संस्करण: 10 दिसम्बर -2012

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मोदी फार्मूला....! घृणा के कंधे से सत्ता की जंग

       भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानंमत्री पद के उम्मीदवार बताए जा रहे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जी आखिरकार विधानसभा चुनाव जीतने के लिए अपने उसी फार्मूले पर लौट आए जिस पर चलते हुए उन्होंने दो बार जनता के बीच घृणा के बीज बोकर वोटों की फसल काटी है। मोदी ने पिछले 10 साल में गुजरात को घृणा का कुंड बना दिया है। जिस तहजीब के लिए हिंदुस्तान दुनियाभर में जाना जाता है गुजरात उस तहजीब की कब्रगाह है, जिस पर लगातार मिट्टी डाली जा रही है कि कहीं धोखे से इसमें प्राण न पड़ जाएं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि नरेंद्र मोदी जानते हैं कि उनकी विकास की ढपली का राग, जिसे पार्टी देशभर में सुनाती फिर रही है, इतना बेसुरा साबित हुआ है कि उसकी धुन पर वोटर फिदा नहीं होगा।

? विवेकानंद


गुजरात में चुनाव जीतने

का नकली आत्मविश्वास

        गोएबल्स के अनुसार अगर एक झूठ को जोर शोर से सौ बार बोला जाये तो लोगों को उसके सत्य होने का भरोसा होने लगता है। यह सिध्द हो चुका है कि झूठ को प्रचारित करने और अफवाहें फैलाने के मामले में संघ परिवारियों का कोई सानी नहीं है और इसी हथियार के भरोसे वे गुजरात विधानसभा के चुनावों में मोदी की सुनिश्चित जीत का प्रचार लगातार कर रहे हैं। हमारे यहाँ के मतदाताओं को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। पहले प्रकार के मतदाता तो वे हैं जो किसी राजनीतिक दल में सक्रिय हैं, और किसी भी हालत में उसी दल को वोट करते हैं, भले ही दल ने किसी भी तरह के गम्भीर अपराधों के आरोपी को प्रत्याशी बनाया हो।

? वीरेन्द्र जैन


मोदी के सामने 6 किलों के

फतह की चुनौती

   सान नहीं है किले फतह करना। इंसान अपने जीवन में किले फतह करता ही रहता है। जब भी कोई बड़ी उपलब्धि प्राप्त होती है,तो उसे किला फतह करना कहा जाता है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने एक नहीं, दो नहीं, पूरे 6 किलों को फतह करने की चुनौती है। सुषमा स्वराज ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए काबिल बताया है। वैसे जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने अपनी कार्यशैली से अश्वमेघ का जो घोड़ा छोड़ा है,उसे पकडने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता। पर अभी उनके सामने कई चुनौतियां हैं,जिसे उन्हें पार करना है। इन चुनौतियों को स्वीकार तो वे कर ही चुके हैं,देखना यह है कि कितनी मजबूती से वे इस कार्य को संपादित करते हैं।

? डॉ. महेश परिमल


बाबरी मस्जिद के ध्वंस से देश के सेक्यूलर चरित्र को भी भारी नुकसान हुआ !

           बाबरी मस्जिद को शहीद हुये पूरे 20 वर्ष हो चुके हैं। बीस वर्ष बीतने के बाद भी बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने से जो समस्यायें पैदा हुई थीं वे जस की तस हैं। बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिये जो जिम्मेदार थे उनमें से एक को भी सजा नहीं हुई है ना ही उन समस्याओं का हल निकल पाया है जो बाबरी मस्जिद के ध्वंस के लिये जिम्मेदार थीं। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को तोड़ने के पूर्व देश में एक जहरीला वातावरण बनाया गया था। इस जहरीले वातावरण को बनाने में संघ परिवार की प्रमुख भूमिका थी। संघ परिवार का नारा था 'मंदिर वहीं बनाएंगे'।

? एल.एस.हरदेनिया


बैक वाटर में डूबा शिक्षा का अधिकार

       ध्यप्रदेश में नर्मदा नदी पर बनाये गये 260 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले इंदिरा सागर बॉध से बनी बिजली भले ही नगरों,महानगरों में अपनी चमक बिखेर रही हो लेकिन इस बॉध के कारण खण्डवा, हरदा जिले के दो दर्जन से ज्यादा गॉवों के निवासियों का जीवन अंधकारमय हो गया है। सदानीरा नर्मदा नदी को बॉध के जरिये रोकने की कोशिश से बैक वाटर का जो फैलाव हुआ उसकी चपेट में खण्डवा,हरदा जिले के दो दर्जन से अधिक गॉव, खेत, खलिहान, स्कूल, आंगनवाडी सब आ गये है। बैक वाटर के कारण हरदा जिले के कालीसराय, खामला, खरदना, उॅवा, झांझरी, गुआडी, साकटिया, भैंसवाडा, सिरालिया, बैसवाडां, काकरदा, बिछौला, सहनगॉव, लौटिया, सेनगुढ, गोपालपुर, जामदा, देवपुर, नगॉवा, बरमलाय, डोंगरी, करणपुरा, जोगा खुर्द ,भरतार,  सहित आसपास के अनेक गॉव में बॉध के कारण रूका हुआ पानी पहुॅच गया । 

 ?   अमिताभ पाण्डेय


मुंबई के गॉडफादर की स्मृति में

जब अंधश्रध्दा राजनीति के ऊपर हावी हो

                  शिवसेना के एक नेता का यह कहना कि मुंबई के शिवाजी पार्क के जिस स्थान पर बाल ठाकरे की अंत्येष्टि हुई थी, वह स्मारक नहीं, बल्कि एक मंदिर बन चुका है और उनकी पार्टी किसी की यह बात मानने को तैयार नहीं होगी कि उसे वहां से हटा दिया जाय। पार्टी न तो सरकार के आदेश का अमल करेगी और न ही अदालती आदेश का। उस नेता का यह कथन राम जन्म भूमि मंदिर के लिए चल रहे आंदोलन की याद दिला देता है। उस समय भाजपा कहती थी कि राम जन्मभूमि हिंदुओं की आस्था का सवाल है और मंदिर उसी जगह बनेगा। उसका कहना था कि वह अदालती प्रक्रिया का मसला नहीं हो सकता है क्योकि हिंदू मानते हैं कि राम वहीं पैदा हुए थे।

? अमूल्य गांगुली


आत्मगान, आत्ममुग्धता और आत्मप्रशंसा !

जनभावनाओं से खिलवाड़, क्या ! इसी का नाम है राजनीति ?

      राजनीति का क्षेत्र इतना सहज और सरल और नहीं मान लिया जाना चाहिए, जितना आसान वर्तमान दौर में माना जा रहा है। वर्षों की गुलामी की यातनाओं के बाद हमारे महापुरुषों ने जिस स्वतंत्रता का तोहफा हमें दिलवाया,उस स्वतंत्रता के संरक्षण और जन-जन के स्वाभिमान को ऊंचा उठाये रखने की दृष्टि से लागू की  प्रजातांत्रिक शासन-व्यवस्था के सुचारू संचालन का माध्यम ही राजनीति है। किंतु राजनीति की यह गंभीरता अनेक प्रश्नों के बीच उलझकर रह गई है। हमारे देश कीपहचान विश्व के विभिन्न देशों से एकदम भिन्न है।

? राजेन्द्र जोशी


सड़कों पर राजनीति

      ध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने निर्णय लिया है कि प्रदेश के राष्ट्रीय राजमार्गों की बदहाली को लेकर पूरा मंत्रिमंडल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलकर केंद्र सरकार की कथित भेद-भावपूर्ण नीति का विरोध करेगा। प्रदेश के संसदीय इतिहास में संभवत:यह पहला मामला होगा,जिसमें पूरी सरीकार इस तरह का प्रदर्शन करेगी। प्रदेश सरकार का यह निर्णय कितना सही या गलत है, इस पर दोनों पक्षों की अलग-अलग राय है और दोनों अपने-अपने पक्ष में तर्क देकर एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर रहे हैं।

? महेश बाग़ी


सूबा मध्यप्रदेश :

आदिवासी वंचना का 'मॉडल राज्य' !

        विभिन्न नस्लीय समूहों, जनजातियों, जातियों एवं समुदायों की विविधता से सम्पन्न मध्यप्रदेश, जो क्षेत्रफल के मामले में मुल्क का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है और अपनी साडेसात करोड़ आबादी के साथ भारतीय गणतंत्र का छठवां बड़ा सूबा है, वह एक नयी पहचान अपनाता दिख रहा है। अपनी आबादी का 20 फीसदी से हिस्सा आदिवासी आबादी -जो 46 किस्म के समुदायों में बंटी है - जिनमें से तीन को ''विशेष आदिम आदिवासी समूह'' का दर्जा मिला है, के उत्पीड़न एवं वंचना के मामले में दरअसल मध्यप्रदेश एक 'मॉडल राज्य' बनने जा रहा है।

? सुभाष गाताड़े


छेड़खानी दुखदायी, डरावनी, घिनौनी : सर्वोच्च न्यायालय

नहीं काबू हो रहे हैं सीसीटीवी और पुलिसबूथ से ये युवक

       कुछ समय पहले दिल्ली के आदर्शनगर के एक सरकारी स्कूल एवं कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से सम्बधित एक कालेज से एक ही किस्म की खबरें आयी। आदर्शनगर के स्कूल की अध्यापिका को अपने ही स्कूल के विद्यार्थियों के हाथों यौन प्रताडना झेलनी पड़ी तो कुरुक्षेत्र युनिवर्सिटी की शिक्षिका के साथ वही के छात्रों ने अभद्र व्यवहार किया। शिक्षिका ने बताया कि वह कॉमर्स की क्लास पढा रही थी तभी क्लास के बाहर खडे इन छात्रों ने उनपर टिप्पणी की। जब उन्होंने उन्हें वहां से जाने को कहा तब वे छेडछाड़ पर उतर आए।    

? अंजलि सिन्हा


नार्वे से सीखें बचपन की सुरक्षा

        क खबर म.प्र. से है कि यहॉ दो शिक्षकों की पिटाई से मासूम की मौत! म.प्र. के बैतूल जिले के एक स्कूल के सात साल के छात्र असलम को उसके शिक्षकों ने इतनी बेरहमी से पीटा कि उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। असलम का दोष इतना था कि उससे खेल खेल में पानी भरने की बाल्टी टूट गई।

                  अभी तक शिक्षा विभाग और पुलिस प्रशासन द्वारा दोषी शिक्षकों पर कोई कार्यवाही नहीं की गई है।पिछले सप्ताह एक खबर राजस्थान से थी जहॉ स्कूल में पिटाई से घायल बच्ची की दो बर्ष तक चले इलाज के बाद मौत हो गई।

? डॉ. सुनील शर्मा


देशी-विदेशी क़ानून और

भारतीय दृष्टिकोण

       जकल कुछ घटनाएं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में हैं जिनका सीधा सम्बन्ध हमारे मौलिक अधिकार ही नहीं वरन् मानवाधिकारों सहित कानून के पालन से भी है। विडम्बना यह है कि मौलिक अधिकारों और कानून के प्रति आम भारतीय पूर्णत: जागरूक नहीं हैं। कानूनों की अवमानना इस देश में कोई बड़ी बात नहीं हैं। शीर्ष पर बैठे राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी तक कानून को ताक में रखकर आचरण करते हैं तो आम जनता किनसे सबक ले ? मगर विदेश में जब कोई कानून हमारे मौलिक अधिकार का हनन करने वाला प्रतीत होता है तो उसपर यहां देशव्यापी बहस छिड़ जाती है और हम उस देश के कानून को बदलने की मांग तक कर बैठते हैं।     

? डॉ. गीता गुप्त


  10 दिसम्बर-2012

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