संस्करण: 09मार्च-2009

राजनीति में गठबंधन
 

 

 

 

प्रमोद भार्गव

म चुनाव की आहट के साथ ही गठबंधान राजनीति का खेल शुरू हो गया है। क्षेत्रीय दलों के मुखिया खासतौर से कांग्रेस को रिझाने अथवा उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के दांव चल रहे हैं। कांग्रेस में खलबली मचा देने की कोशिश में लगे मुलायम सिंह और शरद पवार के अपनी-अपनी स्वार्थ सिध्दियों को साधय किये जाने के दृष्टिगत धार्म निरपेक्ष आचरण के कोई मायने नहीं रह गये हैं। लिहाजा भावी प्रधानमंत्री बन जाने का स्वप्न संजोंये बैठे हैं। दोनो दिग्गज भाजपा और शिवसेना से हाथ मिलाने की पृष्ठभूमि तैयार करने में लगे हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस से अपनी पुरानी दोस्ती की दुहाई देते हुए अन्नाद्रमुक स्वयंभू नेत्री जयललिता भी करूणानिधि से गठबंधान की गांठ खोल देने की शर्त पर कांग्रेस को ललचा रही है। बहरहाल लोकतंत्र की महिमा के चलते गठबंधान के रास्ते कद्दावर नेता अपनी दलगत विचारधारा और धार्मनिरपेक्ष स्वभाव को तिलांजलि देने में कोई गुरेज बरतते दिखाई नहीं दे रहे ?

इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले कुछ सालों में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों में परस्पर समन्वय गठबंधान की राजनीति के रूप में एक स्वस्थ्य परंपरा के साथ उभरा है। यूपीए और एनडीए के प्रयोग के बाद प्रांतीय स्तर पर भी इस तरह के गठबंधान वजूद में आये। न्यूनतम सांझा कार्यक्रम के आधार पर सरकारें बनी और सफल भी रहीं। यदि अपवाद स्वरूप कर्नाटक में बीते साल एच.डी. देवगौड़ा के धातराष्ट्रीय पुत्र मोह के चलते उपजे राजनैतिक हालातों और सत्ता में बने रहने की लिप्सा को छोड़ दें तो बिखराव और नेतृत्व संकट के दौर में गठबंधान की राजनीति मजबूत और परिपक्व ताकत के रूप में सामने आई है। राष्ट्रीय दल कांग्रेस और भाजपा ने भी गठबंधान धार्म का निर्वाह कमोवेश ईमानदारी से ही किया है। इसी कारण क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रीय सरोकारों ने अखिल भारतीय पहचान भी बनाई। हालांकि 2004 में केन्द्र में लौटने के बाद कांग्रेस एक-एक कर 15 राज्यों में पराजय का मुख देख चुकी है। कई राज्यों में तो उसे सत्ता भी गंवानी पड़ी। बावजूद कांग्रेस गठबंधान के धार्म में अग्रणी रही।

गठबंधान के मौजूदा खेल में विचारधारा और धार्मनिरपेक्ष स्वरूप को बनाये रखने के कोई मायने दिखाई नहीं दे रहे है। मुलायम सिंह तो धार्मनिरपेक्षता की जैसे नई परिभाषा ही गढ़ने में लगे हैं। कल्याणसिंह से हाथ मिलाने के बाद अब वे भाजपा से भी सांठगांठ कर लेने के लिए उतावले दिखाई दे रहे है। उनकी शर्त इतनी है कि भाजपा गठबंधान के लिहाज से फिलहाल राम मंदिर, समान नागरिक संहिता और धारा 370 का राग अलापना त्याग दे। लेकिन भाजपा इन तीनों मुद्दों को खूटीं पर टांग देगी तो उसकी झोली में रह क्या जायेगा ? भाजपा घोषणा पत्र के यहीं तो चिर-मुद्दे हैं। जब अटल जी के नेतृत्व में भाजपा केन्द्र में राजग एजेंडे के तहत सरकार बनाई थी, तब इतनी मर्यादा जरूर बरती थी कि इस ऐजेंडे में इन मुद्दों को अमल की प्रक्रिया में शामिल नहीं किया था। नरेन्द्र मोदी, रमनसिंह और शिवराज सिंह चौहान भले ही विकास के मुद्दे उछाले जाने के बूते प्रदेश की सत्ताओं पर काबिज हुए हों, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ सिंह के पास तो हिंदुत्व का परचम और राम मंदिर निर्माण ही भाजपा को केन्द्र की सत्ता तक पहुंचाने वाले मूल मंत्र हैं, भाजपा इन्हें छोड़ देगी तो उसकी मुट्ठी में रह क्या जायेगा ?

हालांकि मुलायम-अमर की जोड़ी जिस तरह से भाजपा को ललचाने की कोशिश में लगी है उससे जाहिर होता है कि अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना रही है।जिससे कांग्रेस खासतौर से उ.प्र. में सपा की इच्छानुसार सीटों पर तालमेल के लिए विवश हो जाये। क्योंकि सपा और कांग्रेस की तालमेल संबंधी बैठकों में कोई निर्णायक परिणित सामने आने की बजाय मन-मुटाव ही बढ़ रहा है। नतीजतन मुलायम ने बेहिचक कहना शुरू कर दिया है कि विवादास्पद ढाचा विधवंस के लिए भाजपा से कहीं अधिक कांग्रेस दोषी हैं। इस ढांचा विधवंस के जबावदेह जनक कल्याणसिंह को सपा में शामिल करने में उन्होंने सपा के मुस्लिम वोट बैंक की भी कोई परवाह नहीं की। उल्टे दलील दी, इस कार्यवाही से भाजपा कमजोर होगी। गोया अमर-मुलायम की जोड़ी राजनीतिक हसरत पूर्ति के लिए गठबंधान का कोई भी गुल खिला सकती है ? 

शरद पवार भी तीसरे मोर्चे के वजूद में अपनी जगह बनाने की जुगत में लगे हैं। हालांकि पवार केन्द्र और महाराष्ट्र दोनों जगह कांग्रेस के साथ सत्ता दोहन में हाथ बंटा रहे हैं लेंकिन आम चुनाव की सुगबुगाहट के साथ ही पवार ने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से गठबंधान का तालमेल बिठाने के लिए बैठकें शुरू कर दीं। हालांकि शरद पवार कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के साथ राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी को खड़ा रखकर चुनाव लड़ने का आग्रह कर चुके हैं, पर कांग्रेस सीटों पर उचित तालमेल न होने की संभावना के चलते महाराष्ट्र की सभी सीटों पर अपनी दम पर चुनाव लड़ना चाहती है। इसलिए पवार के प्रस्ताव को कांग्रेस ने वाजिब तहजीब नहीं दी। नतीजतन पवार ने शिवसेना की ओर हाथ बढ़ा दिया। लेकिन यहां सोचने वाली बात यह है कि धार्मनिरपेक्षता के इन अलंबरदारों का भाजपा और शिवसेना के साथ नैतिकता की दृष्टि से खड़े होना कहां तक जायज है ? अन्नाद्रमुक नेत्री जयललिता का लहजा भी कांग्रेस के साथ सहलाने और गरियाने वाला है। जयललिता ने चैन्नई की एक सभा में कांग्रेस की ओर इशारा करते हुए खुले शब्दों में कहा, द्रमुक और करूणानिधी का अधयाय समाप्त हो चुका है। यदि कांग्रेस सोचती है कि द्रमुक को दलदल से निकालकर बचा सकती है तो वह खुद इस दलदल में फंस जायेगी। जयललिता ने चेतावनी दी, जो हमारे साथ आयेगा फायदे में रहेगा, जो नहीं आयेगा हार जायेगा। अन्नाद्रमुक पी.व्हीं नरसिंह्माराव के जमाने में कांग्रेस के साथ रही है और अब आम चुनाव के लिए वामदलों तथा एडीएमके के साथ है। पिछले लोकसभा चुनाव में जयललिता का गठबंधान भाजपा के साथ था लेकिन द्रमुक ने तमिलनाडू की सभी 39 सीटों पर गठबंधान को करारी शिकस्त दी थी। इसलिए अब जयललिता भाजपा से परहेज कर रही हैं। उन्हें उम्मीद है कि लिट्टे की प्रबल विरोधी होने के कारण कांग्रेस जयललिता गठबंधान के लिए तैयार हो जायेगी। क्योंकि राजीव गांधी की हत्या में लिट्टे का हाथ था। कांग्रेस का यह कमजोर पक्ष जयललिता से हाथ मिलाने के लिए सकारात्मक दिशा तय कर सकता है।

लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान ने जरूर गठबंधान के खेल में अपनी नैतिक दृढ़ता बरकरार रखी है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियो से दूरी बनाये रखते हुए चुनाव लड़ेंगें। यूपीए के घटक दलों के बीच जरूर उन्होंने चुनावी तालमेल की संभावना जताई है। वे इस घटक दल में शामिल भी हैं। इसी लाईन पर लालू हैं। बहरहाल हाल के हालातों में तो गठबंधान की राजनीति एक ऐसा खेल नजर आ रही है कि गठबंधान के पांसे किस करबट बैठेंगे कुछ कहा नहीं जा सकता। क्षेत्रीय दलों के मुखिया अपने मंसूबे साधाने के लिए किसी भी हद तक जाकर समझौते की गांठ बांधा सकते हैं ?


 

प्रमोद भार्गव