड़ में वे खुद को सुपरमैन की तरह पेश करते हैं। यहभीड़ और तालियां बजाने वाले सब नकली होते हैं, जैसे उन्होंने नकली संसद और लालकिले से भाषण दिया था। बीजेपी समर्थित मीडिया मोदी को जोर-शोर से उछालता है। आजकल बताया जा रहा है कि मोदी की लहर देशभर में चल रही है। पर कैसे चल रही है, यह कोई नहीं बता रहा। यह कभी पता चलेगाभी नहीं क्योंकि देश के आधे से यादा ऐसे राय हैं, जहां बीजेपी का कोई वजूद ही नहीं है। लिहाजा बीजेपी इन रायों में मोदी को नहींभेजती। मोदी की अधिकतर रैलियां उत्तर भारत में की जा रही हैं, और यहां आने वाले कार्यकर्ताओं को जनता का रुझान बताकर पेश किया जा रहा है। जिस तरह मोदी की यह लोकप्रियता फर्जी दिखाई देती है, उसी तरह भीड़ में किए जा रहे उनके वादे भी फर्जी ही हैं। इसका उदाहरण गुजरात में 11 रुपए से ऊपर कमाने वाला गरीबी रेखा में नहीं रखकर उन्होंन ही दे दिया।

              दरअसल, मोदी कभी ऐसे मंच पर कोई वादा नहीं करते जो उनके गले की फांस बन जाए। वे भीड़ में आते हैं, जो जी में आए बोलते हैं,भीड़ में शामिल कार्यकर्ता ताली बजाते हैं और घर चले जाते हैं। जनता चंद घंटों में मोदी की बातेंभूल जाती है। उसे सिर्फ मोदी के जुमले याद रहते हैं, जिन पर वह ताली बजाती है। हालांकि एक-दो बार मोदी ने मीडिया से बात करने की कोशिश की लेकिन जब मीडिया ने सवाल पूछे तो पसीना-पसीना हो गए। मोदी ने 2012 में दो इंटरव्यू दिए, वे ही उनके अंतिम इंटरव्यू थे। इन परभी जमकर विवाद हुआ था। दरअसल मोदी मीडिया के सवालों से डरतेभी हैं और उनसे बचतेभी हैं।

              हाल में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जब इंटरव्यू दिया, तब मीडिया कर्मियों ने खंगाला कि मोदी ने कब इंटरव्यू दिया था। इसी क्रम में कई बड़ी दिलचस्प जानकारियां सामने आई हैं। एक वेबसाइट पर तो यहां तक जानकारी आई है कि वर्ष 2007 में पत्रकार करन थापर के साथ इंटरव्यू में दंगों से जुड़े सवाल पूछे जाने पर मोदी पानी मांगने लगे थे और पानी पीकर इंटरव्यू को बीच में छोड़ दिया था। इसी तरह 2009 में एक पत्रकार ने जब उनसे इन्हीं मुद्दों पर तीखे सवाल पूछे, तो मोदी एक सभा से लौटते समय उस पत्रकार को वहीं छोड़ दिया जबकि जाते समय मोदी पत्रकार को अपने साथ ले गए थे। इसके अलावा 2012 में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान वरिष्ठ टीवी पत्रकार राजदीप ने जब उनसे 2002 के दंगों को लेकर सवाल पूछा तो उन्होंने जवाब देने के बजाय दूसरी तरफ  देखना मुनासिब समझा। यह उन मोदी की डरपोक तस्वीर है, जिसे बीजेपी नेता और कार्यकर्ता शेर बताते फिरते हैं। जो मात्र सवालों से डरकर पानी मांग जाए, वह हकीकत का सामना कैसा करेगा?

              आज-कल बीजेपी मोदी के नाम पर एक और गुल खिला रही है। बताया जा रहा है कि मोदी की लोकप्रियता इतनी है कि उन्हें देखने और सुनने के लिए लोग पैसा देकर आ रहे हैं। इसके अलावा बीजेपी ने एक नोट एक वोट काभी अभियान शुरू किया है। लेकिन गहराई से देखें तो इसके पीछे कुछ और ही संदेह जन्म लेते हैं। पिछले दिनों पार्टियों को मिलने वाले चंदे पर खासी चर्चा हुई थी। मोदी के नाम पर पैसा जुटाने की कहानी भी इसी से जुड़ी है। दरअसल इस पैसे का कोई हिसाब-किताब नहीं है। कौन कितना दे रहा है और कौन कितना लिख रहा है, यह कोई नहीं जानता। इसके अलावा गुल्लक में किसने एक रुपए डाला और किसने सौ रुपए किसी को नहीं पता। इस रैली टिकट और गुप्तदान से मिले पैसे कितने हैं लोगों को उतना ही स्वीकार करना पड़ेंगे, जितना बीजेपी बता देगी। इस गुल्लक और टिकट के आड़ में कितना काला सफेद हो जाएगा, कोई ठीक ठिकाना नहीं है।  

? विवेकानंद