संस्करण: 09मार्च-2009

पारंगत हो जाओ भाषणबाजी में खूब भरमाओ जनता को, जीत लो चुनाव का मैदान

 


राजेंद्र जोशी

             ह क्या होता जा रहा है राजनैतिक दलों को। सत्ता प्राप्ति का ऐसा भी क्या जुनून, कि बदल ही जाय जनसेवा करने के मापदंड। जनता का विश्वास अर्जित करने के लिए जरूरी है, कुछ कर दिखाने की। इसके लिए राजनैतिक दलों को परस्पर प्रतिस्पार्धा करते समय अपने सिध्दांतों, उसूलों, वायदों और आश्वासनों को मैदान में उतारना चाहिए, किंतु ऐसा नहीं हो रहा है। सत्ता पर आरूढ़ हो जाने के बाद राजनैतिक दलों को ग्लैमर में जीने का ऐसा चस्का लग जाता है कि उनके नेताओं के क्रियाकलाप ही बदल जाते हैं। सरकार चलाने के लिए मिले जनादेश का इतना ज्यादा दुरूपयोग होने लगा है कि जिस उद्देश्य के लिए आम जनता ने उन्हें विकास, जनकल्याण और जनसुरक्षा का जिम्मा सौंपा है, उसकी तरफ तो वे पीठ कर लेते हैं और नैतिकता, अनुशासन, मर्यादा और राजनैतिक शुचिता के सूत्रों को ठोकर मारते रहते हैं।

सत्ता पर काबिज कुछ राजनैतिक दलों और उनके कर्णधारों का पूरा समय जनता को भ्रमित करते रहने, झूठ को सच निरूपित करने और सरकार संचालन की अपनी अक्षमता और कमजोरियों के परिणामों को किसी अन्य दलों और उनके नेताओं पर मढ़ते रहने में बीतता रहता हैं। सत्ता के मद में चूर कतिपय नेतागण तो जनभावनाओं को अपनी फितरतों से इतना अधिक उभारने में लग जाते हैं कि वे अंधोरी काली रात को भी उजियाली रात प्रचारित करते रहने को ही अपनी राजनैतिक प्रवीणता मानते हैं। प्रशासन और कानून तथा व्यवस्था का काम संचालित करने वाली सरकारी एजेंसियों में कार्यरत लोग तो राजनैतिक दलों और उनके नेताओं की कुत्सित भावनाओं के अनुरूप अपने आप को ढालकर अपनी चरित्रावलियों को स्वर्णिम मनाने में ही अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को निभाने की कला सीख गये हैं। जिस 'जन' के 'मत' से सरकारों का गठन होता है, वे सरकारें उस 'जन' की अनदेखी कर कतिपय सत्तासीन क्षत्रपों के हितों को साधाने में दिनरात एक करती जा रही हैं। नतीज़न तमाम घोषणाऐं, वायदे और संकल्प फाइलों के कंटकीय मार्गों में उलझकर दफ्तरों की अलमारियों में बंद हो जाते है और फिर उन अलमारियों की चाबियां खो जाती हैं। अगले निर्वाचन का शेर दहाड़ते हुए आ जाता है तो बंद अलमारियों में कैद फाइलें का सत्य उजागर होने का भय सताने लगता है।

निर्वाचन एक ऐसा चुनौतीपूर्ण अवसर है, जिसमें राजनैतिक दलों के ढोलों के पोल खुलने के ज्यादा चांस बढ़ जाते हैं। ऐसे में जन सहानुभूति की आवश्यकता पड़ती है। अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए कतिपय दलों के सामने कई तरह की फितरतें, हथकंडे, साजिशें और छलछंद करने की चुनौती आ जाती है। अमूमन हमारी जनता बड़ी ही सहनशील धौर्यवान और सहज होती है। उसे सरकार के कामों में जरा सी भी आस की किरण दिखाई देती है वह जम के नारे लगा देती है। तनिक भी यदि राहत, सुरक्षा या अपने दैनंदिन जीवन में कुछ सुविधाा नज़र आती है तो वह व्यवस्था के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रूप अख्तयार कर लेती हैं। यदि सरकार की अक्षमता और अकुशल प्रशासनिक तकनीक के चलते कष्ट उठाना पड़ जाता है तो वह उसे यह कहकर झेल लेती है कि यह सुविधा उसके भाग्य में नहीं हैं। सरकारों में बैठे जननेता भी जब अपनी प्रशासनिक अकर्मण्यता और असफलताओं को छुपाने का खेल खेलते हैं तो वे आम जनत को बरगलाने के राजनैतिक नुस्खों पर उतर आते हैं। इस तरह के नुस्खों में प्रभावकारी रूप से असर करती हैं भाषणबाजी की कला। भाषणबाजी की कला की पुड़िया ही एक ऐसी कारगर होती है कि निर्वाचन के दौर में वह बहुत ही माफिक बैठती है।

राजनीति की परिभाषा में बहुत कुछ तब्दीली देखने में आ रही हैं। अपने झूठ को कैसे सच सिध्द किया जाय और दूसरों के सत्य को किस तरह से झूठ बताकर प्रचारित किया जाय इसके लिए राजनैतिक दल अब अपने नेताओं को प्रशिक्षित करने की पाठशालाऐं खोलने लगे हैं। अपने कार्यों के कारण यदि आप गढ्ढे में गिर गये तो हल्ला मचा कर खड़े हो गये कि फलां ने हमें धाक्का देकर गिरा दिया। जबकि सच तो यह होता है कि सत्ता के जिस मार्ग पर कतिपय दल और उसके नेता चल रहे हैं उस मार्ग में खुद के ही द्वारा खोदे गये गड्डे है और रास्ते-रास्ते में खुद ने ही कांटे बो दिए हैं। जनसहानुभूति अर्जित करने और भोले-भाले लोगों की भावनाओं को जीतने के लिए अपनी निष्क्रियता और नाकामयाबी का ठीकरा किसी अन्य पर फोड़ने की कला का ज्ञान होना भी आज की राजनीति का मुख्य सूत्र बन गया है। एक राजनैतिक दल ने तो इस उद्देश्य से विधिवत शिविर आयोजित करने की योजनाऐं चला रखी है कि किस तरह से भाषणबाजी की कला से झूठ को सच और अपनी कालिख पुते चेहरे को किस तरह के क्रीम से सुंदर और आकर्षक बनाया जाय। ये दल अपने कार्यकर्ताओं को इस कला में भी प्रशिक्षित करते जा रहे हैं कि अपनी देह की दुर्गंधा को छुपाने के लिए भाषणबाजी की कला में किस तरह के शाब्दिक इत्र, पर्फ्यूम्स या क्रीम का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। आज चारों तरफ नकली वस्तुओं के हाट बाजार लग रहे हैं। राजनीति के बाजार में भी जनता के प्रति नकली हमदर्दी के प्रदर्शन का दौर शुरू हो चुका है। इस सबमें नकलीपन को छुपाने में भाषणबाजी की पालिस ही अपने काले कारनामों को छुपाने में स्वर्णिम चमक बिखेर सकती है। इसी दृष्टि से नेताओं के लिए चालू किए गये भाषणबाजी सीखने के शिविर में भरती होकर पारंगत हो जाओ, खूब जनता को भरमाओं और जीत को चुनाव का मैदान।
 

 
 

राजेंद्र जोशी